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चूहामार राजनीति के दिग्‍गज रामअचल राजभर

By   /  October 28, 2012  /  1 Comment

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-कुमार सौवीर||

राजनीति में ऐसा कम ही होता है, जब किसी शख्‍स के व्‍यवहार के दम पर उसका नया नामकरण न केवल हो ही जाए, बल्कि उसकी यह नई पहचान लोगों की जुबान पर चढ़ भी जाए। ऐसा ही अनूठा नया नामकरण हुआ बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्‍यक्ष रामअचल राजभर का। केवल अपने व्‍यवहार के दम पर अब तक चार बार विधायक और तीन बार प्रदेश सरकार में मंत्री का ओहदा सम्‍भाल चुके इस शख्‍स ने अपना यह नया नाम न केवल अपनाया, बल्कि उसे चरितार्थ भी करा दिया।

तो किस्‍सा की शुरूआत होती है अवध क्षेत्र से। दरअसल, किसी की मृत्‍यु पर उसके शोक-संतप्‍त घरवालों के यहां जुटे लोगों को चहकारी कहा जाता है। रामअचल राजभर की खासियत है कि वे किसी के सुख में भले ही न पहुंच सकें, लेकिन शोक के मौके पर वे पहुंचते जरूर हैं। तब भी जब वे मंत्री बने थे। उनके बारे में तो क्षेत्र में ख्‍याति है कि किसी की भैंस की मौत पर भी वे पहुंच जाते हैं। और उनकी इसी खासियत के कारण ही उन्‍हें परिवहन मंत्री के बजाय चहकारी मंत्री की ख्‍याति मिल गयी। अब इस मशहूरी पर लोग भले ही खूब हंसें, मजाक उड़ाएं, लेकिन हकीकत यह है कि अपने क्षेत्र में अपनी पैठ बनाने में बसपा के साथ रामअचल राजभर की इसी खासियत ने जड़ें जमायीं। वरना अदना से एक लाचार और गरीबी में पला-पोसा शख्‍स के लिए केवल बीस बरसों में प्रदेश में बसपा जैसे संगठन में शीर्ष मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था। रामअचल के बारे में मशहूर है कि वे जिस से एक बार भी मिलते हैं, हमेशा बाकायदा पहचानते हैं।

उम्र: 55 साल, कद: साढ़े पांच फीट, रंग: साफ गेहुंआ, कपड़ा: सामान्‍य तौर पर सफेद सस्‍ती सादी पैंट-शर्ट, शिक्षा: अंग्रेजी में एमए एलएलबी, वैवाहिक स्थिति: विधुर,रहन-सहन: बेमिसाल, शौक: बोलना, लेकिन पार्टी की बैठकों में ही, सम्‍पत्ति: बेशुमार, दिक्‍कत: गुर्दा और कान की बीमारी, भोजन: खाना से ज्‍यादा दवा-दारू, प्रतिबद्धता: बसपा, बरास्‍ते सुप्रीमो मायावती। सरकारी कागजों में रामअचल राजभर के गांव का नाम भले ही कायमुद्दीनपुर लिखा हो, लेकिन उनका मूल गांव कुर्की गांव ही है, जहां उनके पिता रामअवध राजभर ने हलवाही के बल पर अपना परिवार पाला-पोसा। जाहिर है कि गरीबी की हालत घर के चादर-अंगरखा फाड़े रहती थी। तीन भाइयों में रामअचल सबसे बड़े थे। ऐसे में पिता की मदद के लिए उन्‍होंने गांव के बाहर एक छोटी गुमटी-दूकान खोल दी। आजीविका मजबूत करने के लिए, बकौल वरिष्‍ठ वकील अशोक द्विवेदी, रामअचल सिंह ने अपनी सायकिल के सहारे जिले की साप्‍ताहिक बाजारों और अकबरपुर मार्केट में फेरी लगानी शुरू कर दी। माध्‍यम था प्‍लास्टिक कीबेकार पाइप, जिसे भोंपू को लाउडस्‍पीकर की तरह वे अपना सौदा बेचा करते थे। सौदा था चूहामार दवा। अकबरपुर के कई लोगों को याद है जब मूस-मार दवा ले लो, की गुहार लगाते हुए दवा बेचा करते थे। यह सब लम्‍बे समय तक चला। वक्‍त गुजरता चलता रहा और उसी की रफ्तार में रामअचल राजभर विश्‍वेश्‍वरनाथ कैलाश बिहारी स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय में अंग्रेजी में एमए और एलएलबी हो गये।

