/बसपा की चुनावी रणनीति में लाचारी की झलक..

बसपा की चुनावी रणनीति में लाचारी की झलक..

-आशीष वशिष्ठ||

लखनऊ. सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और दूसरे दलों के नेता भले ही मध्यावधि चुनाव की बात कर रहे हों लेकिन समाजवादी पार्टी से दो कदम आगे निकलते हुए बहुजन समाज पार्टी ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और लखनऊ की प्रतिष्ठित संसदीय सीट से अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर सबको चौंका दिया है. बसपा सभी दलों के दिग्गजों को टक्कर देने के पूरे मूड में है. गौरतलब है कि पिछले पखवाड़े बसपा ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र मैनपुरी से बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी डॉ. संघमित्रा मौर्य, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी की रायबरेली संसदीय सीट से रामलखन पासी और लखनऊ लोकसभा सीट से पूर्व मंत्री नुकुल दूबे को प्रत्याशी घोषित किया है.

अमूमन राजनीतिक दल दिग्गज नेताओं के समक्ष प्रत्याक्षी उतारते नहीं हैं या फिर डमी प्रत्याशी उतार कर खानापूर्ति ही करते हैं. प्रदेश में विधानसभा चुनाव में दुर्गति के बाद बसपा लोकसभा चुनाव में फूंक- फूंक कर कदम रख रही है. तीन महत्वपूर्ण सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर उसने इरादे साफ कर दिये हैं. वह इन सीटों पर कमजोर उम्मीदवार घोषित कर बसपा क्या साबित करना चाहती है यह बात समझ से परे है. क्या वह दूसरे दलों का चुनावी गणित बिगाडऩा चाहती है. क्या बसपा डमी या कमजोर उम्मीदवार घोषित कर सस्ती लोकप्रियता बटोर रही है या फिर सनसनी फैलाना चाहती है. क्या वह सपा और कांग्रेस के मजबूत व दिग्गज उम्मीदवारों के समक्ष कमजोर उम्मीदवार उतारकर दोनों दलों से मधुर संबंध बनाने के मूड में तो नहीं है.

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से सांसद हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में उनके समक्ष बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार विनय शाक्य और भाजपा की तृप्ति शाक्य थीं. मुलायम ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बसपा के विनय शाक्य को 173069 मतों से हराया था. 2004 के लोकसभा चुनाव में यहीं से मुलायम सिंह यादव ने बसपा के अशोक शाक्य को साढे तीन लाख मतों के से पटखनी दी थी. 1998 का लोकसभा चुनाव मुलायम ने संभल से और 1999 का चुनाव संभल व कन्नौज दो स्थानों से लड़ा और दोनों सीटों से  उन्होंने विजय प्राप्त की. बाद में मुलायम ने कन्नौज सीट से छोड़ दी थी जिस पर उनके पुत्र अखिलेश यादव ने वर्ष 2000 के उपचुनाव में विजय हासिल की. 11वीं लोकसभा के वर्ष 1996 में हुआ चुनाव मुलायम ने मैनपुरी से लड़ा और वो तत्कालीन सरकार में रक्षामंत्री बने. 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मुलायम सिंह यादव के समक्ष उम्मीदवार नहीं उतारा था. मैनपुरी सीट पर समाजवादी का पिछले लगभग डेढ दशक से समाजवादी का ही कब्जा है. बसपा ने डॉ. संघमित्रा मौर्य को प्रत्याक्षी घोषित कर एक तरह से सपा सुप्रीमो को वॉक ओवर दिया है. पूर्व बसपा प्रदेश अध्यक्ष की बेटी संघमित्रा ने 2012 में विधानसभा चुनाव एटा जिले की अलीगंज सीट से लड़ा था उन्हें समाजवादी पार्टी प्रत्याक्षी रामेश्वर सिंह ने पराजित किया था.

