Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

अगर देश को एक रखना है तो संसाधनों को बांट दो

By   /  October 16, 2012  /  1 Comment

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-भंवर मेघवंशी||

हमारे देश में अब यही उचित वक्त है जबकि हम संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे की बात करे धरती हो चाहे धन, नौकरियां हो अथवा सत्ता अगर उन पर वर्ग विशेष का ही कब्जा बरकरार रहेगा तो इस देश को एक रख पाना मुश्किल होगा, इसलिए यह तय करना जरूरी है कि क्या बंटेगा-देश अथवा संसाधन? मुझे लगता है कि देश किसी भी कीमत पर एक रहना चाहिए, तो वह तभी संभव है जब हम लोगों को उनकी आबादी के अनुपात में हर क्षेत्र में भागीदारी दें. आरक्षण की खैरात नहीं, अधिकार संपन्न बनाने वाली हिस्सेदारी. अगर हम ऐसा कर पाने में विफल रहते है तो पूंजीपति और सत्ता व सुविधा से लैस वर्ग के लिए बुरे दौर की शुरूआत हो जाएगी, वे चाहे जितने विशेष आर्थिक क्षेत्र बना लें, पर उन खास दड़बों में छिपकर भी वे अपनी अमीरी को निरापद नहीं रख पाएंगे, और कहीं ऐसा न हो कि ये ही स्पेशल इकोनोमिक जोन ;सेजद्ध उनके लिए कैदखाने बन जाए और संपन्न तबका इनसे बाहर ही नहीं निकल पाए. इसे चेतावनी के रूप में ही लिया जाना जरूरी है क्योंकि एक तरफ संपन्नता का आलम यह है कि दिन दुनी रात चौगुनी और हफ्ते भर में सौ गुनी वृद्धि दर्ज की जा रही है, जिसे इंडिया नामक कंट्री कहा जाता है, उसकी विकास दर इस कदर आगे बढ़ गई है कि यह मुल्क ‘सुपर पावर’ बनने की तरफ अग्रसर है, वहीं, एक तरफ गांवों, खेतों, शहरी झोंपड़ पट्टों, फुटपाथों, जंगलातों में मेहनतकश मजदूर किसान का ‘भारत’ नामक देश इतना पीछे छूट गया है कि वह ‘सुपर पुअर’ बन चुका है.
कई लोगों ने इंडिया और भारत के बीच की इस दूरी पर चिंता प्रकट की है, वे इस खाई को कम करने पर जोर दे रहे है, मगर दिन-प्रतिदिन यह खाई बढ़ती ही जा रही है. इस देश का भला इसी में है कि यह खाई और अधिक गहरी न हो, इसको तुरंत पाटा जाना जरूरी है, और इसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी संपन्न सवर्ण तबके की है, वे इसे अपनी व्यक्तिगत और नैतिक जिम्मेदारी समझें कि देश के प्रत्येक नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सुनवाई तथा सम्मान, समान रूप से और निःशुल्क हासिल हो जाए, अन्यथा एक आसन्न चुनौती मुझे साफ दिखाई पड़ती है. जब कोई भी अमीर अपनी अमीरी को सुरक्षित नहीं रख पाएगा.
एक बदलाव, जो रचनात्मक हो सकता है, अगर हम उसका स्वागत नहीं करेंगे तो वह नकारात्मक बदला लेने वाला प्रतिशोध साबित होगा. जिनके पास सब कुछ है, वे लोग कांच के घरों में बैठे है, ऐसे शीश महल के रहवासियों की संख्या 20 फीसदी भी नहीं है, शेष आबादी के हाथों में पत्थर है, ये पत्थर किसी भी दिन इनके शीश महलों को तहस-नहस कर देंगे, इन्हें बचाना है तो इन हाथों के पत्थरों की जगह दूसरे काम दिए जाने चाहिए.
मैं संघर्षों की निरंतर तेज और पैनी होती धार को साफ महसूस करता हूं और भारत और इंडिया के मध्य गहराती खाई को भी, एक गांव में रहकर जब भी चकाचौंध वाले महानगरों की यात्रा करके वापस गांव लौटता हूं तो मुझे अपने ही देश में कई सारे देश नजर आते है, जिनसे अपने आपको अपरिचित पाता हूं.
आजकल हमारे गांवों के युवा बड़ी संख्या में अंग्रेजी सीख रहे है, वे निरंतर तेज रफ्तारी इस कारोबारी दुनिया की सुर-ताल और लय के साथ नाचना और गाना चाहते है, वे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना चाहते है, उन्हें लगता है कि अंग्रेजी एक आसान रास्ता हो सकती है, इंडिया में प्रवेश का, पर इंडिया के लोग अपने लिए दूसरे रास्ते बना रहे है, उन्हें मालूम हो गया है कि भारत के लोग अब अंदर आने को दरवाजा पीट रहे है, वे इंडिया में भागीदारी चाहते है इसलिए उन्होंने नए रास्ते ईजाद करने का पक्का प्रबंध कर लिया है.
