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नसीहत देने के बजाय हम खुद जागरूक हों…

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-डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर||

नरेन्द्र मोदी ने 50 करोड़ का बयान क्या दे डाला समूचे काँग्रेसी संस्करण में उबाल दिखने लगा। कोई मोदी को सभ्यता की भाषा सिखाने लगा तो कोई बताने लगा कि देश के प्रधानमंत्री पद के दावेदार को कैसी भाषा बोलनी चाहिए। कुछ समझाने लगे कि भाजपा के द्वारा संस्कृति-सभ्यता की बात की जाती है और ऐसे बयान उसके नेताओं को शोभा नहीं देते। जान-सुनकर अच्छा लगा कि इस देश की संस्कृति से सर्वाधिक खिलवाड़ करने वाले, संस्कृति का सत्यानाश करने वाले काँग्रेसियों को संस्कृति की बातें आने लगी हैं।

मोदी के इस तरह के बयान देने और उसे तूल देने को राजनीति की दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए। वे लोग जो इस बयान के विरोध में खड़े हैं और वे लोग भी जो इस बयान के पक्ष में हैं, महिलाओं को कितना सम्मान देने वाले हैं, सभी जानते हैं। काँग्रेस सरकार के मंत्री, पूर्व मंत्री, अफसर रहे हों अथवा भाजपा सरकार के लोग, कहीं से भी महिलाओं के प्रति संवेदनशील नहीं दिखाई देते। अभी कुछ दिनों पूर्व ही काँग्रेस के एक वरिष्ठ मंत्री जी की महिलाओं को लेकर एक (अ)भद्र टिप्पणी के बाद जो काँग्रसी मौन साधना में लीन हो गये थे उन्होंने अपनी मौन साधना को मोदी के बयान के बाद तोड़ दिया है। बहरहाल ये तो बात उन नेताओं की है जिनका कोई ईमान-धर्म नहीं रह गया है। सत्ता के लिए, पद के लिए किस हद तक अपने आपको गिरा सकते हैं, कहा नहीं जा सकता है। हास्यास्पद तो यह है कि इस बयान के पक्ष-विपक्ष में आम आदमी भी पूरी मुस्तैदी से इस तरह की बयानबाजी करने में लगा है जैसे वह थरूर दम्पत्ति का अथवा मोदी का दिया हुआ खाता हो।

राजनीति में किस तरह से बाजियों का निर्धारण होता है, यह हम सभी से छिपा नहीं है। ऐसे में कम से कम जनमानस को इस बात का विचार करना चाहिए कि वे किस बात के विरोध में आयें और किसका समर्थन करें। जो आम आदमी मोदी के बयान पर ताली पीटता दिख रहा है उसे देखना होगा कि समाज में आये दिन उन्हीं की हरकतों के कारण हमारी माताओं-बहिनों को सड़कों पर जलील होना पड़ता है। इसके साथ ही उन सभी लोगों को भी आगे के लिए सचेत होना पड़ेगा जो मोदी के बयान पर घनघोर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उनके बयान को महिला-सम्मान के विरोध में बता रहे हैं। उन सभी को इस बात के लिए जागरूक रहना पड़ेगा कि उनके सामने समाज में कोई भी महिलाओं के सम्मान से खिलवाड़ न करने पाये। लगभग रोज ही सड़कों पर, बसों में, कार्यालयों में, बाजारों में महिलाओं के साथ छेड़खानी के दृश्य हमारे सामने से गुजरते रहते हैं; पुरुष बात-बात में माँ-बहिन की गालियों का बेशर्मी भरा आदान-प्रदान करते हुए दिख जाते हैं;  मुँह से न सही, हाथ-पैर से न सही आँखों ही आँखों में हम रोज ही कितनी महिलाओं की इज्जत को तार-तार करते हुए शराफतमंदों को देखकर भी खामोशी ओढ़ लेते हैं; जाने कितनी बच्चियों की चीखों को अनसुना करके अपनी-अपनी संस्कृति-सभ्यता का विस्तार करने में लग जाते है और यहाँ अपने आपको बुद्धिजीवी घोषित करवाने के फेर में बयान के पक्ष-विपक्ष में खुलकर उतर आये हैं।

समाज में हो रही विसंगतियों का विरोध होना चाहिए, समाज में हो रहे अन्याय का विरोध होना चाहिए, समाज में व्याप्त कुरीतियों का विरोध होना चाहिए पर विरोध सकारात्मक विरोध के लिए हो, समाज-सुधार के लिए हो। किसी एक विचारधारा के पोषक के रूप में किये जाने वाला विरोध अपने आपमें एक प्रकार का कट्टरपन है। हाँ, इस कट्टरपन से उन लोगों को मुक्त रखा जा सकता है जो सम्बन्धित दलों के प्रति स्वामिभक्ति का भाव रखते हैं। यदि हम वाकई अपने आपको बुद्धिजीवी की श्रेणी में खड़ा मानते हैं, यदि हम स्वयं को वाकई समाज-सुधार के प्रति जागरूक मानते हैं तो हमें सही गलत की पहचान करके पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए बिना अपनी राय को व्यक्त करना होगा।

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About Author

बुन्देलखण्ड के उरई-जालौन में जन्म। बुन्देलखण्ड क्षेत्र एवं बुन्देली भाषा-संस्कृति विकास, कन्या भ्रूण हत्या निवारण, सूचना का अधिकार अधिनियम, बाल अधिकार, पर्यावरण हेतु सतत व्यावहारिक क्रियाशीलता। साहित्यिक एवं मीडिया क्षेत्र में सक्रियता के चलते पत्र-पत्रिकाओं एवं अनेक वेबसाइट के लिए नियमित लेखन। एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन। सम्प्रति साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ और इंटरनैशनल रिसर्च जर्नल ‘मेनीफेस्टो’ का संपादन; सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’ तथा ‘पीएचड होल्डर्स एसोसिएशन’ का संचालन; निदेशक-सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान; महाविद्यालय में अध्यापन कार्य। सम्पर्क - www.kumarendra.com ई-मेल - [email protected] फेसबुक – http://facebook.com/dr.kumarendra, http://facebook.com/rajakumarendra

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