/किसानों की समस्याओं पर सियासी चुप्पी…

किसानों की समस्याओं पर सियासी चुप्पी…

– डॉ. आशीष वशिष्ठ||

धरतीपुत्र किसानों की समस्याओं पर सियासी चुप्पी हैरान करने वाली है. चुनाव के समय हर राजनीतिक दल किसानों की समस्याओं को हल करने के लंबे-चौड़े वादे करता है लेकिन सत्ता हासिल करने के बाद घोषणा पत्र रद्दी की टोकरी की शोभा बढ़ाते हैं और किसान फांसी के फंदे पर झूलने को विवश होते हैं. पिछले दो दशकों में हजारों किसान कर्ज व गरीबी से तंग आकर आत्महत्या कर चुके हैं बावजूद इसके सरकार किसान और खेती-बाड़ी के बारे में कोई दूरगामी या ठोस नीति बनाने की बजाए सियासत और बयानबाजी तक ही सीमित है. जिस देश की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित हो, जिस देश में खेती-किसानी लगभग 65 फीसद आबादी की रोजी-रोटी का जरिया हो उस देश में किसानों का आत्महत्या करना, खेती-किसानी से विमुख होना या फिर नई पीढ़ी का खेती से मोहभंग होना व्यवस्था व नीतियों की पोल खोलता है. नेताओं, मंत्रियों और नीति निर्माताओं से जमीनी हकीकत छिपी नहीं है बावजूद इसके किसानों के लिए योजनाएं फाइलों का पेट भरने का काम कर रही हैं, और किसान भूखा, कर्जदार, तंगी और बदहाली का शिकार है. सरकार और सियासी दलों भूमि अधिग्रहण को ही किसानों की परेशानी का बड़ा कारण और मुद्दा समझ रहे हैं. लेकिन खेती-किसानी से जुड़ी बुनियादी जरूरतों और किसानों की परेशानियों को समझने में रणनीतिकार और सरकार फेल  साबित हुए हैं. मुद्दा केवल भूमि अधिग्रहण ही नहीं है. उपजाऊ जमीन पर कांक्रीट के जंगल खड़ा करना बड़ा मुद्दा जरूर है लेकिन देशभर में आत्महत्या करते किसानों की बड़ी संख्या सरकार और कृषि नीतियों को कटघरे में खड़ा करती है. खेती पर टिकी अर्थव्यवस्था वाले देश में किसानों का दुखी होना घोर अंधकारमय भविष्य का संकेत है.

आजादी के बाद की पीढ़ी यह पढ़ती आई कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, देश की आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि और उससे संबंधित उद्योग-धंधों से जुड़ा हुआ है. शायद नीति निर्माताओं और नेताओं ने यह समझ लिया कि कृषि के क्षेत्र में तो हमें सोचने की आवश्यकता हीं नहीं है सारी दुनिया में हमारा कोई सानी नहीं है. इसलिए सारा ध्यान उद्योगों की स्थापना और विकास में लगाया गया. देश की बढ़ती आबादी की अन्न और दूध की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हरित और श्वेत क्रांति ने बड़ी भूमिका निभाई लेकिन अन्ना का उत्पादन बढ़ाने के लिए हमने देसी फार्मूले और तकनीक की बजाए पश्चिम की तकनीक और प्रणाली पर ज्यादा जोर दिया. किसानों ने परंपरागत तरीकों की बजाए खेती की आधुनिक तकनीक पर ज्यादा भरोसा किया और सरकार और नीति निर्माताओं ने भी आधुनिक तकनीक का ही प्रचार-प्रसार किया. लेकिन इस तकनीक और तरीके ने किसानों की खेती की लागत को बढ़ा दिया. पेट भरने का जरिया खेती एक उद्योग में परिवर्तित हो गई. जिससे सबसे अधिक परेशानी छोटे और मझोले किसानों को हुई. छोटे और मझोले किसानों के पास खेती का कम क्षेत्रफल होने की वजह से खेती में अधिक लागत और मेहनत के बाद भी खेती के धंधे में मुनाफा कम और या फिर न के बराबर हो गया. किसानों की लाचारी और मजबूरी को फायदा सरकारी मशनीरी, बैंकों और मल्टी नेशनल कंपनियों के गठजोड़ ने उठाया. किसानों को सस्ती ब्याज दरों पर ऋण, बीज, खाद और यूरिया उपलब्ध कराने का लालच देकर किसानों की जमीन को गिरवी रख लिया गया. मौसम चक्र की गड़बड़ी से लेकर अन्य अनेक पहलू खेती और पैदावार को प्रभावित करते हैं. अगर फसल ठीक-ठाक हो भी गई तो किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिलना टेढी खीर साबित होता है. वहीं गांवों में साहूकर का मक्कडज़ाल आज भी उतना ही प्रभावी और क्रूर है जितना आजादी से पूर्व हुआ करता था. गरीब और छोटे किसान गाहे-बगाहे जरूरत और मजबूरी के अनुसार साहूकार और व्यापारियों के सामने हाथ फैलाए खड़े रहते हैं. और गरीबी का दुष्चक्र जो एक बार चलता है वो फिर थमने का नाम तभी लेता है जब कोई किसान फांसी के फंदे पर झूल चुका होता है.

