/आई क्यू, कायकू…

आई क्यू, कायकू…

– आलोक पुराणिक||

उन्होने मुझसे पूछा कि क्या मेरा आईक्यू उनकी बातों को समझने का लेवल का है।

मैंने कहा-आपकी बातें सुनकर मेरा आईक्यू बढ़ ही जाना है।

व्यंग्यचित्र: मनोज कुरील

उन्होने कहा-जा तू कसाब हो जा। मैं तेरी तुलना कसाब से करता हूं।

मैंने आपत्ति जाहिर की-ये क्या बदतमीजी है। मैं कसाब क्यों हो जाऊं।

उन्होने बताया-अबे चिरकुट, कसाब फुल मौज में है। टापमटाप बहुराष्ट्रीय स्टारबक्स काफी का सेंटर मुंबई में खुला है। कसाब स्टारबक्स काफी मांग रहा है। बल्कि मैं दुआ करता हूं कि दिल्ली वालों को कसाब होना नसीब हो।

मैंने फिर आपत्ति जाहिर की-ये क्या विकट बदतमीजी है।

उन्होने बताया-बेवकूफ, दिल्ली वालों को डेंगू हो रहा है और कसाब को भी डेंगू हो गया है। कसाब जैसी केयर हर दिल्ली वाले को नसीब हो। तू अपना आईक्यू ठीक कर।

उन्होने आगे कहा-मैंने राजस्थान के मदरेणा और यूएस के क्लिंटन के आईक्यू की तुलना की है और पाया है कि यूएस में सिचुएशन ठीक है।

मैंने फिर आपत्ति जाहिर की-ये क्या यूएस और राजस्थान की तुलना कर रहे हैं।

उन्होने डांटा-शटअप, तुम्हारा आईक्यू बहुत पिछड़ा हुआ है। राजस्थान के मदेरणा और यूएस के क्लिंटन दोनों सेक्स स्कैंडल में फंसे थे। पर क्लिंटन अब मुक्त हैं। मौज कर रहे हैं, उनका आईक्यू ठीक सा लगता है।

मैंने फिर आपत्ति की-ये क्या अगड़म बगड़म आप मचाये हुए हैं। सीधी सी बात कीजिये, जो समझ में आये। ये आई क्यू का मसला काय कू। आप ये बतायें कि देश में डेमोक्रेसी में पक्ष और विपक्ष का रोल क्या होता है।

उन्होने बताया-देखो, एक पक्ष होता है, दूसरा विपक्ष होता है। और विपक्ष के अंदर भी विपक्ष होता है, विपक्ष के नेता के विपक्ष में भी कई नेता हो जाते हैं, हालांकि उनका भी एक पक्ष होता है। पर उन्हे विपक्ष का विपक्ष माना जा सकता है। जिस तरह पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र होता है, उसी तरह से आंतरिक विपक्ष भी होता है। पक्ष टू पक्ष, विपक्ष टू विपक्ष।

मैंने फिर निवेदन किया-मुझे आपकी बात समझ में ना आ रही है।

उन्होने फाइनली बताया- मुझे शुरु से ही तुम्हारे आईक्यू पर शक था। आईक्यू बढ़ाओ, तब मेरी बात समझ पाओगे।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.