/कैसे रुक सकेगी गुंडागर्दी…?

कैसे रुक सकेगी गुंडागर्दी…?

-अनुराग मिश्र ||

अभी कुछ दिन पहले ही राजधानी में एक ऐसी घटना देखने को मिली जहाँ सिर्फ अपराधी को केवल इस नाम पर बख्शदिया गया क्योकि उसने खुद को सत्ताधारी दल से जुड़े लोगो का परिचित बताया था। मामला हजरत गंज स्थित रायल कैफे का है जहाँ पर एक युवक मेहंदी लगवा रही युवतियों को छेड़ रहा था। युवतियों से इसकी शिकायत पास ही ड्यूटी पर तैनात सिपाही से की। सिपाही ने जब युवक को रोकने की कोशिश की तो युवक आपे से बाहर हो गया और सिपाही को पीटने लगा। सिपाही को पिटता देख एक दरोगा सहित कई पुलिसकर्मी मौके पहुचे पर जैसे ही युवक ने अपना परिचय बताया सभी लोगो ने अपने कदम वापस खींच लिए और सिपाही को समझाते बुझाते हुए मामले को रफा दफा कर दिया। हलाकि ये कोई पहला मामला नहीं है जब सत्ता के डर से पुलिस ने कानून को हाथ में लेने वालो को छोड़ दिया हो। इससे पहले भी ऐसी घटना हो चुकी हैं। अभी करीबन एक महिना पहले ही इस तरह का मामला है अलीगंज थाना क्षेत्र में भी देखने को मिला था जहाँ एक बिल्डर पे संगीन आरोप होने के बाद भी अलीगंज पुलिस ने मामले पर सख्त रुख अपनाने की जगह पर थाने से खिसक लेना ही बेहतर समझा क्योकि उस बिल्डर ने खुद को किसी सपा संसद का बेहद करीबी गुर्गा बताया था। ये बात अलग ही की है कि जब अलीगंज पुलिस ने सांसद से संपर्क किया तो पता चला की उक्त बिल्डर का सांसद से कोई सम्बन्ध नहीं है जिसके बाद पुलिस ने उक्त मामले में कार्यवाही की।
राज्य के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बार- बार  कह रहे है कि कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने वालो को बक्शा नहीं जायेगा। पर ये दोनों घटनाये तो कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही हैं। इन दोनों घटनाओ से यह यह स्पष्ट  होता है कि मुख्यमंत्री के लगातार दिए जा रहे निर्देशों के बाद भी राज्य पुलिस में सत्ता का ऐसा खौफ बैठा हुआ जिसके चलते यदि आम आदमी भी थोडा सख्ती से पुलिस वालों से ये कहे कि मै फलां सपा नेता का परिचित हूँ या रिश्तेदार हूँ तो राजधानी पुलिस बड़े अदब के साथ उसे छोड़ देगी। ऐसी स्थिति में राज्य की कानून व्यवस्था कैसे सुधरेगी ? ये अहम् सवाल है। हालाँकि मुख्यमंत्री ने कानून व्यवस्था पर अपनी सरकार की कमजोरियों को माना है पर जिस अंदाज में उन्होंने अपनी सरकार की कमियों को माना वो बात थोड़ी समझ से परे है। मुख्यमंत्री लगातार अपने बयानों में बिगडती कानून व्यवस्था के लिए पूर्ववर्ती माया सरकार को जिम्मेदार ठहराते है। अभी हाल ही में हुए कुछ सांप्रदायिक दंगो पर उठे सवालों के जवाब में मुख्यमंत्री ने मीडिया से कहा ये दंगे सांप्रदायिक नहीं थे अपितु कुछ स्थानीय लोगो की मदद से सरकार को बदनाम करने के लिए विपक्ष की साजिश थी। चलिए एक पल को मान लेते है कि ये दंगे सांप्रदायिक न होकर स्थानीय लोगो की मदद से विपक्ष की साजिश थी। फिर तो कानून व्यवस्था के मुद्दे पर इस सरकार की निष्क्रियता और स्पष्ट होती है क्योकि अगर ये स्थानीय कृत्य था तो इसकी जानकारी स्थानीय ख़ुफ़िया तंत्र (एल आई यू)  को होनी चाहिए थी और यदि स्थानीय ख़ुफ़िया तंत्र पहले से रची जा रही साजिशो का पता लगाने में विफल है तो इसका स्पष्ट अर्थ यही होगा की राज्य सरकार कानून व्यवस्था को नियंत्रित नहीं कर पा रही है। जहाँ तक बात पूर्ववर्ती सरकार के शासनकाल की है तो माया सरकार के पांच साल के शासन काल में ऐसी कोई अप्रिय घटनाये नहीं हुई जिसने माया सरकार को कानून व्यवस्था के मुद्दे पर सवालों के घेरे में खड़ा किया हो।  वर्ष 2007 में अपनी सरकार बन जाने के कुछ दिन के अन्दर ही अपने निवास से अपनी पार्टी के सांसद को गिरफ्तार कराकर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावाती ने स्पष्ट सन्देश दिया था कि राज्य में कानून व्यवस्था के मुद्दे में कोई समझौता नहीं किया जायेगा।
इस सरकार में स्थिति बिलकुल उल्टी हैं। यहाँ कानून हाथ में लेने वाले पार्टी के नेताओ की गिरफ़्तारी दूर की बात है उनके विरुद्ध प्राथमिकी भी नहीं दर्ज होती है। जिसका उदाहरण पूर्व मंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ़ पंडित सिंह द्वारा सीएमओ की पिटाई के बाद राज्य सरकार द्वारा अब तक की गयी लचीली कार्यवाही है। वास्तव में देखा जाये तो कानून व्यवस्था को मजबूत करने वाले पुलिस के कंधे इस सरकार में नेताओ और अपराधियों के बोझ के चलते झुक गये है। इसके दो कारण है पहला ये कि सपा सरकार को लेकर ये आम धारणा है कि इस सरकार में अपराधियों को क़ानूनी सरक्षण मिलता है, दूसरा ये कि लगातार इमानदार और निर्भीक पुलिस अधिकारीयों का स्थानीय नेताओ के सिफारिश पर स्थानांतरण। ये दो कारण है जिसके चलते स्थानीय पुलिस कार्यवाही से डरती है। जब तक इन कारणों का समाधान नहीं किया जायेगा राज्य की कानून व्यवस्था नहीं सुधरेगी।
मुख्यमंत्री अखिलेश के लिए यह आवश्यक है की वो बेहद गंभीर हो चुकी स्थिति को समझे और आवश्यक कार्यवाही करे। उन्हें राज्य की कानून व्यवस्था को मजबूत करने लिए खुद एक कदम आगे बढ़ाना होगा और अपनी सरकार और पार्टी को लेकर जनता में बनी आम धारणा को तोड़ते हुए पूर्व मुख्यमंत्री की तर्ज पर कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे कार्यकर्ताओ और नेताओ के विरुद्ध सख्ती कार्यवाही करनी होगी। इसके अतरिक्त उन्हें सिफारिश पर स्थानातरण करने के प्रक्रिया पर भी रोक लगाना होगा। उन्हें स्पष्ट रूप से यह सन्देश देना होगा की कानून व्यवस्था की मुद्दे पर किसी को भी नहीं बक्शा जायेगा वो चाहे पार्टी कार्यकर्त्ता या नेता ही क्यों न हो। राज्य की बिगडती कानून व्यवस्था को सुधारना इस मायने में भी आवशयक है कि 2014 का लोकसभा चुनाव बेहद नजदीक है और पार्टी  उत्तर प्रदेश से लोकसभा की 60 सीटे देख रही है। ऐसी स्थति में यदि राज्य की कानून व्यवस्था नहीं सुधरेगी तो उत्तर प्रदेश से लोकसभा की 60 सीटे जीतने का सपा प्रमुख का सपना सपना ही रह जायेगा। शायद सपा प्रमुख इस स्थिति को समझ रहे है और इसीलिए लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर लगातार हो रही पार्टी मीटिंगों में कानून व्यवस्था के मुद्दे पर बिगडती पार्टी की छवि  के प्रति अपनी चिंता को छुपा नहीं पाते हैं।

(लेखक तहलका न्यूज, लखनऊ के उप संपादक हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.