पहले उन्होंने अंग्रेजी सीखी ताकि वे हम पर राज कर सके, आज वे हमें अंग्रेजी सिखा रहे है ताकि भाषायी कारोबार से लाभ उठा सके, कल वे अंग्रेजी को असहाय अवस्था में हमारे पास छोड़ कर एक नई हिंग्लश गढ़ लेंगे.
कल तक हमारे भारत में ‘बच्चों को स्कूल भेजो’ एक नारा था, आज हम उन्हें स्कूल भेजने लगे है तो टीचर नहीं आते, अब हम नारा लगा रहे है-‘मास्टरों को स्कूल भेजो’, वे कह रहे है, तुम्हारे लिए हम एक शानदार शिक्षा का अधिकार कानून ले आए है, शिक्षा अब हर बच्चे का अधिकार है, 25 फीसद गरीब बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ेंगे और भी न जाने क्या-क्या? पर मानसिकता वहीं द्रोणवादी है कि इस भारत के एकलव्य अगर पढ़ने आ जाए तो अव्वल तो उन्हें पढ़ाने से मना कर दो और फिर भी पढ़ जाए तो गुरूदक्षिणा के बहाने उनकी दक्षता रूपी अंगूठे को कटवा लो, ताकि न रहे बांस, न बजे बांसुरी.
हम कह रहे है कि हमें खाना दो, देश के 80 करोड़ लोग महज 20 रुपए में जिंदगी बसर कर रहे है, आज भी लोग भुखमरी के शिकार है, लोग फुटपाथों पर पड़े है, भूख के चलते उनके कुपोषित शरीर हमारी तरक्की की निंदा कर रहे है, वे कह रहे है कि यह भूख नहीं है, यह बीमारी है, आज तक किसी भी हुकूमत ने यह नहीं स्वीकारा कि कोई भूख या कुपोषण से मरा है, वे कहते है, ये बीमारी से मरे है, लेकिन भारत की ‘भूख नामक बीमारी’ को इंडिया समझने को तैयार नहीं है, अलबत्ता भूख पर सत्ता प्रतिष्ठान में बहुत बहस चल रही है, आजकल राजधानी दिल्ली में हुकूमत भूख से मुक्ति के लिए ‘खाद्य सुरक्षा कानून’ बना रही है, क्या हम कानून की फोटोकॉपियां खाएंगे और उसकी विभिन्न धाराओं को चबाएंगे? इस प्रकार क्या हम भूख और कुपोषण से मुक्त एक सुंदर और स्वस्थ मुल्क बनाने में कामयाब हो जाएंगे?
ऐसा ही हाल स्वास्थ्य का है, चिंता थी कि लोग अस्पताल नहीं जाते है, उनमें स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नहीं है, वे बच्चों का प्रसव अस्पताल में नहीं करवाते है, अब जबकि हम अस्पतालों में जाकर इलाज करवाने के लिए तैयार है तो उन्होंने इलाज इतना महंगा कर दिया है कि अस्पताल तक तो हम पहुंच गए है पर इलाज हमारी पहुंच से दूर चला गया है.
हमें सिखाया गया कि अपने अधिकार मांगना सीखो, बोलने की आजादी है, देश आजाद है, अपना ही राज है, नारा लगाओ, धरना करो, प्रदर्शन करो, अपने हक मांगो, हम डर गए थे, मगर हमने हिम्मत की, हमने संगठन बनाए, उन्होंने इन्हें अवैध घोषित कर दिया, हमने हक मांगे-उन्होंने हमें असामाजिक तत्व कहा, हमने धरने-प्रदर्शन किए, नारे लगाए, उन्होंने हमें अलगाववादी, उग्रवादी, कट्टरपंथी, नक्सलवादी, देश विरोधी, धर्मद्रोही जैसी कितनी ही संज्ञाए दे डाली, हम उनकी तरफ बढ़े कि उन्हें अपना दुखड़ा सुनाए, उन्होंने हमारे लिए तिहाड़ से लेकर बस्तर-दंतेवाड़ा, कश्मीर, पूर्वाेत्तर तक सब कहीं जेल के दरवाजे खोल दिए. हमारी बोलने की आजादी पर सत्तासीनों ने पहरे बिठा कर हमें खामोश कर दिया-हमने हरित क्रांति में हिस्सा लिया, वे जी.एम. और बी.टी. सीड्स ले आए, हमने जमीनों से प्यार किया, हमने धरती को माता कहा, हम वंदे मातरम् गाने लगे, सुजलाम सुफलाम मलयज शीतलाम् मातरम्, वे ‘जय हिंद’ और ‘नमस्ते सदा वत्सले’ गाते हुए आए और हमारी जमीनों का कारोबार करने लगे, पैसा दिया और उजाड़ दिया, कल तक जिन जमीनों पर हमारी फसलें लहलहाती थी, वहां आज मॉल, प्लाजा, सुशांत सिटी, सेज बनने लग गए. कल तक जिन पहाड़ियों पर हमारे देवताओं के मंदिर बने थे, आज उन पहाड़ियों को कोई वेदांता, जिंदल, मित्तल, अंबानी, टाटा खरीद कर खुदाई करने को आतुर है.
