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ठग्गू गणराज्य आफ बेवकूफ पब्लिक…

By   /  October 16, 2012  /  No Comments

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-आलोक पुराणिक||

खबर है कि झारखंड गिरिडीह में बेवकूफ होटल खूब चल रहे हैं. एक कारोबारी ने होटल खोला, नहीं चला. उसने नाम बदलकर कर दिया बेवकूफ होटल, कारोबार दौड़ने लगा. अब वहां बेवकूफ नंबर टू, महाबेवकूफ जैसे साइनबोर्ड सफलता से चमकते दिखते हैं. क्या पता, कुछ दिनों बाद ये बेवकूफ समूह टूरिस्ट पाइंट बन जाये शहर में.

कानपुर के ठग्गू के लड्डू तो खैर सुपर फेमस हैं अरसे से. ये बंटी और बबली फिल्म में इज्जत के साथ दिखायी दिये.

बेवकूफ और ठग्गू सफल हो रहे हैं, ये अच्छी खबर है कि खराब, जरा सोचिये.

अस्पताल वाले इस रुल को फालो करने लग जायें, तो हो सकता है कि दिख जाये कोई कातिल अस्पताल, हत्यारा क्लीनिक. जी चल निकलेगा. स्कूल अपने नाम बदल कर नये नाम कर दें-शातिर विद्यालय, चालू स्कूल, तस्कर महाविद्यालय. हो सकता है कि कई पेरेंट्स इन नये नामों को पसंद ही करने लगें. एकदम सच्चे सीधे बच्चे निकलें स्कूलों से, तो आफत है साहब. चालू, शातिर जमाना है, नयी चाल के स्कूल चाहिए.

इसी तर्ज पर रेलगाड़ियों के नाम हो सकते हैं-मौत के पहिये, दौड़ती मौत, सीटी बजाती चुड़ैल टाइप्स. ये नाम तो वाकई न्यायोचित ही लगेंगे. अभी एक बस देखी मैंने, बहुत धीमे चलती थी, कालेज के बच्चों ने उस पर लिख दिया –रुकी रफ्तार. एक स्कूटर पर मैंने बहुत पहले लिखा देखा था- दहेज दानव. स्कूटर धारी को वह दहेज में मिला था, शरारती मित्रों ने लिखवा दिया था उस पर-दहेज दानव. स्कूटर पूरे शहर में फेमस हो गया. दहेज दानव को पूरे शहर के ट्रेफिक हवलदार छेड़ते पकड़ते नहीं थे. बाद में देखादेखी में कई दहेज दानव स्कूटर शहर में चलने लगे. दहेज दानव एक तरह का प्रोटेक्शन हो गया, ट्रेफिक हवलदारों से. एक ट्रक का नाम था-चालबाज शेरनी. शेरनियां पढ़ी लिखी ना होतीं, वरना उस विकराल ट्रक की बदसूरती देखकर आत्महत्या कर लेतीं. जिन एयरलाइंसों में महीनों महीनों सेलरी नहीं मिलतीं, उनके जहाजों के नाम हो सकते हैं-फकीर का उड़नखटोला, भगवान के नाम पर, बेगार यान.

मेरा एक मित्र है, पिताजी ने नाम रखा रामबाबू. रामबाबू स्वर्ण भंडार-उसकी दुकान का नाम था. मैंने सुझाव दिया कि तू इसका नाम बदलकर इंगलिश स्टाइल का कर दे-रामबाबू का राब्स गोल्ड वर्ल्ड कर दे. राब्स का इंगलिश ट्रांसलेशन रब जैसा कुछ बना. मैंने सलाह दी कि तू डिफरेंट से आभूषण बना और कहा कि यह सूफी थीम की ज्वैलरी है. कुछ भी बना, सूफी थीम बोल. रब का ताल्लुक तेरी दुकान से हो ही गया है. साहब, क्या दुकान चल निकली. रब का नाम लेने का टाइम भी ना है अब उसके पास. रामबाबू से रब होते ही मौज आ गयी.

जमाना बदल रहा है, पब्लिक को डिफरेंट नाम अच्छे लगते हैं. सुलक्षणा, लक्ष्मी जैसे भले नाम लड़कियों को होते रहे हैं. मुझे कोई आश्चर्य ना होगा अगर डिफरेंट नाम के चक्कर में कुछ पेरेंट्स बच्चियों के नाम रख दें-कुलच्छनी, कुलटा. जैसे नौजवान आजकल के हो रहे हैं, उनमें ऐसे नाम वाली बालिकाओं का आकर्षण कहीं बहुत ही ज्यादा ना हो जाये. पर करते रहिये चिंता, पब्लिक बेवकूफ और ठग्गू के आइटम खा ही रही है.

अभी कुछ सरकारी अफसरों से मुलाकात हुई, तो उन्होने बताया कि उन्होने पारिभाषिक शब्दावली बनायी है. इसमें वह परम तर सीट, झमाझम रकम उगलने वाली पोस्ट को कहते हैं – ए के राजा सीट है वह. कम कमाई को वह बोफोर्स सीट बोलते हैं, सौ करोड़ से भी कम के घपले को और क्या कहें जी.

बल्कि मुझे तो लगता है कि वक्त आ गया कि इस देश का नाम भी बदल दिया जाये. नया नाम हो- ठग्गू गणराज्य आफ बेवकूफ पब्लिक..

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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