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नई दृष्टि और नवीन विचारों के चितेरे डॉ. लोहिया

By   /  October 12, 2012  /  No Comments

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-प्रणय विक्रम सिंह||
समाज मे व्याप्त प्रत्येक प्रकार की असमानता के विरुद्घ बुनियादी संघर्ष का बिगुल फूंकने वाले विचार का नाम है समाजवाद। समाजवाद वह अवधारणा है जो समाज में घर कर चुकी दमित व मानवता विरोधी मान्यताओं का पुरजोर विरोध कर समतामूलक समाज की स्थापना के लिए व्यवस्था व संस्कार के बुनियादी ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन की वकालत करता है। डॉ० राम मनोहर लोहिया इसी रास्ते के वह फकीर थे जिनके पग चिन्हों को तलाशते हुए महादेश भारत के अनेक सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्त्ता व्यवस्था परिवर्तन से सत्ता परिवर्तन की राह के पथिक बने।  
डॉ० लोहिया का जीवन अनेक वैचारिक विरोधाभासों का समुच्चय है। वह प्रखर राष्ढ्रवादी थे किंतु विश्व सरकार का सपना आंखों में संजोए थे। गांधी जी से बेहद प्रभावित थे किन्तु गांधी दर्शन को अपूर्ण मानते थे। मार्क्सवाद में उनकी प्रखर रूचि थी किंतु उसे एकांगी करार देते थे। विकास के संदर्भ में उनकी अवधारणा नेहरू के समाजवादी माडल से बिल्कुल इतर थी।  लोहिया एक नई दृष्टिड्ढ और नवीन विचार के चितेरे थे। उन्होंने मार्क्सवाद और गांधीवाद दोनो विचारों को परिस्थिति की उत्पत्ति माना और जो विचार परिस्थिति-जनित होता है वह स्थिति के परिवर्तित होते ही अप्रसंागिक हो जाता है। अर्थात विचार का सर्वकालिक, सर्वग्राही होने के लिए परिस्थिति कि निरपेक्ष होना अनिवार्य है। लोहिया जी इस अनिवार्य शर्त की आधारशिला पर एक समतामूलक समाज के निर्माण को कटिबद्व थे। लिहाजा समाज मे व्याप्त असंतोष और असमानता विरूद्घ चेतना और जागृति को मसाला और स्थापित मान्यताओं के विरूद्घ प्रत्येक विचार को नींव की ईट का प्रतीक मानते हुए समतामूलक समाज की विचार रूपी इमारत की रूपरेखा तैयार की जो कि सर्वकालिक, परिणामदायक व युगान्तकारी है । दरअसल लोहिया भारतीय समाज में ड्ढव्याप्त वैषम्य यथार्थ की मार्मिक अनुभूतियों से वाकिफ थे। उन्होंने जाति की निर्ममता, समाज की धुरी स्त्री की दोयम दर्जे की स्थिति, मुफलिसी से तंग आकर काबलियत और इंसानियत को मरते देखा था। उन्होंने अग्रेंजो के रंगभेद, भारत के जाति भेद और विश्व समाज के वर्ग भेद की विभीषिका को समातमूलक समाज की स्थापना के लिए सबसे अवरोधक के रूप में चिन्हित किया। चिन्हित अवरोधको के विरूद्घ किए गये संघर्ष और संघर्षों में पगेे अनुभवों की विचारकृति ने लोहियावाद नामक दर्शन को प्रतिपादित किया, जो काल-निरपेक्ष था। लोहिया के व्यक्तित्व में सन्तुलन और सम्मिलन का समावेश है। उनका एक आदर्श विश्व-संस्कृति की स्थापना का संकल्प था। वे हृदय से भौतिक, भौगोलिक, राष्ट्रीय व राजकीय सीमाओं का बन्धन स्वीकार न करते थे, इसलिए उन्होंने बिना पासपोर्ट ही संसार में घूमने की योजना बनाई थी और बिना पासपोर्ट बर्मा घूम आये थे।
लोहिया की आत्मा विद्रोही थी। अन्याय का तीव्रतम प्रतिकार उनके कर्मों व सिद्धान्तों की बुनियाद रही है। प्रबल इच्छाशक्ति के साथ-साथ उनके पास असीम धैर्य और संयम भी रहा है। आइये देखते हैं कि कैसे प्रासंगिक है लोहिया के विचार? लोहिया जी ने अपनी संघर्ष यात्रा के प्रारम्भ से ही राजनीति में परिवारवाद का प्रबल विरोध किया था। नेहरू और कांग्रेस की कार्यशैली के विरोध में परिवारवाद का विरोध भी शमिल था। उनका विचार था कि राजनीति का परिवारवाद भविष्य में राजवंशों की प्रति-कृति होगा जो लोकतंत्र की बुनियाद में सामंतवाद के बीज का अंकुरण का कारक बनेगा और जम्हूरियत अपने उद्देश्यों में असफल होकर एक अप्रसांगिक व्यवस्था बन कर रह जायेगी। वर्तमान