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मेवाड़ में बदल रहे है राजनीति के समीकरण…

By   /  October 10, 2012  /  1 Comment

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एकजुट हो रहे है दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं घुमन्तु जातियों के लोग

-लखन सालवी।

भीलवाड़ा सांसद और देश के सड़क परिवहन एवं रेल मंत्री डॉ. सी.पी. जोशी के संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस का वोट बैंक निरन्तर कम होता जा रहा है। महंगाई तो प्रमुख कारण है ही, उसके बाद आरसीएम प्रकरण से भी कांग्रेस का वोट बैंक निश्चित तौर पर कम हुआ ही है। रही बात दलित, आदिवासी, घुमन्तु और अल्पसंख्यकों की बात. . तो ये वोट बैंक भी अब कांग्रेस के पाले से खिसकता हुआ प्रतीत हो रहा है।

पिछले कुछ माहों से राज्य के मेवाड़ अंचल में दलितों, घुमन्तुओं और आदिवासी समाज के बड़े बड़े आयोजन हुए है। जिनमें इन वर्गों के लोगों ने एकता दिखाई और हजारों की तादाद में इक्कट्ठे होकर राजनीतिक बदलाव की चेतावनी दी है। यूं तो 3 अक्टूबर को चित्तौड़गढ़ जिले के मंगलवाड़ क्षेत्र में रोड़जी का खेड़ा में आयोजित हुए बंजारा जाति के बड़े सम्मेलन को आध्यात्मिक सम्मेलन का नाम दिया गया, लेकिन वो सम्मेलन आध्यात्मिकता की बजाए राजनीतिक सम्मेलन जैसा था। वहां कांग्रेस के राज्य अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष दिनेश तरवाड़ी भी आए और बंजारा समुदाय के आध्यात्मिक पुरूष रूपसिंह महाराज की शोभायात्रा को सम्बोधित किया। लेकिन आध्यात्मिक सम्मेलन में पूर्व गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया की उपस्थिति ने समाज के राजनीतिक रूख को स्पष्ट कर दिया।

भीलवाड़ा के आजाद चौक में घुमन्तु जातियों के लोगों ने नई पार्टी बनाने की बात कही। 8 अक्टूबर को भीलवाड़ा के आजाद चौक में घुमन्तु जातियों (कालबेलिया, भोपा, सांसी, कंजर, बंजारा, घाचा, गाडोलिया, रंगास्वामी आदि) के विशाल स्वाभिमान सम्मेलन का सफल आयोजन हुआ। आजाद चौक . . . यह वह जगह है जहां इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी तथा लालकृष्ण आडवाणी जैसे कई बड़े राजनीतिक लोगों की राजनीतिक सभाएं हुई। इस चौक में हुए घुमन्तु जातियों के इस विशाल सम्मेलन ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। घुमन्तुओं के संगठित रूप को देखकर पक्ष और विपक्ष के नेताओं के माथे पर चिंता की रेखाएं उभर आई है। घुमन्तु जातियों के लोगों ने तो मांगें नहीं माने जाने पर नई पार्टी बनाने तक की घोषणा कर दी है।

सम्मेलन में भीलवाड़ा जिले के घुमन्तु जातियों के हजारों लोगों ने भागीदारी निभाई। पहली बार सभी घुमन्तु जातियां एकजुट हुई और अपनी मांगों को लेकर आजाद चौक में हुंकार भरी। सम्मेलन में आए लोगों ने कहा कि सरकारें हमें हाशिए पर रखती आई है। सरकार को अब अपनी सोच बदलनी पडे़गी नहीं तो हम अपनी अलग पार्टी बनायेंगे।

सम्मेलन में आए दमित वंचित वर्ग के महिला पुरूष एवं युवाओं में गजब का उत्साह था। वो अपनी पीड़ा भी बता रहे थे और नाच भी रहे थे। सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उनके संघर्ष में भी उल्लास नजर आ रहा था। जानकारी के अनुसार भीलवाड़ा जिले का यह पहला घुमन्तु जातियों का सम्मेलन है जिसमें बंजारा, गाडिया लौहार, कालबेलिया, भोपा, घाचा, भील, सांसी, कंजर, रंगास्वामी सहित तमाम घुमक्कड़ जातियों के लोगों ने भाग लिया। जय भीम, जय भारत के नारे लगाते हुए जन सैलाब भीलवाड़ा की सड़कों पर से गुजरा तो हर कोई आश्चर्य चकित था। आखिर घुमन्तु वर्ग इस रूप में कभी बाहर निकला ही नहीं।

