/खाना बनाने के लिए जंगल होने लगे साफ़…

खाना बनाने के लिए जंगल होने लगे साफ़…

गैस सिलिंडरों  की बड़ी कीमतों  ने मिड डे मील प्रबंधन की मुश्किलें कई गुना बढाई..खाना बनाने के लिए जंगल होने लगे साफ़…

 

-धर्मशाला से अरविन्द शर्मा||

हिमाचल में अब मिड डे मील का स्कूलों में खाना बनाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है एक और तो अनाज और सब्जी की कीमतें नित दिन आकाश छूती जा रही हैं तो दूसरी तरफ  रही सही कसर गैस सिलिंडरों की कीमतों ने पूरी कर दी है. स्कूलो के मिड दे मील  के लिए पहले ४१० रूपए का गैस सिलिंडर आता था जिसे अब तेल कम्पनियों ने बड़ा कर १२६४ रूपए का कर दिया है इससे खाना पकाने की कीमत एक दम से तीन गुनी हो गयी है.

लगभग तीस स्कूलों से जब इस संवाददाता ने आंकड़े जमा किये तो नतीजे हैरान करने वाले निकले. सरकारी हिदायतों के अनुसार एक बच्चे  पर प्रतिदिन खाना बनाने का खर्च ६० पैसे आना चाहिए. जबकि १०० बच्चों का खाना बनाने पर अब प्रति दिन एक रूपए चालीस पैसे प्रति बच्चा खर्च आ रहा है. स्कूलों में मिड डे मील प्रबंधन इस खर्चे से पिछले चार पांच महीनों से परशान हैं. उच्च अधिकारियों ने गैस सिलिंडरों की बड़ी हुई कीमतों को प्रबधन को न देने से मिड डे मील का खाना बनाने में भारी दिक्कते आ रही हैं.

कुछ स्कूलों ने तो आस पास के जंगलों से लकड़ी इकठ्ठा कर खाना  बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है .यदि जंगलों से लकड़ी लाने  का यही आलम रहा तो पर्यावरण में सर्वोच स्थान पर रह रहे हिमाचल राज्य का जंगलों की सफाई से बेडा गर्क होने में देर नहीं लगेगी दूसरी और जहाँ लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पा रही वहां  मिड डे मील परबंधन ने खर्चा पूरा करने के लिए बच्चों की डाइट पर ही कटौती लगानी शुरू कर दी है. कई स्कूलों ने तो ज्यादा खर्च वाली दलें  इत्यादि पर भी क्त्तौती लगा दी है .

सबसे बड़ी मुश्किल तो ये आ रही है की गैस एजंसियां समय पर सिलेंडर नहीं भर कर परेशानिया और बढ़ा रही है. पूछने पर एजंसियों का कहना है कि जब गैस की गाड़ी जाती है तो स्कूल बंद होते हैं. इस सारी  परिस्थिति में जहाँ एक और स्कूल के  मिड डे मील प्रबंधन को परेशानियाँ आ रही हैं, वहीं बच्चे भी सरकार की इस सहूलत से वंचित होने लगे हैं शिक्षा विभाग को बड़ी हुए गैस कीमतों की अदायगी तो करनी ही होगी साथ में गैस एजंसियों पर भी शिकंजा कसने की आवश्यकता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.