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जो शख्स देश का विभाजन बचा सकता था, आज उसकी ही हवेली पर निगाहें हमारी…

By   /  October 11, 2012  /  1 Comment

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अगर भारत-पाकिस्तान विभाजन के 66 साल और भगत सिंह के शहादत के इक्यासी वर्ष बाद पाकिस्तान की जमीं लाहौर में भगत सिंह का नाम फिर से लोग फख्र से लें, इसके लिए पाकिस्तान की सरकार पहल कर सकती है तो क्यों नहीं 76-वर्ष पूर्व भारत की जमीं पर मुंबई में बने जिन्ना हाउस उसके असली वारिस को सौंपा जाये? किस भूमाफिया का इंतजार है सरकार को कि वो आये और कब्ज़ा ले अरबों रुपये की उस मिलकियत को जो सिर्फ और सिर्फ जिन्ना खानदान के वारिस को मिलनी चाहिए..

 

-शिवनाथ झा||

भगत सिंह की शहादत के इक्यासी वर्ष के बाद ही सही, पाकिस्तान सरकार का यह फैसला कि शादमां चौक का नाम शहीद भगत सिंह के नाम पर “भगत सिंह चौक” रखा जाये, काबिले तारीफ है. पाकिस्तान सरकार और वहां के आवाम की यह पहल स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के प्रति एक सम्मान माना जायेगा. पाकिस्तान सरकार की ओर से यह फैसला भगत सिंह के 105 वें जन्म दिन पर लिया गया. क्रांतिकारी भगत सिंह को लाहौर कोंसिपिरेसी केस में 23 मार्च, 1931 को फांसी पर लटकाया गया था.

भगत सिंह के फांसी पर लटकाए जाने की तारीख से लेकर 14-15 अगस्त 1947 तक, यह स्थान भगत सिंह के शाहदत के नाम से ही जाना जाता था, परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति और भारत-पाकिस्तान के विभाजन के उपरांत यह चौक शादमां चौक के नाम से जाना जाने लगा.

लेकिन एक बात गले से नीचे नहीं उतरती की विश्व भर में, जहाँ-जहाँ भारतीय हैं, या जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम स्वर्णिम इतिहास और क्रांतिकारियों  के शाहदत को जीवित रखना चाहते हैं, सिर्फ भगत सिंह को ही क्यों जीवित रखना चाहते हैं?

भगत सिंह के साथ दो अन्य क्रांतिकारी – राजगुरु और सुखदेव – को भी उसी स्थान पर, एक साथ, एक समय, ही फांसी पर लटकाया था, कभी किसी ने इन दो शहीदों की शहादत को इतनी तवज्जो नहीं दी. क्या इन दो और अन्य क्रांतिकारी शहीदों को अपने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए फांसी पर लटकने का उतना ही सम्मान नहीं मिलना चाहिए? बहरहाल, देर से ही सही, पाकिस्तान की जमीं पर जब भी भगत सिंह को पुष्पांजलि अर्पित किया जायेगा, वहां के लोगों की आखें भगत सिंह के अलावा राजगुरु और सुखदेव के लिए भी ‘नम’ जरुर होंगी बशर्ते वहां की आवाम अपने आने वाले नस्लों को बताएँगे कि कौन थे भगत सिंह? कौन थे राजगुरु? और कौन थे सुखदेव? क्यों लगी थी इन्हें फांसी?

लेकिन, वहीँ दूसरी ओर यदि पाकिस्तान के लाहौर शहर के भगत सिंह चौक को भारत के मुंबई शहर के मुहम्मद अली जिन्ना की कोठी के एक साथ आँखें मूंद कर भारत सरकार और भारत का आवाम करे, तो शायद यह भी आखों की पिपनियों को वैसे ही भिगोएगी. क्यों करना चाहती है भारत की सरकार, यहाँ के लोग, या फिर यहाँ की न्यायपालिका जिन्ना की कोठी पर कब्ज़ा?

