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जनलोकपाल दो बूंद राजनीति का…

By   /  October 24, 2012  /  1 Comment

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-सिंगरौली, मध्य प्रदेश से अब्दुल रशीद||
देश मे भ्रष्टाचार अमर बेल की तरह बढता  ही जा रहा है और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए टीम अन्ना ने जिस तरह से स्वयं द्वार चलाए जाने वाले आन्दोलन को राजनैतिक रंग दे कर समाप्त किया उससे ये बात आईने की तरह साफ़ हो जाती है कि टीम अन्ना की नीयत क्या थी. टीम अन्ना ने जब इस मुहिम की शुरुआत की तभी ऐसा लगा कि कहीं न कहीं कोई राजनैतिक खिचडी पक रही है. जिसे पकाने के लिए जनता के आवेशरुपी आग का इस्तेमाल किया गया. क्योंकि यह बात समझ के परे है कि रातों रात “मैं भी अन्ना हूं” टोपी पहनें लोग जंतर मंतर पर कैसे इकट्ठा हो गए आखिर रातों रात लाखो टोपी बिना पुर्वनियोजन के कैसे बनकर तैयार हो गई, वह कौन से लोग थे जो इस पुर्वनियोजित काम में पैसा लगा रहे थे? इस अहम सवाल का जवाब भीड़ के हुड़दंग और राजनैतिक पैतरे बाजी में कहीं गुम हो गया?

आरोप प्रत्यारोप और गांधीवादी होने का सच

अन्ना का उद्देश्य भले ही जनहित के लिए ठीक था लेकिन उनका तानाशाही तरीक़ा यकीनन लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं था. दरअसल टीम अन्ना के लोग अन्ना हज़ारे जैसी साफ छवि के सहारे अपनी राजनैतिक मंशा पूर्ण करना चाहते थे. और अपनी ओछी राजनीति को पूर्ण करने के लिए आरोप और झूठ का सहारा लेकर आम जनता को गुमराह करने लगे. अपने को प्रचारित करने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सहारा लेते हुए टीम अन्ना ने आंदोलन को गांधीवादी और टोपी को गांधी टोपी कहकर प्रचारित किया जबकि न तो आंदोलन का तरीक़ा गांधीवादी था और टोपी गांधी टोपी था.

हकीक़त तो यह है की गांधी जी काठियावाड़ी पगड़ी पहन कर आन्दोलन की शुरुआत किए थे हां, नेहरु जी टोपी पहना करते थे. अब उस टोपी को गांधी टोपी कहकर प्रचारित करने का उद्देश्य क्या था यह तो टीम अन्ना ही बेहतर बता सकती थी जो कि अब बिखर चुकी है. और शायद टीम अन्ना में से कोई इतना पाक साफ नहीं था जिनका सर काठियावाड़ी पगडी का बोझ सह सकता. जब ब्रिटेन तानाशाही ताक़तों से लड़ रहा था उस वक्त आज़ादी के लिए हो रहे  आंदोलन के दौरान यह भी आदेश दिए थे कि युद्घ के दौरान
प्रशासनिक कार्य ठप्प नहीं किए जाए. जो इस बात की तस्दीक करता है कि वे आजादी के साथ देश कि व्यवस्था को भी बरकरार रखना चाहते थे. लेकिन पहले टीम अन्ना का आन्दोलन और अब केजरीवाल के आंदोलन करने का तरीक़ा बस विरोध और आरोप नीति पर आधारित है. केजरीवाल तो सरकारी बिजली बिल को फाडने का और भुगतान न करने के लिए लोगों को उकसा रहें हैं? क्या केजरीवाल के पास ऐसी कोई शासन व्यवस्था है जो देश को मुफ्त में बिजली दे सकेगी? कहने में क्या जाता है प्रचार तो मिल ही रहा है और शायद इसी बहाने राजनैतिक सुख भोगने को मिल जाए देश में कैसे व्यवस्था चलती है उससे केजरीवाल जी को क्या लेना देना. उनकी बात मानकर यदि पूरे देश के लोग बिजली का बिल न दे तो देश में केजरीवाल के हवा हवाई बिजली परियोजना से बिजली आपूर्ति होगी.

मौजूदा हालात में राजनैतिक प्रतिबद्धता  और प्रशासनिक गोपनीयता की कमी के कारण ही ऐसी बाते आम हो जा रही है जो सत्तापक्ष के खिलाफ होती है. और ऐसी ही बातों को लेकर अरविंद केजरीवाल जैसे चतुर लोग हो हल्ला मचा कर वाह वाही लूट रहें हैं. लेकिन क्या वाहवाही से समस्या का समाधान हो सकता है, शायद नहीं. उसके लिए चाहिए एक व्यवस्था जो देश की नींव तक में अपनी जड़ें जा चुके भ्रष्टतंत्र के किलों को ढहा सके.

