Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

हिमाचल में कर्मचारी करेंगे हार- जीत का फैसला…

By   /  October 25, 2012  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

कर्मचारी नाराज तो समझो कुर्सी गई, प्रदेश में पौने तीन लाख कर्मचारी करेंगें जीत-हार का फैसला, चुनावों में निभाएंगे निर्णायक भूमिका, पांच सालों का हिसाब कर सकते है चुकता…

 

-धर्मशाला  से अरविन्द शर्मा)||
हिमाचल प्रदेश कर्मचारी प्रधान प्रदेश है यहाँ ये देखा गया है की विधान सभा चुनावों के नतीज़ों में कर्मचारियों की चाह तथा इरादे अहम रहतें  है प्रदेश में पौने तीन लाख कर्मचारी हैं, जिन में 40 हजार अनुबंध आधार पर कार्यरत हैं। इसके अलावा एक लाख सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं। अराजपत्रित कर्मचारियों में सबसे अधिक  कर्मचारी आते हैं। प्रदेश में एक लाख 86 हजार के करीब इनकी संख्या है। इनमें चतुर्थ श्रेणी से लेकर क्लास थ्री वर्ग तक सभी कर्मचारी आते हैं।। पेंशनरों की संख्या एक लाख है। कारपोरेट कर्मचरियों का आंकड़ा 35 हजार के करीब है। क्लास वन केटागरी में आईएएस व एचएएस आते हैं। क्लास-टू में स्कूल प्रवक्ता, हैडमास्टर, सेक्शन अफसर इत्यादी आते हैं।  कार्यरत कर्मियों के मुकाबले पेंशन धारियों की संख्या भी चालीस प्रतिशत है इसके अतिरिक्त कारपोरेट की यदि बात की जाए तो एचआरटीसी यूनियन को सबसे सशक्त वर्ग माना जाता है। कर्मचारियों ने मांगों को लेकर प्रदेश व्यापी बंद कर इसका सबूत दे दिया हिमाचल में इस बार 45 लाख से भी अधिक वोटर हैं इनमे से लगभग आधे ऐसें है जिनका पारिवारिक संभंध  हिमाचल के कर्मचारियों से है तथा कर्मचारियों की चाहत का  ऐसे में मतदान पर झुकाव साफ़ दीखता है इन आंकड़ों से ये साफ़ ज़ाहिर है की विधानसभा चुनावों में कर्मचारी जीत-हार तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। कर्मचारियों के वोट बैंक पर सभी दल नजरें गड़ाए बैठे हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सरकार ने कर्मचारियों को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

कर्मचारियों के एक  गुट का आरोप है कि सरकार ने कर्मचारियों को पंजाब पैटर्न पर एक भी लाभ नहीं दिया है और जो लाभ दिए हैं, वे तोड़ मरोड़ कर दिए हैं। देय तिथि से कर्मचारियों को एक भी लाभ नहीं दिया गया। सबसे ज्यादा अनदेखी अनुबंध कर्मचारियों व पेंशनरों की हुई है। एचपीयू में अभी तक कर्मचारियों को डीए व एरियर का पूरा भुगतान नहीं हुआ है। वहीं एचआरटीसी कर्मचारियों को अभी तक अधूरे वित्तीय लाभ मिले हैं। एचआरटीसी कर्मियों को ग्रेड पे, टाइम स्केल व डीए का लाभ अभी तक नहीं मिल पाया है।