सरकार की  ढीली-ढाली नीति, न्यायपालिका प्रक्रिया और कुछ दबंग लोगों की निगाह के कारण मोहम्मद अली जिन्ना का दक्षिण मुंबई के मालाबार हिल स्थित 2, मौंटप्लीजेंट रोड (अब भाऊसाहेब हीरेमार्ग) भवन अपनी किस्मत पर आज भी रो रहा है. और दशकों से इंतजार कर रहा है अपने स्वामी का.

सन् 1936 में लगभग दो लाख रूपये की लागत पर बनी और तीन एकड़ मे फैली मोहम्मद अली जिन्ना की यह कोठी, जो किसी जमाने में साउथकोर्ट के नाम से जानी जाती थी, आज जहरीले सापों का घर बन गई है. यह अलग बात है कि भवन के 100 गज की दूरी पर महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री का आवास है. समुद्र की ओर मुख किये इस भवन का निर्माण क्लोड बाटली ने यूरोपियन स्टाइल से किया था. यह भवन स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरु, सरदार बल्लभ भाई पटेल और अन्य नामी-गिरामी लोगों को देखा हैं. आज इस भवन की अनुमानित कीमत 100 करोड़ से भी अधिक होगी और इस बहुमूल्य भवन पर किसी का भी दिल आ सकता है चाहे कोई भी हों?

यह भवन विवादस्पद है और मामला मुंबई उच्च न्यायलय में पेंडिंग है. इस बीच सार्क देशों ने भारत सरकार से अनुरोध किया है कि चुंकि भारत में सार्क का कोई अधिकृत कार्यालय नहीं है और सार्क देशों के कला और संस्कृति को आपस में देखने-दिखाने के लिए यह भवन बहुत ही उपयुक्त होगा, इसलिए इस भवन को सार्क को दे दिया जाये. इस बात पर टिपण्णी करते हुए, महाराष्ट्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ”मुफ्त में कौन इसे नहीं लेना चाहेगा और खास कर तब, जब सरकार भी उसका साथ दे !”

नियमतः, विशेष कर सर्वोच्च न्यायालय के एक मुकदमे के निर्णय के बाद, इस भवन पर बिना किसी हिचकिचाहट से मोहम्मद अली जिन्ना के वंशजों का हक बनता है लेकिन देखना यह है कि उनके वंशज कितने सामर्थ्यवान हैं और सरकार की नियत उनके प्रति कैसी है? जो भी हो, सार्क ने इस भवन के गेट पर अपना दावा ठोंक दिया है और एक बोर्ड लटका दिया है जो यह कहता है कि प्रपोज्ड साईट फॉर साउथ एशिया सेंटर फॉर आर्ट एंड कल्चर.

बहरहाल, पिछले दिनों देश में राजा महमूदाबाद और उनकी सम्पत्ति के हकदार बहुचर्चित रहे. यह मामला क्या केवल राजा साहब की सम्पत्ति तक ही सीमित रहेगा या फिर कानून के दायरे में अन्य पाकिस्तानियों की सम्पत्तियां जो भारत में हैं, उन पर भी लागू होगा ? चूंकि यह सुप्रीम कोर्ट का निर्णय है, इसलिये पाकिस्तान चले गए अनेक मुहाजिर इस मामले में अपनी सम्पत्तियों के बारे में दावा पेश कर सकते हैं. यदि कानून राजा मेहमूदाबाद के उत्तराधिकारियों को उनकी सम्पत्ति  लौटा देने का हुक्म देता है, तो फिर पाकिस्तान चले गए अन्य लोगों को क्यों नहीं ? यह तो एक प्रकार का विवाद का पिटारा है, जिसे भारत सरकार ने खोल दिया है. जूनागढ से लगाकर हैदराबाद चले गए मुहाजिरों की बांछे खिल गई है. कुछ ही दिनों में इस प्रकार के विवादों का ढेर लग जायेगा.