राजनीति का चस्‍का शायद कालेज में ही पड़ गया था। कालेज छात्रसंघ चुनाव में लड़े, लेकिन औंधे मुंह गिरे। कुछ दिन अदालतों की गलियारों में भी किस्‍मत आजमाई,लेकिन बात बन नहीं पायी। इसी बीच कांशीराम ने बसपा खड़ी की। जिलाध्‍यक्ष बनाये गये बसंता राजभर और उनके जिगरी दोस्‍त थे रामअर्ज राजभर। रामअचल भी अपनी राजनीति के लिए जातीय-जमीन खोज रहे थे। राजभरों के अराध्‍य-देव सुहेलदेव के नाम पर रामअचल ने जयंती मनानी शुरू किया। सायकिल-सवार रामअचल इस जाति के लोगों के घर बीसियों कोसों की दूरी नापा करते थे। स्‍थानीय नवरत्‍न दैनिक प्रेस पर सुहेलदेव जयंती का पर्चा छपवाने में अक्‍सर शैलेंद्र तिवारी से साबका रामअचल राजभर का पड़ता था। आर्थिक दिक्‍कतें तो थी हीं, सो कई बार प्रेस का बिल टुकड़ों में मिलता था, कभी अगली जयंती पर ही। एक प्रेसकर्मी ने बताया कि करीब 7 सौ का बकाया अभी तक अदा नहीं हुआ।

भविष्‍य खोजने के लिए रामअचल ने अकबरपुर ब्‍लाक की प्रमुखी के लिए भिड़े लेकिन 135 सदस्‍यों में से केवल 11 वोट ही उन्‍हें मिल पाये। उधर जातियों के बल पर संगठन खड़ा करने के लिए बसंता ने रामअचल को अपना झंडाबरदार बना दिया। मौका मिला तो परिश्रम के बल पर पहचान भी बनी। सो, 91 के चुनाव में फिर चुनाव लड़े, मगर पवन पांडे ने उनके समेत सभी उम्‍मीदवारों को जबर्दस्‍त करारी शिकस्‍त दे दी। लेकिन इस हार के बावजूद बसपा में रामअचल की आवाज गूंजने लगी। कद हासिल करते ही रामअचल बन गये जिलाध्‍यक्ष और मजबूरन असंतुष्‍ट बसंता और रामअर्ज नेमजबूरन दूसरा ढीहा खोज लिया। उधर फैजाबाद की अकबरपुर तहसील को नया जिला बनाने के लिए जन-सामान्‍य ने एक जबर्दस्‍त आंदोलन खड़ा कर दिया था जिसके नेता थे अशोक मिश्र और उनके कई करीबी मित्र। आमरण अनशन शुरू हो गया। दो साल तक चले तगड़े आंदोलन की धार बेहद तीखी थी। नतीजतन सरकार में बात शुरू हो गयी कि अकबरपुर को तमसा नदी के नाम पर या लोहिया के जन्‍मक्षेत्र के नाम पर संगठित किया जाए। इसी बीच फिर चुनाव हो गये और रामअचल बसपा से विधायकी पा गये।

खैर। सन-95 में रामअचल फिर विधायक हो गये। बसपा सरकार ने अपने एजेंडे लागू करने के लिए तमसा या लोहिया के बजाय अकबरपुर को अंबेडकरनगर बना दिया। रामअचल ने इस जिले को अपनी निजी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित किया और इस तरह खुद का कद ऊंचा करा लिया। अगली बार उन्‍हें परिवहन विभाग का राज्‍यमंत्री और बाद में शिक्षा राज्‍य मंत्री बना दिया गया तो वे सातवें आसमान पर चढ़ गये। जोश तो था ही, सो अचानक फैजाबाद में पुलिसवालों से मारपीट हो गयी। वरिष्‍ठ पत्रकार अजय सिंह बताते हैं कि पुलिसलाइंस में उस दिन इतना बड़ा बवाल हुआ कि केवल पुलिसकर्मी ही नहीं, बल्कि जनता ने भी उनकी बुरी तरह पिटाई की। जानकार बताते हैं कि इस हादसे में कई दिनों तक रामअचल अस्‍पताल में लिटाये गये थे। गुर्दा और कान बहने की दिक्‍कत उसी के बाद से शुरू हुई। बाद में तो कई और मामले हुए।