यह सम्मेलन दलित अधिकार नेटवर्क राजस्थान की ओर से आयोजित किया गया था। सम्मेलन से पूर्व दोपहर 12 बजे सुखाड़िया सर्किल से स्वाभिमान रैली निकाली गई। रैली को दलित आदिवासी एवं घुमन्तु अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के संस्थापक भंवर मेघवंशी ने हरी झण्डी दिखाकर रवाना किया। स्वाभिमान रैली में घुमन्तु जातियों के करीब 5000 महिला पुरूषों ने भाग लिया। युवा भी पीछे नहीं थे, वास्तव में तो इस बदलाव के कर्णधार ही युवा थे। खैर . . . सभी ने भीलवाड़ा शहर को ‘‘जय भीम – जय भारत’’ के नारों से गुंजा दिया और अपने वोटों की गिनती से सबको अवगत करा दिया।

सम्मेलन में कालबेलिया अधिकार मंच के रतननाथ कालबेलिया ने कहा कि हमारे समुदायों के परिवारों के रहने के लिए जमीन नहीं है, शिक्षा की कोई व्यवस्थाएं नहीं है। अत्यन्त गरीब होने के बावजूद बीपीएल श्रेणी में नहीं जोड़ा गया है। कालबेलिया नृत्य के माध्यम से राजस्थान को विश्वभर में प्रसिद्धि दिलवाने वाले हमारे समुदाय के लिए सरकार ने कोई पॉलिसी नहीं बनाई है। कालबेलिया नृत्यांगनाओं के लिए पॉलिसी बनाने की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी बहू बेटियां दलालों के माध्यम से विदेशों में नृत्य करने जाने को मजबूर है, दलाल लाखों रूपए कमाते है और हमारी नृत्यांगनाओं को महज 5000-10000 हजार रुपए दे दिए जाते है। उनके साथ अभ्रद व्यवहार भी किया जाता है। साथ ही कहा कि घुमन्तु जातियों अत्याचार करने और उन्हें हाशिए पर धकेलने में सरकार की अह्म भूमिका है।

ग्राम पंचायतों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि पंचायतों का ढांचा गांव के पंच-पटेलो के इशारों पर चलता है वो हमारा विकास नहीं होने देना चाहते है। वो ना हमें जमीन के लिए पट्टे देंगे और ना ही पहचान के दस्तावेज। सम्मेलन के मुख्य अतिथि दिनेश तरवाड़ी (उपाध्यक्ष -राज्य अनुसूचित जाति आयोग) से अनुरोध किया कि वो कालबेलिया समुदाय की पीड़ा से राज्य सरकार को अवगत कराएं।

सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए डगर के संस्थापक भंवर मेघवंशी ने कहा कि घुमन्तु जातियों की हालात ठीक नहीं है। उनके पास ना रहने के लिए जमीन है और ना ही खेती के लिए जमीन है। यहां तक कि मुर्दो को दफनाने के लिए भी नहीं जमीन है। उन्होंने कहा कि देश को आजाद हुए 6 दशक बीत गए है लेकिन घुमन्तु समुदायों के लोगों को उनके हक नहीं मिले है। राशन कार्ड, जॉब कार्ड व पहचान बताने वाले दस्तावेज के लिए लोग प्रशासनिक विभागों के चक्कर लगा रहे है। उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सरकार बांग्लादेशियों को भारत की नागरिकता प्रदान कर रही है जबकि राजस्थान के मूल निवासी, राजस्थान की संस्कृति को जीवित रखने वाली घुमन्तु जातियों को पहचान के दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं करवा रही है। उन्होनें चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सरकार घुमन्तु वर्ग की मांगों को पूरा करें अन्यथा इस वर्ग के लोग रैलियां नहीं पूरे देश में रैला निकालेंगे और जरूरत पड़ी तो नया राजनीतिक विकल्प देने के लिए दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक व घुमन्तु लोग राजनीतिक मोर्चा भी खड़ा करेंगे।

जोधपुर से आए दलित अधिकार नेटवर्क राजस्थान के तुलसीदास राज ने कहा कि 2 साल पहले राजस्थान भर के घुमन्तु समुदायों के लोगों ने जयपुर के स्टेच्यू सर्किल पर एक दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया था। जिसमें सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता विभाग की मुख्य सचिव अदिति मेहता ने राजस्थान सरकार की प्रतिनिधि के रुप में उपस्थित रही थी। घुमन्तु समुदायों के लोगों ने अपनी मांगे उनके सामने रखी थी। उसके बाद प्रशासन गांवों के संग अभियान से पूर्व राज्य सरकार ने घुमन्तु जातियों के सभी परिवारों को बीपीएल सूची में शामिल करने के आदेश दिए थे। अभियान के दौरान आयोजित शिविरों में इस वर्ग के परिवारों को बीपीएल सूची में जोड़ा जाना था लेकिन उन्हें नहीं जोड़ा गया। जिसका परिणाम रहा कि मुख्यमंत्री बीपीएल आवास योजना का लाभ भी इस वर्ग को नहीं मिला।

सम्मेलन में उठी ये मांगे –

  • घुमन्तु जातियों का सर्वे कर सूची बनाई जाए।
  •  सभी घुमन्तु जातियों के लोगों को जमीन व पट्टे दिए जाए।
  •  चारागाह भूमि में बसे परिवारों को विस्थापित करने के लिए उन्हें जमीन दी जाए।
  •  सभी घुमन्तु जातियों के परिवारों के जॉब कार्ड बनाए जाए ताकि उन्हें रोजगार मिल सके।
  •  सभी घुमन्तु जातियों को बीपीएल में शामिल किए जाने के राज्य सरकार के आदेश की पालना की  जाए।
  • घुमन्तु वर्ग के बुजुर्गों को पेंशन दी जाए।
  •  घुमन्तु बोर्ड का गठन शीघ्र किया जाए तथा उसमें सभी घुमन्तु जातियों के प्रतिनिधियों को सदस्यता दी जाए।
  •  सरकारी योजनाओं के लाभ दिलवाने के लिए सरकार अलग से अभियान चलाए।
  •  घुमन्तु जातियों के लिए अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र ग्राम पंचायत पर जारी हो।
  •  प्रत्येक जिले में घुमन्तु समाज की सुरक्षा के लिए अलग से प्रकोष्ठ बनाए जाए तथा हर माह उनकी समीक्षा हो।

इस अवसर पर राज्य अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष दिनेश तरवाड़ी ने कहा कि राज्य सरकार घुमन्तु वर्ग के विकास के लिए निरन्तर प्रयास कर रही है। हाल ही में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने घुमन्तु आयोग बनाने की घोषणा की थी और दीपावली से पूर्व इस आयोग का गठन करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। उन्होने कहा कि घुमन्तु समुदाय की सभी मांगों से सरकार को अवगत कराने के साथ ही इनके उत्थान के लिए मैं हर स्तर पर प्रयास करूंगा।

सम्मेलन को अल्प संख्यक विकास संस्था के डायरेक्टर आबिद हुसैन शेख, कालबेलिया समाज के प्रदेश उपाध्यक्ष शंकर लाल नंगाणी, राजकुमार बंजारा, कालबेलिया समाज के जिलाध्यक्ष लाडूनाथ कालबेलिया, उपाध्यक्ष मिठूनाथ कालबेलिया, सांसी समाज के जिलाध्यक्ष नारायण लाल सांसी, कंजर समाज के जिलाध्यक्ष बागचन्द कंजर, भोपा (नट) समाज के जिलाध्यक्ष किशनलाल भोपा, रंगास्वामी समाज के जिलाध्यक्ष भीमदास रंगास्वामी, बागरिया समाज के जिलाध्यक्ष उंकार लाल बागरिया, भील समाज के जिलाध्यक्ष रामलाल भील, घाचा (कालबेलिया) समाज के जिलाध्यक्ष राजकुमार घाचा, गाडोलिया लौहार समाज की प्रतिनिधि धम्मी बाई गाडोलिया व बरमूड़ा समाज के जिलाध्यक्ष कालूराम बरमूड़ा आदि ने सम्बोधित किया वहीं सम्मेलन का संचालन एडवोकेट दौलतराज नागौड़ा ने किया।

