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आदिवासी युवतियों के MMS बनाते हैं सीआरपीएफ के जवान..

By   /  October 22, 2012  /  13 Comments

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नक्सलवादियों से कॉरपोरेट घरानों को सुरक्षा दिलवाने के नाम पर झारखण्ड में तैनात सीआरपीएफ़ के जवान आदिवासी युवतियों के नग्न और अश्लील  बना रहे हैं और विरोध करने पर आदिवासियों के खिलाफ फर्जी मुकद्दमें दर्ज करवाने में भी नहीं हिचकते…

-ग्लैडसन डुंगडुंग||

  • 26 सितंबर, 2012 को सुबह में जब मुसाबनी थानांतर्गत पथगोड़ा निवासी 9वीं कक्षा में अध्ययनरत 15 वर्षीय सपना हांसदा (बदला हुआ नाम) ट्यूशन पढ़ने के बाद अपनी सहेलियों के साथ घर वापस जा रही थी. कुछ दूरी पर उसकी सहेलियां उसे छोड़कर चली गयी और वह अजय मार्डी नामक व्यक्ति के साथ बोनालोपा के पास खड़े होकर बातें करने लगी. इतने में सीआरपीएफ 193 बटालियन के तीन जवान वहां पहुंचे और उन्होंने अजय मार्डी को बुरी तरह से पीटा और वहां से भगा दिया. इसके बाद उन्होंने सपना को कपड़ा उतारने को कहा. इस पर सपना चुपचाप डर से कांपने लगी. इन जवानों ने उसे कहा कि अगर वह कपड़ा नहीं उतारती है, तो वे पकड़कर उसका कपड़ा उतार देंगे. यह सुनकर सपना ने डर से अपने बदन पर से कपड़ा उतार दिया. इसके बाद सीआरपीएफ जवान अपने मोबाइल से उसकी नंगी तस्वीर उतरने लगे. इतना ही नहीं उन्होंने नग्न वीडियो भी बनाया. इसी बीच एक जवान का फोन आया और वह बात करने लगा. जवान निश्चिंत हो गये कि सपना कहीं नहीं भागेगी लेकिन इसी बीच मौका पाकर वह वहां से नग्न स्थिति में ही दौड़कर भाग गयी. पास में ही गांव होने के कारण सीआरपीएफ के जवान उसे पकड़ नहीं पाये.
  • 24 सिंतंबर, 2012 को चाईबासा में घटी. मुफसिल थानांतर्गत लोफागुटू निवासी 19 वर्षीय सुमति (कल्पनिक नाम) सहिलाहातू गांव के पास झरना में स्नान कर रही थी. उसी समय सीआरपीएफ 174 बटालियन का जवान शफीक अहमद वहां आ धमका. सुमति को अकेले देखकर वह उसके साथ बदसुलूकी करने लगा. इसी बीच गांव की कुछ महिलाएं वहां पर पहुंची. फलस्वरूप सुमति बच निकली. इसी तरह पिछले वर्ष भी मुसाबनी की एक दलित बस्ती में घुसकर सीआरपीएफ जवानों ने महिलाओं से छेड़छाड़ की और सारंडा के बालिबा गांव में एक ‘हो महिला‘ के साथ बलात्कार करने की कोशिश की. सपना के पिता सिदो हंसदा गुस्से में सवाल पूछते हैं क्या सीआरपीएफ जवान रक्षक हैं या भक्षक? गुलाय टुडू भी कहते हैं कि सीआरपीएफ जवान हमारी महिलाओं का यौन शोषण करते हैं, हमें कहीं जाने से रोकते हैं और उन्होंने हमारा जीना दूभर कर दिया है. हमलोग यहां पीढ़ियों से रह रहे हैं. वे कौन होते हैं हमें रोकने वाले?

मुसाबनी और चाइबासी की घटना ने कोल्हान को झकझोर कर रख दिया है. दोनों पीड़िता सदमे में हैं और अपने घरों से बाहर नहीं निकल पा रही हैं. इन दोनों शर्मनाक घटनाओं के बाद लोगों का गुस्सा सिर चढ़कर बोलने लगा. स्थिति से निपटने के लिए सीआरपीएफ के जवानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया, लेकिन आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई. इन जवानों को निचली अदालतों से अगले दिन बेल मिल गया और सीआरपीएफ के अफसरों ने उल्टे लगभग 150 आदिवासियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया. उन पर आरोप लगाया गया कि आदिवासी अपने-अपने हाथ में लाठी, डंडा, फरसा, कटारी, तलवार, भुजाली, तीर-धनुष से लैस होकर बटालियन के मुख्यालय के गेट पर नारेबाजी करते हुए पहुंचे तथा ईंट-पत्थर चलाते हुए तोड़-फोड़ करने लगे. जवानों के साथ उपद्रवियों ने हाथापाई की तथा अधिकारी मेस एवं बटालियन स्टोर में तोड़फोड़ की.