वैश्विक राजनीति में इस आंशका के बादल स्पष्टड्ढ दिखाई पड़ रहे है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत समेत यूरोप के अनेक देशों की राजनीतिक व्यवस्था परिवारवाद के दंश से ग्रसित है। हिंदुस्तान में ही कई सियासी तंजीमें बड़े-बड़े सियासी घरानों की निजी मिल्कियत की सूूूूरत में ‘जनता’ की सेवा का व्रत लेकर समाजिक परिवर्तन के लिए, दिन-रात एक किए हैं। हास्यास्पद है कि अनेक आन्दोलनो में अग्रणी कार्यकर्त्ता ऐसे ‘जम्हूरी राजवंशो’ के वारिसों को अपना नेता मानने को विवश होते है। लोहिया जी ने इसी दुर्भागयपूर्ण स्थिति से बचने के लिए राजनीति में परिवारवाद की विष-बेल के समूल नाश की वकालता की थी। उनका दृढ़ विश्वास था कि समाज की समतामूलक अवस्था में जाति सबसे बड़ी बाधा है। इस बाधा को हटाने के लिए उन्हें जाति तोड़ो का नारा दिया। पर वह इस तथ्य से भी भलीभांति वाकिफ थे कि बगैर आर्थिक प्रगति के वंचित वर्ग समाज की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं हो सकता अतरू वह आरक्षण को एक युगांतकारी प्रयास मानते हुए तात्कालीन आवश्यकता बताते हैं।
लोहिया अनेक सिद्धान्तों, कार्यक्रमों और क्रांतियों के जनक हैं। वे सभी अन्यायों के विरुद्ध एक साथ जेहाद बोलने के पक्षपाती थे। उन्होंने एक साथ सात क्रांतियों का आह्वान किया। वह इन क्रांतियों के बारे में बताते हैं कि सातों क्रांतियां संसार में एक साथ चल रही हैं। अपने देश में भी उनको एक साथ चलाने की कोशिश करना चाहिए। जितने लोगों को भी क्रांति पकड़ में आयी हो उसके पीछे पड़ जाना चाहिए और बढ़ाना चाहिए। बढ़ाते-बढ़ाते शायद ऐसा संयोग हो जाये कि आज का इन्सान सब नाइंसाफियों के खिलाफ लड़ता-जूझता ऐसे समाज और ऐसी दुनिया को बना पाये कि जिसमें आन्तरिक शांति और बाहरी या भौतिक भरा-पूरा समाज बन पाये। उन्होंने सदियों से दबाये एवं शोषित किये गये दलित एवं पिछड़े वर्ग को ज्यादा अधिकार देने की बात की। वे कहते थे कि ब्राह्मणवाद बुरा है लेकिन ब्राह्मण विरोध भी उतना ही बुरा है। जाति तोडने और अन्तरजातीय विवाह की तरफदारी करने वाले डॉ. लोहिया का मानना था कि सामाजिक परिवर्तन सभी जातियों के सहयोग के बिना संभव नहीं है।  वह कहते है कि जब तक तेली, अहीर, चमार, पासी आदि में से नेता नहीं निकलते, छोटी जाति में कहे जाने वाले लोगो को जब तक उठने और उभरने का मौका नहीं दिया जाता, देश आगे नहीं बढ़ सकता। कांग्रेसी लोग कहते है पहले छोटी जाति के लोगो को योग्य बनाओ फिर कुर्सी दो। मेरा मानना है कि अवसर की गैर बराबरी का सिद्धांत अपनाना होगा। देश की अधिसंख्य जनता जिसमे तमोली, चमार, दुसाध, पासी, आदिवासी आदि शामिल है, पिछले दो हजार वर्षो से दिमाग के काम से अलग रखे गये हैं। जब तक तीन चार हजार वर्षो के कुसंस्कार दूर नहीं होता, सहारा देकर ऊंची जगहों पर छोटी जातियो को बैठना होगा। चाहे नालायक हो तब भी।
लोहिया को भारतीय संस्कृति से न केवल अगाध प्रेम था बल्कि देश की आत्मा को उन जैसा हृदयंगम करने का दूसरा नमूना भी न मिलेगा। समाजवाद की यूरोपीय सीमाओं और आध्यात्मिकता की राष्ट्रीय सीमाओं को तोडकर उन्होंने एक विश्व-दृष्टि विकसित की। उनका विश्वास था कि पश्चिमी विज्ञान और भारतीय अध्यात्म का असली व सच्चा मेल तभी हो सकता है जब दोनों को इस प्रकार संशोधित किया जाय कि वे एक-दूसरे के पूरक बनने में समर्थ हो सकें। भारतमाता से लोहिया की मांग थी हे भारतमाता ! हमें शिव का मस्तिष्क और उन्मुक्त हृदय के साथ-साथ जीवन की मर्यादा से रचो। ऐसे कालजयी, वैश्विक द्रष्टि वाले राष्ट्रवादी, समाजिक,राजनैतिक युगांतकारी हुतात्मा को ऋणी समाज की ओर से कोटि-कोटि श्रद्धांजली!!
(लेखक स्तंभकार हैं)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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