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लघु एवं मध्यम पत्र-पत्रिका संघ ने दिया धरना…

By   /  October 13, 2012  /  No Comments

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छोटे अखबार ही सही मायने में पत्रकारिता के झंडाबरदार रहे हैं मगर बड़े उद्योगपतियों के अख़बारों, भ्रष्ट सरकारी तंत्र और स्वार्थी राजनीति के काकस ने छोटे और मंझोले पत्रों की कमर तोडने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यही नहीं बड़े अख़बारों ने अपने प्रभाव से सरकारी विज्ञापनों की नीतियां भी इस तरीके से बनवा दी कि उनका लाभ सिर्फ बड़े अख़बारों को ही मिले… सुशासन बाबू और उनके अधिकारी भी इस दुष्चक्र में ऐसे फंसे कि विज्ञापनों का सारा बज़ट बड़े अखबार जीम गए और प्रशासन के दुष्कर्म महिमामंडन में तब्दील हो गए. नतीज़े में सुशासन बाबू को मिले चप्पल-जूत्ते, सड़े अंडे, पत्थर और गालियां.
अब छोटे अखबार आंदोलन की राह पर हैं. समय रहते कथित सुशासन (कुशासन) सरकार नहीं चेती तो ये छोटे अखबार उनका ऐसा बाजा बजायेंगे कि नीतीश कुमार को अर्श से फर्श पर आते देर नहीं लगेगी….

पटना। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में लघु एवं मध्यम पत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आज भी ज्वलंत एवं स्थानीय मुद्दों को छोटे पत्र-पत्रिका ही उठाकर लोगों को इंसाफ दिलाने का काम करते हैं। लेकिन राज्य सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति के कारण आज सूबे की छोटी एवं मध्यम पत्र-पत्रिकाएं मृतप्राय स्थिति में पहुंच गई है। राज्य सरकार की विज्ञापन नीति से केवल चंद बड़े मीडिया घरानों को ही लाभ पहुंच रहा है।

उक्त बातें आज राजधानी के गांधी मैदान स्थित जेपी गोलबंर पर राज्य के लघु एवं मध्यम पत्र-पत्रिका संघ और क्षेत्रीय मीडिया संघ के तत्वाधान में आयोजित एक दिवसीय धरना को संबोधित करते हुए अध्यक्ष ब्रजेश मिश्र ने कही। उन्होंने कहा कि यह धरना राज्य सरकार की विज्ञापन नीति 2008 में संशोध्न की मांग समेत 6 सूत्री मांगो को ले आयोजित किया गया। संघ की तरपफ से राज्य सरकार से मांग की गई कि स्थानीय मीडिया समूहों, उनमें काम करने वाले मीडियाकर्मियों को विशेष सहायता मिले। संघ की तरफ से स्थानीय लघु एवं मध्यम श्रेणी के मीडिया समूहों को वित्तीय सहायता भी देने की मांग की गई है। धरना को संबोधित करते हुए श्री मिश्र ने कहा कि पूरे देश में बिहार ही एकमात्र ऐसा राज्य है जो लघु मध्यम एवं क्षेत्रीय मीडिया समूहों को न तो प्रोत्साहन देती है न ही विज्ञापन। श्री मिश्र ने राज्य सरकार पर भेदभाव बरतने का आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि संघ शांतिपूर्ण धरना दे सरकार को यह बताने की कोशिश कर रही है कि मुख्यमंत्री जो कि इन दिनों राज्य के अध्किार की बात पर आंदोलन की तैयारी में जुटे हैं मगर उन्हें अपनी सरकार और विभागीय अधिकारियों द्वारा की जा रही मनमानी और ज्यादतियां नहीं दिख रही है।

संघ के महासचिव राजीव रंजन चौबे ने कहा कि केन्द्र से अपना अधिकार मांगने से पहले राज्य सरकार को बिहारवासियों को उनका अधिकार देना चाहिए जिसका वादा मुख्यमंत्री ने 7 वर्ष पूर्व सत्ता संभालते समय किया था। उन्होंने कहा कि पहले की सरकार की विज्ञापन नीति स्पष्ट थी कि लघु एवं मध्यम पत्र-पत्रिकाओं को बढ़ावा दिया जाये। उन्होंने राज्य सरकार पर भेद-भाव बरतने का आरोप लगाते हुए यह मांग की कि सरकार द्वारा चंद बड़े मीडिया संस्थानों को करोड़ों का लाभ पहुंचाने की मंशा की निष्पक्ष जांच करायी जानी चाहिए। राज्य में आधा दर्जन के करीब बड़े एवं बाहरी मीडिया घराने हैं जो सैंकड़ों स्थानीय व क्षेत्रीय मीडिया की हकमारी कर रहे हैं।

संघ के उपाध्यक्ष उमाशंकर सिंह ने सवाल उठाया कि ऐसा करके सरकार या तो मीडिया पर नियंत्रण करना चाहती है या फिर सरकार विरोधी खबर छापने वालों का सपफाया? क्या किसी राज्य को ऐसी नीति बनाने का संवैधानिक अधिकार है जिससे मुट्ठी भर लोगों को फायदा पंहुचे और हजारों लोगों को नुकसान?