दलित आदिवासी एवं घुमन्तु जातियों से प्रतिनिधि युवा चेहरों की सक्रियता बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है। सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी जहां सिर्फ राजस्थान में ही नहीं बल्कि पूरे देश में सामाजिक चेतना और दलित अत्याचारों के खिलाफ लड़ते हुए राजनीतिक जागृति लाने और युवाओं को राजनीति में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित कर रहे है। वहीं घुमन्तु जातियों से संबंध रखने वाले परशराम बंजारा और रतननाथ कालबेलिया जैसे जागरूक युवा अपने वर्ग को संगठित कर राजनीति में नए आयाम स्थापित करने में लगे है। रतननाथ कालबेलिया घुमन्तु जातियों का युवा, कर्मठ और हौसलें वाला चेहरा है। वो न सिर्फ अपने समुदाय बल्कि तमाम घुमन्तु जातियों के उत्थान के लिए सतत प्रयास कर रहा है और राजनीतिक परिवर्तन का माद्दा रखता है। ऐसे ही सैकड़ों युवा पूरे प्रदेश में राजनीतिक चेतना के लिए कार्य पर जुटे हुए है जो शायद परिवर्तन कर ही दम लेंगे।

जानकारी के अनुसार भीलवाड़ा के मांडल ब्लॉक से विधायक बने पूर्व मंत्री राम लाल जाट और भीलवाड़ा से सांसद का चुनाव लड़े वर्तमान सड़क परिवहन एवं केन्द्रीय रेल मंत्री डॉ. सी.पी. को चुनाव जिताने में इन दलित युवा चेहरों का अह्म योगदान था। जिले का हरेक व्यक्ति जानता है कि वर्तमान जिले का प्रथम पद (जिला प्रमुख) तो इन्हीं युवाओं की देन रहा है। बावजूद इसके इनकी कांग्रेस से नाराजगी से जिले के राजनीतिक समीकरण बदलते दिखाई पड़ रहे है।

दलित, आदिवासी व घुमन्तुओं को कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता है। लेकिन अब कांग्रेस का यह वोट बैंक गडबड़ाने के पूरे आसार नजर आ रहे है। पिछले कुछ महीनों से राज्य के मेवाड़ अंचल में दलित आदिवासी एवं घुमन्तुओं पर अत्याचार हुए है और उसके परिणाम स्वरूप इन वर्गों के लोग संगठित होकर राजनीति की बात करने लगे है। राजसमन्द का दलित अधिकार सम्मेलन, रोड़जी का खेड़ा का बंजारा सम्मेलन तथा कामलीघाट में सालवी महासम्मेलन और अब भीलवाड़ा का घुमन्तु जाति स्वाभिमान सम्मेलन वंचित वर्गों की कांग्रेस के प्रति नाराजगी को स्पष्ट कर रहा है।

मोह लिया कालबेलिया नृत्य ने

सम्मेलन में बालोतरा की हेमनाथ एण्ड पार्टी के कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। कालबेलिया नृत्यागंनाओं ने बीन की धुन पर नृत्य प्रस्तुत किए। बीन की धुन पर जब कालबेलिया नृत्यांगनाओं ने नृत्य करना आंरभ किया तो बालाजी मार्केट आस-पास के बाजारों में खरीददारी कर रहे लोग व दूकानदार भी सम्मेलन स्थल पर आ गए। लोगों ने राजस्थान के प्रसिद्ध कालबेलिया नृत्य को खूब सराहा।


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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. nayi sambhavnao ki talash me pahala kadam…..

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