क्या जनलोकपाल सारी समस्याओं का समाधान है?
हमारे देश की सवैधानिक व्यवस्था ऐसी है जो सत्ता को अधिकार देती है अर्थात तंत्र को लोक पर शिकंजा कसने का मौका देता है. आम जनता को कोई व्यवसाय करना है तो सरकार से अनुमति लेना होगा, घर बनाना है तो अनुमति लेना होगा, यानी हर छोटी बड़ी बात के लिए अनुमति लेना होगा आनुमति लेने के लिए इतने नियम कानून है कि सभी को पूरा करना न तो संभव है और न ही व्यवहारिक है जैसे नर्सिंग होम चलाने के लिए नर्सों की संख्या जबकि सरकारी अस्पताल में भी कमीं है लेकिन सरकारी के लिए जो चलता है वह आम इंसान के लिए नहीं, कारण उनको लाइंसेंस की जरुरत नहीं आम नागरिक को जरुरत है लाइंसेंस की. और लाइंसेंस देने वाला तंत्र है जो लोक की समस्याओं से ज्यादा लोक की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए ताक लगाए बैठा रहता है.

ऐसे हालात में लोक क्या करे या तो जीविका चलाने के लिए सभी नियम कानून को पूरा करे या फिर भूखे मरे? आत्महत्या भी किया तो ठीक लेकिन बच गए तो तंत्र के कानूनी शिकंजा का आप पर कसना तय है. ऐसे में लोक क्या करे समस्याओं के बीच पेण्डूलम बन कर डोलता रहे या फिर तंत्र को रिश्वत दे कर समस्याओं से मुक्ति पाए. जहां इतने नियम कानून पहले से ही है जिसकी वजह से लोक को तंत्र बैठकर नियम कानून का भय दिखा कर चूस रहा है ऐसे में क्या जनलोकपाल सभी समस्याओं का अंत कर देगा ज़रा ईमानदार हो कर सोंचिए. कहीं ऐसा न हो जाए के जनलोकपाल के नाम पर देश में एक और राजनैतिक पार्टी तो बन जाए लेकिन समस्या का अंत होने के बजाय समस्या और बढ जाए. क्योंकि जनलोकपाल भी तो सरकारी तंत्र का ही हिस्सा होगा यानी सुप्रीम पावर युक्त तंत्र. जब तंत्र कानून का भय दिखा कर लोक का जीना बेहाल कर रखा है तब  सुप्रीम पावर युक्त तंत्र भी तो  तंत्र को रिश्वतखोरी करने कि आजादी के नाम पर रिश्वत नहीं वसूलेगा इस बात की क्या गारंटी. तब क्या फिर  एक और कानून?

जन आंदोलन से जन्में राजनैतिक पार्टी का हश्र बदलाव, भ्रष्टाचार मिटाने जैसे लोक लुभावन नारों के सहारे अरविंद केजरीवाल से पहले भी कई नौकरशाहों ने राजनैतिक पार्टियाँ बनाई लेकिन बदला कुछ नहीं. हां, वे जरुर राजनैतिक दलदल का हिस्सा बन कर रह गए. जैसे,

  • केजे अल्फांस- 1994 में टाइम मैगज़ीन ने नई सदी के 100युवा नेताओं में शुमार किया 2006में निर्दलीय विधायक बने वाम दल के समर्थन भी रहा. 2011 में भाजपा के सदस्य बन गए.
  • कैप्टन गोपीनाथ– एयर डेकन की स्थापना की. लोगों को सस्ते हवाई यात्रा की सेवा दी लेकिन 2009 में जब चुनाव लड़े तो हार गए.
  • एन.जयप्रकाश नारायण – आंध्रप्रदेश के आईएएस अधिकारी एन जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए लोकसत्ता पार्टी बनाई 3 साल हो गए पार्टी तीन राज्यों में चुनाव तो लड़ती है लेकिन पार्टी के वे इकलौते विधायक हैं.

अब अरविंद केजरीवाल आईआरएस अधिकारी रहे हैं, जो चमत्कारी सिद्धांतों के साथ राजनैतिक पार्टी बनाकर भ्रष्टाचार को मिटाने का दावा कर रहें हैं चमत्कार से भ्रष्टाचार मिट जाएगा या दलों के दलदल में चमत्कारी सिद्धांत कहीं गुम हो के रह जाएगा यह यक्ष प्रश्न तो भविष्य के गर्भ में छुपा है. और अंत में शाहरुख खान कि फिल्म ओम शांति ओम का डायलॉग कहानी अभी खत्म नहीं हुआ है, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त—-.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. ashok sharma says:

    अधिक तर एनजीओ सरकारी अधिकारी ही बनाते हें और देश को खोखला कर रहें हें

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