राजनीति में भी भूचाल आ गया था रामअचल राजभर के चलते। बहराइच के सालार जंग के धार्मिक स्‍थल को लेकर रामअचल राजभर पर हंगामा हुआ। हुआ यह कि रामअचल बहराइच गये और सुहेलदेव के बारे में बातचीत होते ही वे पार्टी लाइन पार करके ऐसा कुछ बोल गये जो मुस्लिम समुदाय को पसंद नहीं आया। बात भड़की तो रामअचल के साथ ही बसपा के खिलाफ समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने अपनी-अपनी लाइनों और अंदाज के हिसाब से हल्‍ला बोल दिया। बाद में पार्टी के बड़े नेताओं ने हस्‍तक्षेप कर यह तूफान शांत कराया। लेकिन इसके बाद से ही बसपा में रामअचल राजभर हीरो ही बन गये।

कुछ भी हो, राजनीतिक हैसियत हासिल करने के बाद से ही सबसे पहले रामअचल ने अपनी गरीबी के ठप्‍पे को फौरन साफ करने का अभियान छेड़ा। अकबरपुर बस अड्डे के लिए प्रशासन द्वारा पहचान की गयी 7 बीघा जमीन को उन्‍होंने हासिल करने अपनी मां भानवती के नाम पर एक पंचतारा सुविधावाला पीजी कालेज बनवा लिया। अब यहां मैनेजमेंट का कोर्स भी शुरू होना है। जमीन उनका शौक बन गया। अब तक एक झोलाछाप डॉक्‍टर से उनकी दोस्‍ती परवान चढ़ी। उसका नाम था दयाराम प्रजा‍पति। वह मंत्री का पीआरओ हो गया। रही-सही कसर पूरी करा दी बड़े बेटे संजय ने। हालांकि छोटा बेटा अजय उर्फ मुन्‍ना केवल व्‍यवसाय देखता रहा, लेकिन संजय ने दयाराम के साथ मिल कर हर काम में पैसे का अड़ंगा लगाना शुरू कर दिया। सरकार में धमक थी इसीलिए एक रिटायर्ड निकायकर्मी अशोक पांडे की जमीन पर कब्‍जा कर लिया। अशोक बताते हैं कि इस अवैध कब्‍जे की खबर पर कोतवाल अशोक शुक्‍ला पुलिस के साथ मौके पर पहुंचे, लेकिन अचानक ही पांसा बदल गया। पुलिस ने उल्‍टे ही अवैध कब्‍जा करते हुए पांच दूकानें बनवा दीं। प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिये तो वे क्षेत्र के सांसद राकेश पांडे से शिकायत की तो वे यह कह कर सरक गये कि यह मामला मेरे बस का नहीं है। रामअचल के ननिहाल के गांव मरैला में लखनऊ के एक निकायकर्मी की एक बीघा जमीन पर रामअचल परिवार ने कब्‍जा कर रखा है। मगर कोई सुनवाई नहीं। ऐसे एक नहीं, सैकड़ों किस्‍से अंबेडकरनगर की फिजां में हैं।

