/सीमा पर घुसपैठ का भारत ने जताया विरोध

सीमा पर घुसपैठ का भारत ने जताया विरोध

-चन्दन भाटी||

सीमा सुरक्षा बल व पाकिस्तान रेंजर्स की संयुक्त त्रैमासिक बैठक बुधवार को सीमा स्तंभ 814 पर मुनाबाव में आयोजित हुई. इसमें भारतीय दल के प्रमुख ने पाकिस्तानी नागरिकों की ओर से सीमा पर की जाने वाली अवैध घुसपैठ पर कड़ी आपत्ति जताई. इस पर पाक दल के प्रतिनिधियों ने पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तैनात जवानों को सख्त निर्देश देकर घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई करने के साथ ही घुसपैठ पर पाबंदी लगाने का आश्वासन दिया. इसके साथ ही बैठक में कई अन्य मुद्दों पर भी चर्चा की गई.

मुनाबाव कांफ्रेंस हॉल में आयोजित इस संयुक्त बैठक की शुरूआत में बीएसएफ के डीआईजी आर.एस. राठौर ने पाकिस्तानी दल का स्वागत किया. पाक दल का नेतृत्व पाक रेंजर्स के डीडीजी ब्रिगेडियर मोहम्मद रफीक खान ने किया. बैठक में सीमा संबंधी मामलों पर विचार-विमर्श किया गया. बैठक में भारत की ओर से सीमा के निकट पाक नागरिकों की ओर से मवेशी चराने की आड़ में तस्करी व अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन करने की संभावना पर कड़ी आपत्ति की गई. वहीं पाक रेंजर्स ने बीएसएफ की ओर से लगाई गई फ्लड लाइट्स की रोशनी के पाकिस्तान की जमीन पर पडऩे का मुद्दा उठाया गया. दोनों ही देश के प्रतिनिधियों ने सीमा पर शांति व सौहाद्र्र स्थापित कर सीमा रक्षक बलों के बीच आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिए अपनी सहमति जताई. बैठक के अंत में बीएसएफ व पाक रेंजर्स की ओर से प्रमुख निर्णयों की प्रतिलिपियों पर हस्ताक्षर कर एक-दूसरे को सुपुर्द किए गए. पाक दल का नेतृत्व कर रहे ब्रिगेडियर खान ने बैठक को सफल बताते हुए धन्यवाद दिया. अंत में बीएसएफ के बैंड दल ने धुनें बिखेरी. बैठक में भारत की ओर से डीआईजी राठौर के अलावा डीआईजी हरमिंदर पाल, यू.के. नयाल, आर.के. थापा, एम.एस. चौहान, समादेष्टा आई.के. मेहता, उप समादेष्टा के.सी. यादव व सहायक कमांडेंट आर.के. डागर ने भाग लिया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.