जबकि दूसरा  वर्ग कहता की सरकार ने अपने कार्यकाल में सभी वर्गों को खुश किया है। जितनी भर्तियां इस कार्यकाल में हुई हैं, उतनी पहले कभी नहीं हुईं। पद्दोन्नतियों की भी सरकार ने झड़ी लगा दी है। वित्तीय लाभ पंजाब से पहले दिए हैं। ये भी सत्य है की वर्ष 1998 से लेकर अब तक एचआरटीसी को छोड़कर कोई बड़ा आंदोलन कर्मचारियों का नहीं हुआ है। सरकार से अच्छे संबध रखने वाले को ही महासंघ की कमान सौंपी जाती रही है। कर्मचारियों के विवाद मिटाने के लिए कर्मचारी नेता मिडिएटर का कार्य करते हैं। लक्ष्मी सिंह मच्छान, गंगा सिंह, गोपालदास वर्मा, सुरेंद्र ठाकुर व पीसी भरमौरी महासंघ के अध्यक्ष रहे हैं। कर्मचारी नाराज तो समझो कुर्सी गई।

हिमाचली सियासत की किताब खोलें तो पता चलता है कि किस तरह कर्मचारियों ने सत्ता में उथल-पुथल मचा दी। 1993 में नो वर्क, नो पे से नाराज कर्मियों ने शांता सरकार को हिलाया तो 2007 में भेदभाव और रंजिश आधारित तबादलों ने सरकार को सत्ता छोड़ने पर मजबूर कर दिया। यानी कि कर्मचारी खुश तो सत्ता सुख।

प्रदेश में शांता कुमार, रामलाल ठाकुर, वीरभद्र सिंह व प्रो. प्रेम कुमार धूमल के अलावा जितने भी मुख्यमंत्री रहे हैं, मुकाबला सीधा कर्मचारियों से रहा है। प्रदेश में पौने तीन लाख कर्मचारियों के पीछे उनके परिवार व नाती रिश्तेदारों का वोट बैंक रहता है। इस लिए कभी भी सरकारें कर्मचारियों से अपने रिश्ते खराब नहीं करना चाहती। सत्ता के सिंहासन को किस तरह बचाए रखना है, सरकारें अच्छी तरह जानती हैं।

शिमला की तीनों सीटें शिमला शहरी, ग्रामीण व कुसुम्पटी कर्मचारी प्रभावित रहती हैं। राजधानी शिमला में 40 हजार कर्मचारी कार्यरत हैं।  शिमला के बाद धर्मशाला में सबसे ज्यादा कर्मचारी हैं। ऊना, बिलासपुर, चंबा, हमीरपुर, कांगड़ा, सोलन के अलावा दूसरे जिला मुख्यालयों में कर्मचारियों की काफी संख्या रहती है। कर्मचारियों के साथ उनका परिवार भी जुड़ा होता है। यह वोट बैंक काफी ज्यादा प्रभावित करता है।

ये ही नहीं है की कर्मचारी मतदान में ही अपना प्रभाव छोड़तें हैं अपितु उन्होंने सक्रिय राजनीती में भी अपनी पहुंच दिखाई है कर्मचारी नेताओं ने चुनाव में भी किस्मत आजमाई है। ऐसे कर्मचारियों की संख्या काफी ज्यादा है। डा. वाईएस परमार के समय में शिक्षक आंदोलन को लीड करने वाले डीएन गौतम ने चुनाव लड़ा था।  इसके बाद मधुकर ने लोकसभा का चुनाव लड़ा था। रंजीत सिंह वर्मा जो कर्मचारी नेता थे, बाद में उद्योग मंत्री रहे। इसी तरह गोविंद राम, सुखराम चौधरी, विद्या सागर, विक्रम ठाकुर के अलावा दर्जनों ऐसे कर्मचारी नेता में कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्होंने चुनाव में उतर कर सफल राजनेता की पारी निभाई है।

हिमाचाल में कर्मचारी वर्ग हमेशा सरकार बदलाब के साथ ही तबादला प्रताड़ना का शिकार रहा है विरोधी पार्टी से जुड़े कर्मचारी पांच वर्ष तक काला पानी सी दशा झेलतें है यही कारण है की उनका वोट गुस्सा दिखता है.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

पाकिस्‍तान ने नहीं किया लेकिन भाजपा ने कर दिखाया..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: