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मुन्ना भाई: साँपों से लोगों को और लोगों से साँपों को बचाने की मशक्कत…

By   /  October 20, 2012  /  1 Comment

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-सिकंदर शैख़||

साँपों का नाम सुनते ही शरीर में एक कंपकंपी सी दौड़ जाती है और इस रेंगने वाले जीव से हर कोई दूर ही रहना पसंद करता है, हालांकि कई सपेरे जैसी जातियां इनके साथ ही पलती बढती है मगर आज कल उन्होंने भी इनसे खेलना बंद कर दिया है, मगर जैसलमेर में जैन परिवार में जन्मे मुन्ना का तो मानो यही काम है. साँपों से लोगों की इन्दगी बचाना ही उसका  मकसद नहीं है वरन साँपों को भी बचाना मानो उसकी ही ज़िन्दगी का एक हिस्सा बन गया है.

भारत -पाक सीमा पर बसा जैसलमेर क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा जिला है और सुदूर इलाकूं में बसी बस्तियां जहाँ बरसात के मौसम में सबसे ज्यादा साँपों से नुक्सान का भय बना रहता है. बरसात के दिन आते ही साँपों के काटने की घटनाएं बढ़ जाती है और जैसलमेर जैसे सीमावर्ती जिले में तो ग्रामीण इलाकों से ऐसी घटनाए आम है. लोग इन साँपों से बचने के लिए जरूरी उपाय तो करते ही है मगर कभी कभी साँपों को मार भी डालते हैं. ऐसे में एक शख्स ऐसा वही है जो इन साँपों से लोगों की जिंदगियां तो बचाता ही है साथ ही साथ लोगों से इन साँपों की जिंदगियां भी बचाता है.

जैसलमेर शहर में एक जैन परिवार में जन्मे मुन्ना की ज़िन्दगी का तो यही मकसद लगता है , शहर में जब भी कोई सांप निकलता है तो लोगों की ज़बान पर एक ही नाम आता है मुन्ना भाई!!

मुन्ना भाई इस शहर में मुन्ना भाई सांप वाला” के नाम से मशहूर हो गया है. वो इन साँपों को पकड़ता है और इन्हें दूर निर्जन स्थानों पर छोड़ देता है ताकि सांप को कोई नुक्सान नहीं पहुंचे.

मुन्ना बताता है कि ” बचपन में वो मदारियों को साँपों के साथ खेलते देखता था तब से उसको ये सब बहुत अच्छा लगने लगा. उसके बाद वो जब महाराष्ट्र रहते थे तब स्कूल में सांप निकलते थे तो वो उनको पकड़ लेता और लोगों से छोड़ देता था क्योंकि उसको दर रहता था की कोई इन खूबसूरत साँपों को मार न दे” फिर यहाँ जैसलमेर आने पर उसने देखा की काफी तादाद में साँपों के काटने की घटनाये होती है और लोग उनको मार डालते थे जिससे उसने ये बीड़ा उठाया की वो इनको मरने नहीं देगा. और फिर तबसे मुन्ना कोई काम नहीं करता है बस वो इन साँपों को बचाने की धुन में ही लगा रहता है

ऐसा नहीं है की मुन्ना को साँपों ने कभी काटा नहीं है मुन्ना कहता है कि उसको चार बार साँपों ने काटा है मगर लोगों को साँपों से बचाने और साँपों की जिंदगियां बचाने के लिए उसको अपने प्राणों की भी चिंता नहीं है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Munna Singh Thakur says:

    hi

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