धरना में ऑल बिहार यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट एवं इंडियन मीडिया वर्किंग जर्नलिस्ट की बिहार शाखा के सदस्यों ने भी भाग लिया। मंच से पत्रकार संजीव शेखर ने भी संघ द्वारा उठाये मांगों का समर्थन किया। धरनास्थल पर उपस्थित सैंकड़ों मीडियाकर्मियों ने सरकार से सवाल पूछा कि क्यों ऐसी विज्ञापन नीति बनाने की जरूरत पड़ी जिसको चंद बड़े मीडिया घरानों को लाभ पहुंचे? ऐसी विज्ञापन नीति क्यों बनाई जिससे स्थानीय समाचार पत्र, पत्रिकाओं, न्यूज चैनलों व वेबसाइटों की उपेक्षा हो। एक तरफ राज्य को आर्थिक रूप से कमजोर बता मुख्यमंत्री विशेष राज्य का दर्जा की मांग को हमारा हक कह रहे हैं तो फिर सूबे के स्थानीय व आर्थिक रूप से कमजोर मीडिया समूहों के साथ भेदभाव क्यों? लघु एवं मध्यम तथा स्थानीय मीडिया ही स्थानीय मुद्दों पर सरकार से लड़ती है, क्या सिर्फ सरकार विरोधी खबरों का गला घोंटने के लिए ऐसी विज्ञापन नीति बनाई गई जिससे मीडिया की स्वतंत्रता प्रभावित कर सके सरकार? धरना पर बैठे मीडियाकर्मियों ने मांग की कि बिहार सरकार द्वारा 2008 में बनाई गई विज्ञापन नीति में अविलंब संशोधन हो ताकि स्थानीय लघु एवं मध्यम मीडिया समूहों को सरकारी विज्ञापन मिल सके। स्थानीय मीडिया समूहों को विशेष प्रोत्साहन की नीति बनें। लघु एवं मध्यम श्रेणी के स्थानीय मीडिया समूहों में कार्यरत मीडियाकर्मियों के लिए विशेष सहयोग नीति का निर्माण हो। सरकारी कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिए क्षेत्रीय मीडिया समूहों को प्राथमिकता मिले। लघु एवं मध्यम श्रेणी के स्थानीय मीडिया समूहों को रियायती दर पर कागज, स्याही व अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाए। लघु एवं मध्यम श्रेणी के स्थानीय मीडिया समूहों को विशेष वित्तीय सहायता दी जाए।

मीडियाकर्मियों के जोरदार नारों से धरनास्थल गूंज रहा था। बताया जाता है कि अपनी मांगों को लेकर संघ विगत 3 वर्षों में संघ की तरपफ से सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को राज्य सरकार की विज्ञापन नीति 2008 में आवश्यक संशोधन हेतु कई पत्र तथा स्मार पत्र दिये गए। इस संबंध में विभाग के संयुक्त निदेशक, निदेशक, सेक्रेटरी को लगातार पत्र लिखा गया है। धरना का समर्थन करते हुए इंटक के अध्यक्ष चंद्रप्रकाश सिंह ने कहा कि सरकार इनकी मांगों का अनदेखा करके गलत कर रही है। ऐसा नहीं होना चाहिए। वहीं प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया के सदस्य और बिहार श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष अरूण कुमार ने संघ की मांगो का समर्थन करते हुए कहा कि यह इनका हक है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की भेदभाव पूर्ण नीति की जांच के लिए पीटीआई ने भी एक तीन सदस्यीय कमिटी भी गठित की है जिसके सदस्य नाग बाबू, बरूआ जी के अलावा अरूण कुमार भी हैं।

गौरतलब है कि  पिछले वर्ष मुख्यमंत्री से भी मिलकर इस संबंध में एक पत्र सौंपा जिसके बाद उन्होंने तत्कालीन सूचना सचिव को अपने जनसंपर्क पदाधिकारी से आवश्यक कारवाई का निर्देश दिया था। इसके बावजूद आज तक कारवाई नहीं हुई। अपनी बातों को जोरदार तरीके से रखने के लिए उक्त सदस्यों के अलावा लघु एवं मध्यम पत्र-पत्रिका संघ के सचिव रणध्ीर कुमार मिश्रा, कोषाध्यक्ष संजय कुमार, उपसंयोजक राजीव रंजन, अखिलेश, संजय कुमार सिंह, प्रमोद दत्त, राघवेन्द्र, अरूण कुमार सिंह, रितेश परमार, डा. कौशलेन्द्र नारायण, अनूप नारायण सिंह, शिवजी प्रसाद, संजय, प्रियदर्शी रंजन के साथ सैंकड़ों की संख्या में मीडियाकर्मी मौजूद थे।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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