रामअचल का जमीन के प्रति मोह इस जिले में कहर बन गया और रामअचल, दयाराम और उनके परिजन जमीन से उछाल लगाकर आसमान तक पहुंच गये। एक वरिष्‍ठ पत्रकार का दावा है कि पिछले पांच बरसों में रामअचल ऐंड कम्‍पनी ने 97 से ज्‍यादा जमीनों की रजिस्‍ट्री करायी है। जिधर भी नजर आती है या सवाल उठता है, तो जवाब होता है कि रामअचल राजभर। चाहे वह शहजाद रोड की नई सड़क पर 90 लाख से खरीदी गयी दूकान हो, या तहसील के पास की बेशकीमती दूकान। बसखारी रोड का 7 बीघा जमीन हो या कटेहरी के सुईडीह का 18 बीघा रकबा। रामअवध ट्रस्‍ट और भानवती ट्रस्‍ट जैसे कई ट्रस्‍ट के नाम पर जमीनों की भारी खरीद के आरोप खूब हैं। वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता आनंद द्विवेदी ने तो रामअचल राजभर से जुड़े ऐसे सैकड़ों मामलों को सूत्रबद्ध कर बाकायदा लोकायुक्‍त के पास भेज दिया है। उधर नई जिलाधिकारी निधि केसरवानी की आमद ने रामअचल की नींद उड़ा रखी है। मामला है कि जमीनों की रजिस्‍ट्री में कम मालिकियत दिखाने का। अजय सिंह बताते हैं कि मामला खुल गया तो रामअचल का साम्राज्‍य हिल जाएगा।

लेकिन इसके पहले ही कई मामले हो चुके हैं। एक राजनेता का कहना है कि डेढ़ साल पहले रामअचल के निर्माणाधीन भवन के एक कमरे में एक करोड अस्‍सी लाख की नकदी चोरी हो गयी जो भूसे में छिपा कर रखी गयी थी। रामअचल के एक करीबी रिश्‍तेदार ने यह चोरी कर उससे चार बीघा जमीन खरीद ली थी। मामला खुला तो बताते हैं कि रामअचल ने उस जमीन की रजिस्‍ट्री वापस अपने खाते में करवा दी। करीब 40 लाख की नकदी वापस भी मिली थी, लेकिन बताते हैं कि तब के कोतवाल ने भी 20 लाख अपने फेंटे में लपेट लिया था। यूपी रोडवेज में अनुबंधित वोल्‍वो बसों पर आर ऐंड आर का मतलब अजय सिंह रामअचल राजभर बताते हैं। उत्‍तराखंड और यूपी में आर ऐंड आर की ढाई सौ ज्‍यादा बसें लगी हुई हैं। जेएनएनयूआरएम बसों की खरीद में करोड़ों के घोटाले में रामअचल राजभर के कपड़ों पर छींटें पड़े हैं।

बताते हैं कि अंबेडकर नगर में चल रही ऐसी करतूतों के चलते ही शायद बसपा ने रामअचल राजभर का पिछले टिकट काट दिया था। लेकिन यह दिखने वाले दांत थे, क्‍योंकि उनके बेटे संजय को टिकट देकर रामअचल की रियासत बनाये रखने की कोशिश की गयी थी। संजय को कई महीनों पहले लखनऊ एयरपोर्ट में 20 करतूसों के साथ पुलिस ने पकड़ा था। खैर, पिछले चुनाव में संजय एक निजी स्टिंग में फंसे और नतीजे हार गये। हार से खिसियाये बसपाइयों ने जीते लोगों के जुलूस पर फायरिंग कर दी थी। गुस्‍सायी जनता भड़क गयी और रामअचल की राइस मिल फूंक डाली दी गयी। मामले में रामअचल के साथ उनके बेटे संजय और अजय नामजद हुए। रामअचल तो किसी तरह अपना नाम कटवाने में सफल रहे, लेकिन अजय और संजय अभी तक फरार हैं। हैरत की बात तो यह है कि इस हंगामे के खिलाफ कोर्ट ने कुर्की का आदेश तो दिया, लेकिन पुलिस ने अब तक कोई कार्रवाई की ही नहीं। उधर रामअचल सिंह को इसकी फिक्र भी नहीं है। बसपा के ही एक स्‍थानीय नेता ने बताया कि रामअचल का ज्‍यादा ध्‍यान अब यूपी के बजाय उत्‍तरांचल पर है, जहां के दिग्‍गज नेतागण रामअचल के चेले हैं। मतलब साफ है कि राजनीति हो या धंधा, रामअचल राजभर अपनी बस की अंधाधुंध स्‍पीड तेज करने में जुटे रहेंगे। आखिरकार वे हरफन-मौला हैं। है कि नहीं।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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