लेकिन आदिवासी-मूलवासी सीआरपीएफ के आरोपों से कहां डरने वाले थे? तीन अक्टूबर को चाईबास एवं 8 अक्टूबर को मुसाबनी में लगभग 10-10 हजार की संख्या में आदिवासी लोग सड़कों पर उतरे. अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के मुकेश बिरूआ कहते हैं कि ग्रामसभा के अनुमति के बगैर अनसूचित क्षेत्रों में सीआरपीएफ कैंप बनाना गैर-संवैधानिक है, इसलिए लोगों का विरोध जायज है.

झारखंड का कोल्हान क्षेत्र जो कभी आदिवासी स्वशासन व्यवस्था और जंगल आंदोलन के लिए प्रसिद्ध हुआ करता था, राज्य गठन के बाद इस क्षेत्र को ‘नक्सल स्टेट’ का जामा पहनाया गया और यहां भारी संख्या में सीआरपीएफ को उतार दिया गया, जिसने यहां आदिवासियों का जीना हराम कर दिया है. असल में यह क्षेत्र आदिवासी कॉरिडोर व मिनरल कॉरिडोर है, जहां हो आदिवासी लोग रहते हैं और लौह-अयस्क, यूरेनियम, कोयला जैसे खनिजों का भंडार है. और जगजाहिर है, जहां मिनरल होगा वहां आदिवासियों का शोषण होगा. कोल्हान का इतिहास भी यही बताता है कि यहां के आदिवासी लगातार शोषण के शिकार हुए हैं और बाहर से आकर यहां बसने वाले लोग खनिज संपदा का दोहन कर सुखी संपन्न हो चुके हैं. और तो और, वे आदिवासियों को विकास का पाठ भी पढ़ा रहे हैं. उनके विकास का मॉडल है ‘जल, जंगल, जमीन, पहाड़ और खनिज को लूटो और संपन्न बनो’. लेकिन इस मॉडल को आदिवासियों ने इसलिए नकार दिया है, क्योंकि वे प्रकृति के साथ जीते हैं और प्रतिदिन की जरूरतों को पूरी करने के लिए वे प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का उपयोग करते हैं, दोहन नहीं.

यहां यह कहने की जरूरत नहीं है कि जब भी आदिवासियों ने अपने अधिकारों की मांग की है, पुलिस बलों का उपयोग कर उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया गया है. लेकिन कोल्हान के आदिवासियों के ऊपर लगातार पुलिस अत्याचार इसलिए हो रहा है, क्योंकि वे प्रकृतिक संसाधनों का दोहन के खिलाफ पिछले 4 दशकों से संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें सैकड़ों आदिवासी पुलिस गोली के शिकार हुए हैं. यह विरोध इसलिए है क्योंकि केंद्र एवं राज्य सरकार सिर्फ कॉरपोरेट घरानों को मुनाफा पहुंचाने के लिए आदिवासियों का जीवन तबाह कर रहे हैं. झारखंड बनने के बाद यहां कॉरपोरेट घरानों के साथ सरकार ने एमओयू करना प्रारंभ किया. अब तक लगभग 107 एमओयू हो चुका है और जब आदिवासियों ने इसका विरोध करना शुरू किया तो नक्सलियों की आड़ में निजी कंपनियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए यहां सीआरपीएफ को उतारा गया है. आज झारखंड में लगभग 70 हजार सीआरपीएफ जवान मौजूद हैं. लेकिन क्या ये जवान लोगों की रक्षा कर रहे हैं? एक दशक का अनुभव तो यही बताता है कि सीआरपीएफ का कुनबा रक्षक की जगह यहां भक्षक बन चुका है.

अब कोल्हान के लोग यहां से सीआरपीएफ कैंप हटाने की मांग पर लगातार सड़कों पर उतर रहे हैं. 24 एवं 26 सितंबर तथा तीन एवं 8 अक्टूबर को लगभग 10-10 हजार की संख्या में आदिवासी एवं मूलवासी लोग सीआरपीएफ जवानों के प्रतिदिन के अत्याचार से तंग आकर सड़क पर उतरे. उनकी एक ही मांग थी कि सीआरपीएफ कैंप इन क्षेत्रों से हटाया जाए क्योंकि सीआरपीएफ जवान लोगों की रक्षा करने के बजाय उनको ही निशाना बना रहे हैं. लेकिन आश्चार्य की बात है कि सीआरपीएफ पर कार्रवाई करने के बजाए यहां यह दलील दी जा रही है कि यह नक्सलियों का प्रोपागेंडा है क्योंकि सीआरपीएफ की मौजूदगी में नक्सली गांवों में अपना काम नहीं कर पा रहे हैं इसलिए आदिवासियों को सड़को पर उतार कर सीआरपीएफ कैंप हटवाने की मांग की जा रही है.

सीआरपीएफ जवानों की इस शर्मनाक करतूत पर कोल्हान में पिछले 15 दिनों से हलचल है, लेकिन देश तो क्या, झारखंड की राजधानी रांची भी इस बात से बेखबर है. यह इसलिए क्योंकि मीडिया के लिए यह खबर बाजारू भाव में बिकाऊ नहीं है. साथ ही कोल्हान में सीआरपीएफ की मौजूदगी मीडिया के लिए फायदे का सौदा है, इसलिए यह खबर दिल्ली तो क्या, रांची तक भी नहीं पहुंची. यहां यह बताना जरूरी होगा कि क्या मीडिया का रुख इसी तरह का होता अगर ये जवान एक उच्च जाति की महिला को कपड़ा उतारने पर मजबूर करते और उसका एमएमएस बनाते? क्या इन खबरों को इसलिए तरजीह नहीं दी गयी क्योंकि यह आदिवासी एवं मूलवासियों से संबंधित था?

यह मान लेना चाहिए कि मीडिया सबसे पहले अपने हित की रक्षा करेगा क्योंकि मीडिया के मालिक ही झारखंड में कई माइनिंग कंपनियां चला रहे हैं तथा दूसरे माइनिंग कंपनियों से भी विज्ञापन के रूप में उनकी ही झोली में पैसा बरसता है. और सीआरपीएफ इन माईनिंग कंपनियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए ही उतारा गया है. यहां सीआरपीएफ की भूमिका तो सवालों के घेरे में है ही लेकिन मीडिया की भूमिका भी शर्मनाक है. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रक्षक अब भक्षक बन चुके हैं. अब उनका एकसूत्री कार्यक्रम कॉरपोरेट को सुरक्षा प्रदान करना है और मीडिया उनका सहपाठी है, चौथा खंभा नहीं. इसलिए अब लोगों को ही तय करना है कि वे अपनी बेटी, रोटी और माटी को कैसे सुरक्षित रखेंगे.

(ग्‍लैडसन डुंगडुंग. मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक. उलगुलान का सौदा नाम की किताब से चर्चा में आये. आईआईएचआर, नयी दिल्‍ली से ह्यूमन राइट्स में पोस्‍ट ग्रैजुएट किया. नेशनल सेंटर फॉर एडवोकेसी स्‍टडीज, पुणे से इंटर्नशिप की. फिलहाल वो झारखंड इंडिजिनस पीपुल्‍स फोरम के संयोजक हैं. उनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.)

(यह आलेख मोहल्ला लाइव पर भी प्रकाशित हो चुका है)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

13 Comments

  1. pramod deshbhratar says:

    ye to hona tha ky0ki sc st obc @ mainority jab tak padhana likana nahi karoge tab tak attyachar hota rahega,

  2. bhimputter akash deep gautam says:

    plz plz whatshapp group me add kro…..9917696925
    jai bhim G

  3. Sawai Rpunar says:

    yes galat hain me unki aawas banuga mere paper mulnivasi nayak se.

  4. Nandan Bhagat says:

    isliye jab naxali unhe marte hai to grameeno ko koi dukh nhi hota.. sabko apne paap ka fal isi janam me milta hai..

  5. true asit, inhone hi mauka diya hai hume bazaaru banane me, in netaon ko inki wastwik jagah dikhana aaj jaruri ho gaya hai

  6. Tirkey Asit says:

    aur hamare adivasi neta,MP, MLA sab hame bech kar so rahe hai

  7. ISHSE NAXALWAD KYA BADHEGA CRPF KO WANHA BHEJA JANA HAWA HAI, NAXALWAD KE NAAM PE JUNGLE AUR JAMIN KE NICHE DABA SANSADHAN MUKHYA PANA HAI

  8. KAB TAK HO CHUP DEKHE JARA? BARI AAJ HAMARI HAI PAR TUMHARI BHI NIYATI YAHI HONI HAI KYUNKI JO DARINDGI KO TUM PANPA RAHE HO APNE SAMAJ ME WO EK DIN AADIWASIYON SE ITSAR BHI MAANS TALESHEGA AUR LUTEGA TUMHARA(JO KHAMOSH HAI AAJ) HI MAANSH KA LOTHRA.

  9. is se aur naksalwaad badega………..inko sharm aani chaiye.

  10. Naushad Alam Chishti Aap says:

    very bad

  11. ye ahi pragatishil india

  12. Kitna niche gir chuka hai hamara System…….

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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