बंटवारे के बाद जो पाकिस्तान चले गए उनके परिवार के बहुत सारे वंशज आज भी भारत में रहते हैं, और वे किसी न किसी दस्तावेज के आधार पर यह चुनौती देंगे कि वह अमुक व्यक्ति का कानूनी उत्तराधिकारी है, इसलिये अमुक सम्पत्ति उसकी है और उसे वह संपत्ति मिल जानी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस दिशा में उसके लिए सहायक बनेगा और भारत में रह गए पाकिस्तानियों के सगे संबंधियों को उक्त अचल सम्पत्ति पर अधिकार मिल जाएगा. भारत सरकार ने राजा मेहमूदाबाद सहित इस प्रकार के भगोडों की कुल 2186 सम्पत्ति जब्त की थी. इसमें 1100 सम्पत्ति के अकेले दावेदार राजा मेहमूदाबाद के पुत्र अमीर मोहम्मद खान उर्फ सुलेमान मियां को मिल जाएगी. शेष 1086 सम्पत्ति जो भारत सरकार के पास रहने वाली है. उसके दावेदार भी बिलों से निकल कर इस मांग को दोहराने वाले हैं कि उनके बाप दादा की सम्पत्ति इस निर्णय के तहत उन्हें लौटा दी जाएं. उक्त निर्णय मोहम्मद अली जिन्ना की पुत्री के लिए भी वरदान साबित होनेवाला है.

जब 1949 के कस्टोडियन एक्ट और 1965 के शत्रु सम्पत्ति कानून की बात करते हैं, तब हमारे सामने मोहम्मद अली जिन्ना, जो 1947 में पाकिस्तान चले गए थे, के मुंबई स्थित बंगले का विवाद सामने आकर खडा हो जाता है. जिन्ना के बंगले का मामला पिछले कई वर्षों से मुंबई उच्च न्यायालय में चल रहा है. जाहिर है, उनकी उक्त सम्पत्ति को कस्टोडियन कानून के अंतर्गत भारत सरकार को अधिग्रहित करने में कोई हिचकिचाहट नहीं थी. जिन्ना ने उस समय भारत में रहनेवाले उनके किसी सगे संबंधी को वारिस बनाकर यह बंगला उन्हें सौंपा नहीं था. इसलिये बंगले पर सरकार के लिए कानूनी तौर पर कब्जा करने में कोई कठिनाई नहीं थी. लेकिन जवाहरलाल नेहरू के बीच में आ जाने से ऐसा नहीं हो सका.

जब नहरी पानी विवाद संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिये तत्कालीन सिंचाई मंत्री काका साहेब गाडगिल पाकिस्तान गए थे, उस समय नेहरू जी ने उनसे कहा था कि वे जिन्ना से पूछें कि उनके बंगले का क्या करना है? काका साहेब गाडगिल ने जब जिन्ना से पूछा तो जिन्ना एकदम भावुक हो गए और कहने लगे कि जवाहरलाल से कहो मेरा बंगला मुझसे नहीं छीने. मैंने अपना यह बंगला कितने अरमानों से बनाया है. कुछ जानकारों का मानना है कि जिन्ना ने गाडगिल जी से यह भी कहा था कि क्या पाकिस्तान में सब कुछ ठीक ठाक हो जाने के बाद मैं भारत लौट कर अपने इस बंगले में रहूं ? पाकिस्तान जिन्ना ने अपनी हठधर्मी से बना तो लिया था, लेकिन वहां जिस प्रकार उन्होंने नवाबों और जमीदांरों का उत्पात देखा और कट्टरवादी मौलाना जिस तरह से पाकिस्तान को इस्लामी देश बनाने के लिए उतावले थे, उससे घबराकर मन ही मन जिन्ना अपनी गलती पर पछताने लगे थे. लेकिन उनमें इतना नैतिक साहस नहीं था कि वे पीछे हटते और अखंड भारत के लिए फिर से तैयार हो जाते. कुल मिलाकर जिन्ना के जीवन में भारत लौटने का अवसर कभी नहीं आया और माउंट प्लेजेंट रोड स्थित उक्त बंगला ज्यों का त्यों खडा रहा.

