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तो क्या राहुल गांधी ने किसान बनकर हरियाणा में दलितों की जमीन खरीदी…

By   /  October 19, 2012  /  No Comments

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भारतीय सविंधान के अनुसार भारत में आम नागरिक और खास नागरिक पर समान कानून लागू होता है. कानूनन दलित की ज़मीन सिर्फ दलित ही खरीद सकता है, कोई सवर्ण नहीं.. मगर हरियाणा में इसका ठीक उलट हुआ है. देश के सबसे सशक्त राजनैतिक नेहरू-गाँधी परिवार द्वारा पलवल में दलितों की ज़मीन खरीदने के दस्तावेज़ सामने आयें हैं. गौरतलब है कि आम और खास के फर्क ने USSR का भी विभाजन करवा दिया था.  USSR में एक वक़्त ऐसा आ गया था कि आम आदमी सामान्य से सड़क से ही जा सकता था और खास लोगों के लिए अलग से सड़कें बना दी गयी थीं. यही सड़कें सोवियत यूनियन को पतन के रास्ते पर ले गयी और आगे जाकर उसके कई टुकड़े हो गए…

-जयश्री राठौड़||

इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) प्रमुख व हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने आज उन दलितों के नाम उजागर किए जिनकी जमीन सोनिया गांधी के दामाद रावर्ट वाड्रा और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के नाम हुई है.

 

चौटाला ने कहा कि एक तरफ कांग्रेसी नेताओं द्वारा दलितों के घर जाकर खाना खाने जाते देखे जाते हैं और दूसरी तरफ दलित परिवारों की जमीनें औने-पौने दामों पर हड़पी जा रही हैं. उन्होंने कहा कि जिन दलित परिवारों से जमीनें खरीदी हैं उनमें शंकर लाल, यशपाल, रविंद्र कुमार, श्रीमती सरोज, राजबाला, शीला सुमन, मधुबाला, सुषमा व श्रीमती शांति देवी पत्नी किशन लाल के अलावा मामचंद, ज्ञानचंद, हरिचंद, महिपाल, शीशपाल व सोहन लाल आदि शामिल हैं.

गौरतलब है कि हरियाणा में ऐसी जमीन सरकार ने दलितों को सस्ती दरों पर दी थी. इन्हें तय समय तक बेचा नहीं जा सकता. अवधि के बाद अगर कोई दलित बेचता है तो वह केवल दलित को ही बेच सकता है. प्रदेश में पिछले कुछ कालों में ऐसी जमीनों को सवर्ण वर्ग के लोगों ने खरीदी है.

राबर्ट वाड्रा व राहुल गांधी द्वारा पलवल जिले के हसनपुर में खरीदी गई जमीनों के संबंध में कांग्रेस पार्टी के स्पष्टीकरण को तथ्यों से दूर बताया है. उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में हर किसी को जमीन, जायदाद खरीदने और बेचने का अधिकार है. अगर किसी जमीन के सौदे में बेकायदगी हुई हो या किसी व्यक्ति विशेष को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी राजस्व के नुकसान होने के आरोप लग रहे हों तो ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए.

इनेलो प्रमुख ने कहा कि पलवल जिले के हसनपुर गांव की जमीनें करीब 31 साल पहले 1981 में पुनर्वास विभाग हरियाणा द्वारा दलित परिवारों के बीच सीमित बोली करवाकर उन्हें अपना गुजर-बसर करने के लिए किस्तों पर अलाट की थी. इनमें से कुछ जमीनें दलालों ने खरीद ली और 2008-09 में कांग्रेसी नेताओं व दलालों के माध्यम से हसनपुर की दलित परिवारों की इन्हीं जमीनों को औने-पौने दामों में राबर्ट वाड्रा ने भी खरीद लिया. उन्होंने कहा कि आए दिन इन भूमि घोटालों को लेकर जो नई परतें खुल रही हैं वह प्रदेश में हुए बहुत बड़े भूमि घोटाले की ओर इशारा कर रही हैं.

इनेलो प्रमुख आरोप लगा रहे हैं कि राहुल गांधी व राबर्ट वाड्रा द्वारा खरीदी गई जमीन जिसकी रजिस्ट्री 3 मार्च, 2008 को हुई थी, उन दोनों रजिस्ट्रियों के दस्तावेजों में चार जगह साफ-साफ लिखा है कि यह जमीन कृषि योग्य भूमि (एग्रीकल्चर लैंड) है. उस समय उपायुक्त फरीदाबाद के पत्र क्रमांक नंबर 924-27आरए दिनांक 13-7-2007 के अनुसार हसनपुर गांव में कृषि भूमि का कलेक्टर रेट छह लाख रुपए प्रति एकड़ था जबकि रजिस्ट्री में गलत बयानी की गई कि कलेक्टर रेट डेढ लाख रुपए प्रति एकड़ है. डेढ लाख रुपए का रेट पानी में डूबी हुई सैलाब का था, जबकि रजिस्ट्री में कहीं भी दर्ज नहीं है कि ये भूमि सैलाब है. इससे साफ है कि एग्रीकल्चर भूमि की रजिस्ट्री सैलाब की दरों पर करवाई गई. उन्होंने कहा कि इसके बाद वाड्रा ने अन्य कृषि भूमि भी दलित परिवारों से औसतन दो लाख रुपए प्रति एकड़ की दर पर खरीदी और उस समय कृषि भूमि का कलेक्टर रेट उपायुक्त के पत्र क्रमांक  571-74 दिनांक 11.4.2008 के अनुसार 8 लाख रुपए प्रति एकड़ था. उन्होंने कहा कि इन जमीनों पर सरसों के साथ-साथ गेहूं व धान की भी भरपूर फसल होती है.

इनेलो प्रमुख ने कहा कि कांग्रेस की ओर से दी गई सफाई में न सिर्फ तथ्यों को छुपाया गया बल्कि आधी अधूरी जानकारी देकर लोगों को गुमराह करने का भी प्रयास किया गया. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की ओर से जो छह एकड़ पांच कनाल 13 मरले जमीन मार्च 2008 में खरीदी गई थी, उस जमीन को राहुल गांधी ने करीब तीन महीने पहले अपनी बहन व राबर्ट वाड्रा की पत्नी श्रीमती प्रियंका गांधी को वसीका नंबर 2858 दिनांक 26 जुलाई, 2012 को गिफ्ट (हिब्बानामा) कर दिया था. उन्होंने कहा कि 27 जुलाई, 2012 को इस जमीन का इंतकाल प्रियंका गांधी के नाम न सिर्फ दर्ज हो गया बल्कि इंतकाल में यह भी दर्शाया गया कि इस जमीन पर पहले राहुल गांधी और अब प्रियंका गांधी वाड्रा खुदकाश्त हैं. इस इंतकाल में भी खुदकाश्त दिखाए जाने से यह साफ है कि जमीन खेती योग्य है और पानी में डूबी हुई सैलाब जमीन नहीं है.

 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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