कांग्रेस अध्यक्ष एवं संप्रग चेयरपर्सन सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र से बसपा ने रामलखन पासी को प्रत्याक्षी घोषित किया है. रायबरेली नेहरू-गांधी परिवार की परंपरागत सीट मानी जाती है. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की असमय मृत्यु के बाद श्रीमती सोनिया ने 1999 में उत्तर प्रदेश के अमेठी और कर्नाटक राज्य की बेल्लारी सीट से चुनाव लड़ा था. अमेठी में सोनिया के समक्ष राज्य के प्रमुख दलों भाजपा, बसपा और सपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे. सोनिया ने अमेठी लोकसभा सीट तीन लाख से अधिक मतों के भारी अंतर से जीती थी उन्होंने भाजपा प्रत्याक्षी डॉ. संजय सिंह, बसपा के पारस नाथ मौर्य और सपा के कमरजुम्मा फौजी को धूल चटाई थी. बेल्लारी सीट से भाजपा की वरिष्ठï नेता सुषमा स्वराज को उन्होंने हराया था. 2004 का लोकसभा चुनाव सोनिया ने रायबरेली से लड़ा था तब से वे लगतार रायबरेली से सांसद निर्वाचित हो रही हैं. 2004, 2006 एवं 2009 के चुनाव में सोनिया ने क्रमश: सपा के अशोक सिंह, राजकुमार और बसपा के आरएस कुशवाहा को पटखनी दी उन्होंने हर बार अपने  विरोधियों को भारी अंतर से धूल चटाई. 2006 के लोकसभा चुनाव में सोनिया ने भाजपा के वरिष्ठï नेता विनय कटियार को हराया था. इस चुनाव में सपा उम्मीदवार राजकुमार दूसरे व विनय कटियार तीसरे स्थान पर रहे थे. सोनिया को इस चुनाव में 474891 मिले थे और सपा एवं भाजपा उम्मीदवार को क्रमश: 5700319657 मत मिले थे. 2012 के विधानसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी जिले की दस विधानसभा सीटों में नौ सीटे कांग्रेस के हाथ से निकल जाने के बाद विरोधी दल सोनिया गंाधी व राहुल को घेरने की नीयत से दबाव बना रहे हैं. सोनिया के समक्ष रामलखन पासी जैसा कमजोर उम्मीदवार खड़ा कर बसपा क्या साबित करना चाहती है ये मायावती शायद बखूबी जानती है.

प्रतिष्ठित लखनऊ की लोकसभा सीट पर पिछले दो दशकों से भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. 1991 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के वरिष्ठï नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेस के रंजीत सिंह को हराकर जीत हासिल की. इसके बाद 1996, 1998, 1999 एवं 2004 के चुनाव में लगातार अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ के सांसद रहे. अटल जी के व्यक्तित्त्व के समक्ष तमाम दलों के नेता बौने साबित हुए. कांग्रेस तथा सपा ने अटल जी के समक्ष डॉ. कर्ण सिंह, राजबब्बर, मुजफ्फर अली को मैदान में तो उतारा लेकिन वे कोई फर्क न डाल सके. वर्ष 2009 में स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके अटल बिहारी वाजपेयी के स्थान भाजपा नेता लालजी टण्डन ने चुनाव लड़ा. उन्होंने कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा जोशी, बसपा के डॉ. अखिलेश दास एवं सपा की नफीसा अली को हराकर भाजपा का कब्जा बरकरार रखा. पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी डॉ. अखिलेश दास ने पानी की तरह पैसा बहाया था लेकिन वो भाजपा उम्मीदवार को पछाड़ पाने में कामयाब नहीं हो पाए. अंतिम समय में चुनाव मैदान में उतरी कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने चंद दिनों के प्रचार में ही डेढ लाख से अधिक वोट पाकर बसपा उम्मीदवार को तीसरे स्थान पर धकेल दिया. लखनऊ जिले में शहरी सीटों पर बसपा की स्थिति मजबूत नहीं है. विधानसभा चुनाव में जिले की नौ सीटों में सात पर सपा और एक-एक सीट पर कांग्रेस और भाजपा का कब्जा है. लोकसभा चुनाव के घोषित बसपा उम्मीदवार पूर्व मंत्री नकुल दूबे राजधानी की बक्शी का तालाब सीट से सपा उम्मीदवार के हाथों हार का मुंह देख चुके हैं. ऐसे में बसपा का कमजोर व पराजित उम्मीदवार को मैदान में उतारना समझ से परे है.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.