जिन्ना की मृत्यु के समय भारत सरकार चाहती तो तुरंत हस्तगत कर लेती, लेकिन तत्कालीन कांग्रेसियों का जिन्ना प्रेम मन में से नहीं गया और वह बंगला अनिर्णित रहा. जिन्ना की मृत्यु के पश्चात् उनकी पुत्री दीना वाडिया ने उक्त बंगले का वारिसदार स्वयं को बतलाया और भारत सरकार से आग्राह किया कि उक्त बंगला उसको सौंप दिया जाए. इस बीच पाकिस्तान सरकार ने भारत से मांग की कि उक्त सम्पत्ति उसके निर्माता की है, इसलिए यादगार के बतौर उसके हवाले कर दी जाए. यही नहीं सरकार ने अपनी मंशा भी बतला दी कि वह बंगले में पाकिस्तान कौंसलेट खोलना चाहती है. जब दीना वाडिया ने अपना अधिकार जतलाया तो मामला कोर्ट में पहुंच गया. तब से शत्रु की यह सम्पत्ति कानूनी उलझनों में फंसी हुई है.

वास्तव में तो 1949 में एवेक्यू प्रोपेरटी एक्ट के तहत यह बंगला महाराष्ट्र सरकार के अधीन चला गया है. लेकिन मामला कोर्ट के तहत होने के कारण महाराष्ट्र सरकार इसको अपने कब्जे में नहीं ले सकी है. इस समय इसके दो प्रबल दावेदार हैं. एक तो 91 वर्षीय जिन्ना की पुत्री दीना जो भले ही अमेरिका में रहती हों, लेकिन दीना का कहना यह है कि वह अपने पिता की एकमात्र संतान है, इसलिए उन्हें यह जायदाद मिलना चाहिए. लेकिन जिन्ना ने 30 मई 1939 में जो वसीयत की है, वह कुछ और ही कहती है.

 

उक्त वसीयत के अनुसार उनकी तीन बहनें फातिमा, शीरिन और बिलकीस को उन्होंने अपनी चल अचल सम्पत्ति में हिस्सेदार बनाया है. उनके एक भाई अहमद को भी कुछ नगद धन राशि दी है. इसी प्रकार मुंबई विश्वविद्यालय और अंजुम ने इस्लाम को भी वसीयतनामे में शामिल किया है. इस वसीयत में दीना वाडिया के बारे में कहा गया है कि मैंने अपने मुवक्किल को यह बतलाया है कि मेरे दो लाख रुपए का छः प्रतिशत जोकि लगभग एक हजार रुपए होंगे उनको जीवन भर दिया जाता रहे और उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी संतानों में दो लाख रुपये का बंटवारा कर दिया जाए. इनमें पुरुष और स्त्री के बीच कोई अंतर नहीं होगा. इस वसीयत के चौथे लाइन में लिखा गया है कि मुंबई के मालाबार हिल के माउंटप्लेंजेंट रोड स्थित घर, उसकी समस्त जमीन, घर का समस्त सामान गाडियों सहित फातेमा जिन्ना को (जिन्ना की बहन) को दे दिया जाए. दीनावाडिया ने इस वसीयत को खारिज करते हुए कहा है कि मेरे पिता श्री मोहम्मद अली जिन्ना ने ऐसी कोई वसीयत अपने पीछे नहीं छोडी है. इस बात को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय में वर्षों से यह मामला लंबित है. इसमें दो राय नहीं हो सकती कि दीना ने जब पारसी युवक वाडिया से विवाह कर लिया उस पर जिन्ना बहुत नाराज थे. दीना ने उसी समय पाकिस्तान छोड दिया था.

जिन्ना की जब मृत्यु हुई उससमय भी दीना उनके पास नहीं थी. भाई अहमद की तो भारत में ही मृत्यु हो गई थी. दो बहने विवाद के पश्चात मुंबई में स्थायी थी और केवल फातिमा जिन्ना उनके साथ थी. जब जिन्ना ने भारत को हमेशा के लिए अलविदा किया उस समय भी फातिमा उनके साथ थी. अयूब खान के समय में फातिमा की मृत्यु हुई.चूंकि फातिमा ने अयूब खान के विरुद्ध चुनाव लडा था,उसके पश्चात दोनों के बीच अच्छे संबंध नहीं थे. एक दिन सवेरे फातिमा जिन्ना को उनके घर में मृत पाया गया. फातिमा की एक नौकरानी ने जब उन्हें सवेरे मरा हुआ पाया तब लोगों को समाचार मिला. फातिमा जिन्ना ने अपनी आत्मकथा में बहुत कुछ लिखा है . मोहम्मद अली जिन्ना जब बीमार थे, उस समय उन्हें जियारत नामक हिल स्टेशन पर रखा गया था. वहां पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री लियाकत खान ने उनके साथ ऐसा हीन व्यवहार किया उसे पढकर आज भी लोगों की आंखों में आंसू आ जाते हैं. जिन्ना की मौत के समय केवल उनकी बहन फातिमा ही उनके साथ थी.

पिछले दिनों जिन्ना के इस बंगले के उत्तराधिकारी के रूप में एक व्यक्ति का नाम और भी सामने आया. मोहम्मद इब्राहीम नामक एक व्यक्ति ने कोर्ट में याचिका दायर करके यह बतलाया कि वह फातिमा जिन्ना का लडका है. उक्त बंगला मोहम्मद अली जिन्ना ने मेरी मां के नाम पर वसीयत किया है. मेरी मां ने मुझे इस बंगले का कानूनी वारिसदार घोषित किया है. इसलिये यह सम्पत्ति दीना वाडिया की नहीं, बल्कि मेरी माता फातिमा की है. जिन्ना के इस विवादास्पद बंगले का सही वारिसदार कौन है ? इसका निर्णय करने संबंधी मुकदमे की सुनवाई मुंबई उच्च न्यायालय के दो न्यायमूर्ति डी के दिनेश और एन डी देशपांडे की खंड पीठ कर रही है. इसका निर्णय आने के पश्चात ही इस मामले का अंत आ सकेगा. लेकिन सवाल यह है कि अब तक महाराष्ट्र सरकार इस मामले में ढील क्यों दे रही है?

महाराष्ट्र मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी का कहना है कि चुंकि यह मामला वर्षों से मुंबई उच्च न्यायालय में लंबित है, इसलिए इस विषय पर किसी प्रकार की टिप्पणी करना न्यायालय का अपमान करना होगा. वैसे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस मामले को बहुत ही आसानी से समाप्त किया जा सकता है. एक अन्य अधिकारी ने कहा कि मुंबई जैसे शहर में इस भवन पर कोई भी कब्जा करना चाहेगा चाहे उसके लिए कितनी ही कीमत अदा करनी पड़े. आज कि तारीख में मुंबई शहर में इस भवन की कीमत 100 करोड़ से कम नहीं होगी

बहरहाल, हम चाहे भारत-पाकिस्तान संबंधों के बारे में कार्यालय में बैठकर चाहे जितना भी ढिन्ढोरा पीट लें कि हम सही दिशा की ओर उन्मुख हैं सच्चाई यह है कि सरकारी स्तर पर हम आज भी उनते ही कन्जेर्वेटिव हैं जितना 66 साल पहले थे. क्यों नहीं एक “जगह और स्थान” से ही सही, एक मधुरतम रिश्ते की शुरुआत करें.

 

 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Sudhanshu says:

    कोई भाँग के नशे में ही जिन्ना की तुलना शहीद भगत सिंह के साथ कर सकता है.
    भगत सिंह का जितना योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में है उतना ही पाकिस्तान की आज़ादी में भी है. इसलिए अगर पाकिस्तान उनको याद करता है तो किसी ताज्जुब की बात नहीं होनी चाहिए.

    लेकिन कोई ये बताए, जिन्ना ने ऐसा क्या किया जिसकी वज़ह से आपने उसकी तुलना भगत सिंह जी से कर दी ??
    भारत के विभाजन में इस शख्स की अहम भूमिका रही, देश की आज़ादी के लिए लड़ने की बजाये, अंग्रेजों के साथ मिल कर इसने देश के बटवारे की साजिस रची.

    सीधे लफ़्ज़ों में इस लेख को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है उससे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानियों का अपमान ही होता है.

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