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जेसिका लाल हत्याकांड के दोषी मनु शर्मा को तिहाड़ ने दिया फरलो..

By   /  October 13, 2012  /  1 Comment

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जेसिका लाल हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहे मनु शर्मा जेल से बाहर छुट्टियां बिताकर वापस तिहाड़ आ गया और किसी को कानो कान भनक तक नहीं लगी. तिहाड़ प्रशासन ने उसे एक सप्ताह के लिए फरलो (पैरोल) दिया था. यह पहला अवसर है, जब मनु शर्मा को फरलो की सुविधा दी गई है. इससे पहले बड़े अपराधों में शामिल कैदियों को फरलो नहीं दी गई थी. मनु शर्मा घूमने व जेल से बाहर परिवार के साथ समय बिताने के लिए तिहाड़ से 29 सितंबर को बाहर निकला और 7 अक्टूबर को वापस आया. फरलो तिहाड़ जेल प्रशासन ने स्वीकृत किया था.

मनु शर्मा दस साल से तिहाड़ जेल में बंद है. 24 सितंबर 2009 को मनु शर्मा को एक महीने के पैरोल पर छोड़ा गया था. तब मनु शर्मा ने कहा था कि दादी की अंतिम संस्कार में हिस्सा लेना है. बाद में दिल्ली सरकार ने पैरोल की अवधि एक महीना और बढ़ा दी थी, जिसके बाद वह दिल्ली के एक डिस्कोथेक में देखा गया था. वर्ष 2010 में तिहाड़ जेल में फरलो की सुविधा लागू किए जाने पर कहा गया था कि फासी व आजीवन कारावास की सजा पाए कैदियों को इस सुविधा से दूर रखा गया है. इस वजह से मनु शर्मा को फरलो नहीं मिली.

इस वर्ष सात सितंबर को मनु शर्मा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें उसने कहा था कि पिछले 19 महीने से उसकी फरलो की अर्जी पर विचार नहीं हो रहा है. इसके बाद कोर्ट ने सरकार से 17 सितंबर को अपना जवाब देने को कहा था. तिहाड़ जेल के कानून अधिकारी सुनील गुप्ता ने कहा कि हाईकोर्ट ने मनु शर्मा को फरलो देने का आदेश नहीं दिया. तिहाड़ को कहा गया कि इस पर खुद ही फैसला करे. जेल अधिकारियों का कहना है कि फरलो के नियमों में कुछ बदलाव किए गए हैं. लूट, डकैती, अपहरण, दुष्कर्म, वसूली व आपराधिक प्रवृत्ति के कैदियों को छोड़ अन्य कैदियों को यह सुविधा मिल सकती है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. SHARAD GOEL says:

    हत्या कोई बड़ा जुर्म नहीं हे ऐसी हत्याए तो अप्रत्यक्ष रूप से केंद्रीय सर्कार ६० साल से करती आ रही हे ……………….लोगो को समझ आना चाहिए हत्या करना सबसे आसान अपराध हे

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