राष्टï्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो और विभिन्न संगठनों द्वारा एकत्र आत्महत्या के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो किसानों की दुर्दशा समझ आती है. राष्ट्रिय स्तर पर हुई कुल आत्महत्याओं में किसान-आत्महत्याओं का प्रतिशत साल 1996 में 15.6 फीसद, साल 2002 में 16.3 फीसद  साल 2006 में 14.4 फीसद , साल 2009 में 13.7 फीसद  तथा साल 2010 में 11.9 फीसद तथा साल 2011 में 10.3 फीसद रहा है. साल 2011 में जितने लोगों ने भारत में आत्महत्या की किसानों की संख्या आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में  10.3 फीसदी थी. साल 2011 में भारत में जिन 135585 लोगों ने आत्महत्या की उसमें  स्वरोजगार में लगे लोगों का प्रतिशत 38.28 (कुल 51901) था. साल 2011 में स्वरोजगार में लगे कुल 51901 लोगों ने आत्महत्या की. इसमें किसानों की संख्या 14027 यानी 27.03  फीसदी है.  साल 1997-2006  यानी दस सालों की अवधि में भारत में 1,66,304  किसानों ने आत्महत्या की. साल 1997 – 2006  के बीच किसानों की आत्महत्या में सालाना 2.5  फीसद चक्रवृद्धि दर से बढ़त हुई. आत्महत्या करने वाले किसानों में ज्यादातर नकदी फसल की खेती करने वाले थे, मिसाल के लिए कपास(महाराष्ट्र), सूरजमुखी, मूंगफली और गन्ना (खासकर कर्नाटक में). सेहत की खराब दशा, संपत्ति को लेकर पारिवारिक विवाद, घरेलू कलह और बेटी को ब्याहने की गहन सामाजिक जिम्मेदारी सहित शराब की लत ने किसानों को कर्ज ना चुकता कर पाने की स्थिति में आत्महत्या की तरफ ढकेला. जिन स्रोतों से किसानों ने कर्ज लिया उनमें महाजन एक प्रमुख स्रोत रहे. 29 फीसदी कर्जदार किसानों ने महाजनों से कर्ज हासिल किया.

स्वतंत्र भारत में किसानों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा नहीं हो रही है. वह शासकीय तंत्र का गुलाम बनकर रह गया है. किसान खुद अपनी जमीन के मालिक नहीं हैं, जिससे उन्हें हर तरह के शोषण का सामना करना पड़ता है. उन्हें हर छ: महीने पर जमाबंदी रिकॉर्ड जमा कराना होता है, तो दूसरी तरफ कर भी देना होता है. यह व्यवस्था उपनिवेशवादी शासकों ने लागू की थी. तब से लेकर आज तक यह व्यवस्था कायम है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के किसान मनमाफिक तरीके से अपनी संपत्ति नहीं बेच सकते. वहीं देखिए तो जमीन पर मालिकाना हक नहीं होने के साथ-साथ अपने उत्पादों को अपनी मर्जी से जहां चाहें वहां बेचने का अधिकार भी उनके पास नहीं है. उसके उत्पादन की बोली कोई और लगाता है. देश की किसी भी छोटी सी छोटी मंडी में आप जाइए तो वहां छोटा किसान जो सिर पर एक टोकरी में गोभी या टमाटर भरकर मंडी लाता है वह स्वयं नहीं तय करता कि उसकी गोभी या टमाटर किस भाव में बेचे जाएंगे. उस पर अढ़ाती पहले उसकी टोकरी से दो-चार गोभी या एक-दो किलो टमाटर निकाल लेता है, जिस पर वह अपना अधिकार समझता है. फिर चार से आठ प्रतिशत तक अढ़ाती ली जाती है, जिससे एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग एक्ट की अवहेलना होती है. वैधानिक तौर पर मंडी कर के अलावा किसानों से कोई और कर नहीं लिया जा सकता पर अढ़ाती इतने मनमौजी कि वे खुलेआम किसानों से कर लेते हैं. यह सब प्रशासन की नाक के नीचे होता है पर इसकी ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं है. दूसरी तरफ किसान यदि अपने इलाके की मंडी छोडक़र दूसरी मंडी में अपना उत्पाद बेचना चाहे तो उसे परमिट की जरूरत पड़ती है.

साहूकारों के हाथों का खिलौना बनना किसानों की मजबूरी है. किसान यदि ट्रैक्टर, जनरेटर, थ्रेसर खरीदने, पशु खरीदने या किसी अन्य वजहों से बैंकों से कर्ज लेना चाहे तो उसके लिए इतनी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है कि किसानों को साहूकारों से अधिक सूद अदा करने की कीमत पर कर्ज लेना ज्यादा मुनासिब लगता है. ये मूलभूत बातें हैं, जो किसानों को आजाद भारत में भी गुलाम बना देती हैं. किसानों की जमीनों पर अधिग्रहण करना सरकार के लिए सबसे आसान है. वह जब चाहे किसानों से जमीन लेकर उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेच सकती है. सुप्रीम कोर्ट का साफ आदेश है कि किसानों की भूमि सार्वजनिक कार्यों के लिए अधिग्रहीत की जाए, पर उद्योगपतियों को जमीनें निजी उपयोग के लिए धड़ल्ले से दी जाती हैं. अधिग्रहण के समय किए गए वादे तक किसानों से पूरे नहीं किए जाते. वास्तव में उन्हें जो मूल्य प्राप्त होता है वह वास्तविकता से बहुत कम होता है.  किसानों के लिए सरकार का यह दोहरा मानदंड है या नहीं.

किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और उनका आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि गांवों में बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं. गांवों में बिजली पहुंचे, सडक़ बने, सिंचाई की सुविधाएं बढ़ें तो किसानों को खेती करना आसान रहेगा. तो दूसरी तरफ खेती के अलावा उनका तकनीकी ज्ञान और कौशल भी बढ़ाना चाहिए, जिससे कि वे वैकल्पिक रोजगारों पर भी विचार करें. राजनीतिक दल चुनावी घोषणा पत्र और सार्वजनिक मंचों पर किसानों की भलाई की बातें तो बहुत करते हैं लेकिन असल में कुछ हो नहीं रहा है. समय रहते सियासी दलों और सरकार को गंभीरता से जमीनी हकीकत को समझना होगा क्योंकि जब तक किसानों का हाथ मजबूत नहीं होगा देश की बेतहाशा बढ़ रही जनसंख्या की भूख मिटाने के लिए खेतों और किसानों पर पडऩे वाले दबाव को झेलना मुश्किल होगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.