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उठो जागो और अपने अधिकार के लिए लड़ो..!

By   /  October 22, 2012  /  No Comments

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-अनुराग मिश्र||

उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ रही महिलाओ से छेड-छाड और बलात्कार की घटनाओ के बीच मुख्यमंत्री अखिलेश द्वारा महिलाओ की सुरक्षा के लिए शुरू  की गयी महिला हेल्पलाइन योजना निश्चित तौर पर एक सराहनीय कदम है किन्तु यक्ष प्रश्न यह है कि मौजूदा परिस्थितियों में क्या ये योजना अपने उद्देश्यों को पूरा कर पायेगी ?  क्या वास्तव में महिलाओ के प्रति हो रहे अपराधो पर महिला हेल्पलाइन सेवा नियंत्रण कर पायेगी ? देखा जाये तो ये कोई बड़ी बात नहीं की महिला हेल्पलाइन सेवा की जरिये ऐसे अपराधो को नियंत्रित किया जा सके बशर्ते कानून व्यवस्था को नियंत्रित करने वाली हमारी पुलिस और ऐसी घटनाओ पर मूक दर्शक बनकर तमाशा देखने वाला हमारा समाज जग जाये. अभी हाल ही में ग्वालियर शहर में ऐसी ही घटनाओ को रोकने के लिए पुलिस और जनता के साझा सहयोग से “वी केयर फार यू”  नाम की कम्पैनिग चलायी गयी जिसका काफी सार्थक परिणाम रहा और एक माह के अन्दर ही ज्यादातर ऐसे मामलो का निपटारा किया गया है और ऐसी घटनाओ को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया हैं.

जहाँ तक बात उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार द्वारा चलायी गयी महिला हेल्पलाइन योजना की सफलता की है तो यह भी राज्य की पुलिस की इच्छा शक्ति और जनता की जागरूकता पर निर्भर करेगा. इसमें कोई दो राय नहीं है कि पूरे प्रदेश में महिलाओ के प्रति बढ़ रहे अपराधो के लिए काफी हद तक हमारी पुलिस जिम्मेदार है. आये दिन अखबारों सुर्खियों में रहता है कि महिलाओ द्वारा शिकायत करने के बावजूद पुलिस ऐसी घटनाओ के प्रति तत्परता नहीं दिखाती है और पीड़ित को ही गुनहगार समझकर उसके ऊपर सवालों की झड़ी लगा देती है और अंततोगत्वा पीड़ित को किसी न किसी बहाने से टरका देती है.

अभी आज ही राजधानी के मोहनलालगंज क्षेत्र में ऐसी ही एक घटना की बानगी देखने को मिली जहाँ पुलिस के उच्च अधिकारियो के आदेश  के बाद भी मोहनलाल गंज पुलिस छेड़खानी के एक मामले को लगातार नजरअंदाज कर रही है. ऐसी स्थिति में आम जनता का विश्वाश कानून व्यवस्था से उठने लगता जो अंत में जाकर सत्ता में आसीन दल की कार्यप्रणाली पर एक प्रश्नचिन्ह लगा देता है. लेकिन क्या सिर्फ सत्तासीन सरकार और पुलिस को कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगा कर हम ऐसी घटनाओ के प्रति अपनी जिम्मेदारी से अपना मुह मोड़ लेंगे जबकि हम सभी जानते हैं कि हम स्वयं में भी उतना ही जिम्मेदार है जितना की ऐसी घटनाओ को रोक पाने में विफल हो चुकी पुलिस है .

वास्तव में ऐसी घटनाओ के प्रति समाज में ही उदासीनता जिम्मेदारहै जो लगातार ऐसी घटनाओ को ये मानकर की ये घटना दूसरे के साथ घटी है नजरअंदाज करता रहता है और प्रत्येक घटना को कानून व्यवस्था से जोड़कर इसका ठीकरा पुलिस पर फोड़ देता है जबकि कही भी जब ऐसी घटना घटती है तो उसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हम स्वयं में होते हैं क्योकि सारी घटना हमारे ही सामने घटती है और हम मूक दर्शक बने तमाशा देखते रहते है और राज्य की कानून व्यवस्था के लिए सत्ताशीन सरकार को कोसते रहते है कि वो ही कानून व्यवस्था को नियंत्रि नहीं कर पा रही है. जब ऐसी घटनाओ में किसी महिला की मृत्यु हो जाती है तो महिला को न्याय दो का नारा लगाते हुए मोमबती वाला मार्च निकालने हम सबसे आगे होते है. हम कभी ये नहीं सोचते कि इसके लिए जिम्मेदार हम हैं अगर हम जरा साहस करके उस महिला को बचाने की कोशिश करते तो शायद वह बच जाती. याद रखिये जब भी हम संगठित होकर किसी चीज़ का मुकाबला करते है तो जीत सदैव संगठन की ही होती है. इसलिए जब भी कभी ऐसी घटनाये हमारे सामने हो तो मूकदर्शक बनकर तमाशा देखने के बजाये हमें उसका प्रतिरोध करना होगा और एक जागरूक समाज के प्रतिबिम को स्थापित करना होगा. याद रखिये अपराधियों की हिम्मत चंद लम्हों की ही होती है. समाज के दो लोग भी हो रहे अपराध के खिलाफ अगर खड़े हो जाते है तो अपराधी या तो मैदान छोड़कर भाग जाते है या फिर पकडे जाते है. यहाँ यह बात करने योग्य है कि जनतंत्र में समाज के प्रति जितनी जिम्मेदारी पुलिस और शासन तंत्र की है उतनी ही जिम्मेदारी आम नागरिक की है. जिसका सीधा उद्धरण ग्वालियर में शुरू हुई “वी केयर फार यू” कम्पेनिंग है.

सनद रहे कि जिस राज्य की जनता सोयी होती है उस राज्य की पुलिस और शासन तंत्र भी सोया होता है. इसलिए उठो जागो और अपने अधिकार के लिए लड़ो.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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