हमारी सदा-नीरा नदियां हमारी मां और मौसियां होती थी, जिनके आचमन से हमें जिंदगी मिलती थी और जिनसे हमारे पितरों की आत्माओं की पाप से मुक्ति होती थी, आज उन्हीं नदियों से, वे अब पाउचों और बोतलों में पानी भर कर बेचते है, बड़े-बड़े बांध बांधते है और उससे बिजली पैदा कर उसका भी कारोबार कर लेते है.
आज न हमारी धरती महफूज है और न ही बीज, न सूरज की किरणें सुरक्षित है और न ही औंस की बूंदे, समंदर से लेकर आसमान तक सब कुछ लुटा कर अब अगर हम होश में आ भी रहे तो इसका क्या मतलब है?
और यह सब जिन लोगों ने किया, उन्हें अपराधी नहीं कहा जाता, जिन्हें जेलों में होना चाहिए, वे संसद और विधानसभाओं तथा सचिवालयों को शोभायमान कर रहे है. और इस देश की मेहनतकश कमेरी औलादें हाथ में याचना का कटोरा लिए खड़ी है, जिनके हिस्से में कर्ज से डूबा, खंड-खंड विखंडित देश और एक रंगहीन फटा हुआ तिरंगा आया है जिसे हर स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र पर फहराना है और ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ का तराना गाना है. जिसको गाने की कोई तुक नहीं है मगर भूखे पेट भी देशभक्ति नहीं दिखाई तो देशद्रोही होने के इलजाम में जेल हो सकती है.
पर इन सब बातों की चिंता किसे है? कोई दूरसंचार के घोटाले करने में व्यस्त है तो कोई अनाज लूट खा रहे है, कोई अवैध और अन्यायपूर्ण उत्खनन के जरिए धरती की कोख उजाड़ना चाहता है तो कोई विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी करके देश की लूट में उन्हें शरीक करने पर तुला हुआ है, कोई 2 जी स्पेक्ट्रम के जरिए तरंगों का घपला आसमान में कर रहा है तो कोई पाताल में घुसकर कोयले की दलाली में काला मुंह कर रहा है. यह कैसा देश है जहां पर गरीब हर दिन इस मुल्क को अपने खून पसीने से सींचता है और अमीर इसकी रग-रग से लहूं को खींचता है, फिर भी अमीर लोग आदरणीय है, उन्हें ही सर्वत्र इज्जत है, वे ही इस सार्वभौमिक राष्ट्र के मालिक है, उनकी तरफ कोई अंगुली नहीं उठती है, कभी कभार गरीब पीड़ा से बिलबिलाता है और कसमसाने लगता है तो उसे कोरे कागजी कानूनों की नांवों पर सवार करके मझधार में डूबने के लिए छोड़ दिया जाता है. इस लूट के लुटेरों को मुल्क के मूल निवासी कैसे सबक सिखा पाएंगे? ये जो स्विस बैंकों में, अंतर्राष्ट्रीय बैकों में, राष्ट्रीय बैंकों में अथाह पूंजी आप हमसे लूट कर ले जा कर भर रहे है इन देशद्रोहियों का इलाज वर्तमान व्यवस्था के पास तो नजर नहीं आता है. इस व्यवस्था को आमूलचूल बदले बिना कोई भी परिवर्तन सफल नहीं होगा, हमें अब ढांचा बदलने की तैयारी करनी है और याद रहे कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती है…! पर क्या हम जिंदा कौम है, यह सिर्फ सवाल भर नहीं है, यह यक्ष प्रश्न है, जिसका जवाब व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई से निकल सकता है.
(लेखक दलित आदिवासी एवं घुमन्तु अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के संस्थापक है तथा डायमण्ड इण्डिया (पाक्षिक) व खबरकोश डॅाटकॅाम के सम्पादक है. उनसे पर सम्पर्क किया जा सकता है.)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Panusa Vijay says:

    "जिन्दगी हो तो ख्वाब है, ख्वाब है तो मंजिले है, मंजिले है तो रास्ते है, रास्ते है तो मुस्किले है, मुस्किले है तो हौँसले है, हौँसले है तो विश्वास है, विश्वास है तो सफलता है, सफलता है तो जिन्दगी है।".

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

जौहर : कब और कैसे..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: