/मुहाना मण्डी की मेहनत-कश महिला मजदूरों की दयनीय दशा

मुहाना मण्डी की मेहनत-कश महिला मजदूरों की दयनीय दशा

-श्वेता त्रिपाठी||
सुबह के 9 बजे, चारों ओर सब्जी और फलों से भरे ट्रक ही ट्रक! आदमी सब्जियों और फलों से भरे बोरों को ट्रक से उतार कर कांटे पर रखते जा रहे थे! सब्जियों और फलों के थोक विक्रेता बोरों को कांटे पर तोल कर खरीददारों को बेच रहे थे। खरीददार थोक विक्रेता के पास आते है और सब्जियों से भरा बोरा तुलवाते है। तुले हुए बोरे को 4 आदमी उठाकर एक महिला के सिर पर रखवाते। महिला उस बोर को उठा कर चल पड़ती है मंजिले की और . . फिर दूसरा खरीददार आता है, बोरा तुलवाता है और 4 आदमी मिलकर उस बोरे को उठाकर दूसरी महिला के सिर पर रखवा देते है. . वह महिला भी सिर पर बोरा लिए फुर्ती से चल पड़ती है मंजिल की ओर . . और यह सिलसिला चलता रहता है लगातार . . . यह स्थिति है जयपुर की मुहाना मण्डी में बोझा ढोने वाली महिलाओं की!

वो सब्जी से भरे बोरे दिखने में बहुत भारी वज़न के लग रहे थे। थोक विक्रेता से पूछने पर पता चला कि इन बोरों का वज़न 70 से 100 किलोग्राम है और ये महिलाएं मण्डी में वज़न ढोने का काम करती हैं।

पूरी मण्डी में हर जगह महिलाएं अपने सर पर बोझा उठा कर एक जगह से दूसरी जगह ले जा रही थीं। उन महिलाओं ने बताया कि “मजदूरी का तो कुछ भी तय नहीं है, बोझा उठाने की एवज में हमें एक बोरे के 2 रुपये से लेकर 10 रुपये तक मिल जाते हैं। कभी 5 रुपये तो कभी 10 रुपये प्रति बोरा भी मिल जाते हैं।” जानकारी के अनुसार मजदूरी का दूरी और वज़न से कोई लेना देना नहीं है। 50 किलोग्राम से 100 किलोग्राम तक का वज़न एक बार में ढोना पड़ता है। ये महिलाएं सुबह 4 बजे से मण्डी में आती हैं और दोपहर 1 या 2 बजे तक काम करती हैं।

ना घर में सुख, ना काम पर कोई परवाह

बोझा ढोने वाली इन महिलाओं को ना तो घर में सुख मिलता है ना ही काम पर कोई परवाह करता है। अमूमन महिलाएं अपने शराबी पतियों से प्रताडि़त है। कार्यस्थल पर भी किसी को उनकी परवाह नहीं है। यदि काम के दौरान महिला के साथ कोई दुर्घटना घटित हो जाये या उसे चोट लग जाये तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता है। इस काम में वृद्धा, विधवा, परित्यक्ता व तलाकशुदा महिलाएं इस काम से जुडी हुई हैं।

जयपुर की मुहाना मण्डी में लगभग 2 हज़ार महिलाएं बोझा ढोने का काम करती है। गोनेर, चाकसू, चोमू, गलता गेट, कीरों की ढाणी, झालाना कच्ची बस्ती आदि जयपुर के चारों कोनों से महिलाएं इस काम को करने के लिए मुहाना मण्डी में आती हैं। ये महिलाएं रोज़ सुबह 4 – 5 बजे 10 से 20 रूपए खर्च करके मण्डी तक आती हैं। सभी महिलाएं खुली मजदूरी करती हैं। एक दिन में 50 से 150 रूपए तक महिला कमा लेती है। 100 मीटर से लेकर 800 मीटर तक के दायरे में महिलाओं को बोझा अपने सर पर उठा कर घूमना पड़ता है। सामान ढोते वक़्त यदि महिला से कोई नुकसान हो जाये तो उसकी भरपाई भी महिलाओं से ही की जाती है।

मुहाना मण्डी से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित कच्ची बस्ती कीरों की ढाणी में कुल 2 हज़ार 9 सौ घर हैं। इस बस्ती की लगभग सभी महिलाएं मुहाना मण्डी में बोझा ढोने का काम करती हैं। इन परिवारों में से कोई तो 17 साल तो कोई 10 साल से इस बस्ती में रह रहा है। पहले इस बस्ती के पुरुष एवं महिलाएं मुहाना मण्डी में ही बेलदारी का काम किया करते थे। मण्डी बनने के बाद महिलाओं ने बेलदारी छोड़ कर बोझा उठाने का काम शुरू कर दिया क्योंकि इस काम में रोज़ की कमाई हो जाती है जबकि बेलदारी में कभी काम मिलता था तो कभी नहीं मिलता था। कुछ महिलाओं के पति अभी भी मण्डी में बेलदारी का काम करते हैं। कीरों की ढाणी कच्ची बस्ती की आजीविका पूरी तरह से मुहाना मण्डी पर निर्भर है।

बस्ती में स्कूल नहीं, 3 शराब ठेके हैं

कीरों की ढाणी कच्ची बस्ती की महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय है। परिवार पूरी तरह इन्हीं पर आश्रित हैं। सुबह 4 बजे से दोपहर 1 या 2 बजे तक मण्डी में बोझा ढ़ोती है, उसके बाद घर आकर खाना बनाती हैं व घर के अन्य काम करती हैं।

श्वेता त्रिपाठी आजीविका ब्यूरों, उदयपुर के साथ कार्यरत हैं.

इस बस्ती में शिक्षा के नाम पर एक भी सरकारी स्कूल नहीं है जबकि 3 दारु के ठेके हैं। कुछ बच्चे सांगानेर के एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने जाते हैं। जबकि अधिकतर बच्चे शिक्षा से वंचित हैं! बस्ती में चिकित्सा की कोई सुविधा नहीं है। लोगों को इलाज करवाने के लिए सांगानेर जाना पड़ता है! पीने का पानी तक इनको नहीं मिलता है।

2900 घरों के बीच सिर्फ एक ही आंगनबाड़ी केंद्र है। लोगों के पास राशन कार्ड नहीं हैं। जिनके पास राशन कार्ड हैं उन्हें भी राशन की दुकान वाला महीने में सिर्फ एक बार ही राशन देता है। महिलाओ ने बताया कि राशन डीलर उन्हें पूरा राशन नहीं देता है। 3 लीटर केरोसिन की जगह 1 या 2 लीटर ही देता है। इन महिलाओं के पहचान पत्र तक नहीं हैं, सरकारी योजनाएं तो यहां तक पहुंच ही नहीं पाई है।

 


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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.