/महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री की ‘छवि’ हो सकती है “धूमिल”

महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री की ‘छवि’ हो सकती है “धूमिल”

सभी सरकारी कार्यालयों, निकायों को “इ-ऑफिस” में तब्दील करने की योजना चल रही है “कछुए की चाल”, नहीं पूरे हो सकते हैं पहली जनवरी 2013 तक 

महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, बंगाल, हिमाचल, मध्य प्रदेश या कोई अन्य भारत के राज्य, सरकार और उसकी नीतियाँ हमेशा “कछुए की चाल” चलती है. इसमें सरकारी “बाबुओं”, “कर्मचारियों”, “अधिकारीयों” और “मंत्रियों” की “नियत” में अगर “खोट” हो तो “कछुए की चाल” भी बदल जाती है और वह चलने के वजाय “रेंगने” लगती है. कुछ ऐसा ही हो रहा है महाराष्ट्र  सरकार के मंत्रालय में जो अभी-अभी आग की भीषण चपेट में आई थी… 

 -मुंबई से मोनिका दात्रे||

महाराष्ट्र सरकार के सभी संस्थानों, कार्यालयों को “इ-ऑफिस” में बदलना एक टेढ़ी खीर बन गयी है. पिछले महीने मंत्रालय में भीषण आग लगने के पश्च्यात महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा था की सरकारी फायलों और दस्तावेजों की सुरक्षा-व्यवस्था के लिए सरकार के सभी मंत्रालय और उससे जुड़े कार्यालयों और निकायों को “इ-ऑफिस” में बदल दिया जायेगा. 

मुख्य मंत्री के घोषणा के अनुसार आगामी पहली जनवरी से महाराष्ट्र सरकार के सभी कार्यालयों को इ-ऑफिस में परिवर्तित हो जानी है. दुर्भाग्य यह है की अबतक 10 फीसदी कार्यालयों में भी यह कार्य प्रारंभ नहीं हुआ है.

पिछले माह जून में मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री के कार्यालयों में भीषण आगजनी के कारण 2 व्यक्तियों की जाने गयी थी और 15 से अधिक लोग घायल हुए थे. कहा जाता है कि तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री श्री अजित पवार के कार्यालय में आगजनी करायी गयी थी जिससे आदर्श हाउसिंग स्केम से सम्बंधित सभी दस्तावेज जल जाये और ऐसा हुआ भी. इस घटना में जिन दो व्यक्तियों की मौत भी हुयी वे पवार से मिलने आये थे और इस स्केम से भी जुड़े थे.

अजित पवार ने बाद में उप-मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा भी दिया था.

बहरहांल, आगजनी के बाद आदर्श हाउसिंग स्केम जैसा दस्तावेजों का विनाश न हो, इसलिए मुख्य मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने घोषणा की थी कि पंचायत स्तर से मंत्रालय स्तर तक सभी कार्यालयों को “इ-ऑफिस” में बदल दिया जायेगा ताकि समग्र रूप में सभी सरकारी फायलों, आदेशों, नियमों और सम्बंधित दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जा सके. मुख्यामंत्री का मानना था की इस प्रयास से न केवल कर्मचारियों की कार्य-क्षमता और दक्षता को बढाया जा सकता है बल्कि सरकारी क्रिया-कलापों की गुणवत्ता, संसाधन का प्रबंधन को समय-सीमा में बढाया जा सकता है.

मुख्य मंत्री ने यह भी कहा था कि इस प्रक्रिया से महाराष्ट्र की जनता को सरकार  और उसके क्रिया-कलाप में विश्वसनीयता में भी वृद्धि होगी.

पिछले 11 अक्तूबर को एक अध्यादेश भी जारी किया गया और इ-ऑफिस कमिटी बनाने की बात कही गयी. राज्य सरकार ने इस सम्बन्ध में अपने सभी मंत्रालयों, विभागों अधिकारीयों के साथ साथ नेशनल इन्फोर्मेशन सेंटर और डी आई टी को भी सूचित किया. अध्यादेश में यह बात भी कही गयी कि शीघ्र-से-शीघ्र सभी “डाटा” को इकठ्ठा किया जाये और नॅशनल इन्फोर्मेशन सेंटर के देख रेख में इस कार्य को निष्पादित किया जाये ताकि आगामी 1 जनवरी 2013 से यह अधिकारिक तौर पर चालू किया जा सके.

इस अधिसूचना के अनुसार सरकार के सभी विभागों में एक ‘नोडल अधिकारी’ की नियुक्ति होने के साथ – साथ वेब-कोर्डीनेटर की नियुक्ति होनी थी जो विभाग और नेशनल इन्फोर्मेशन सेंटर तथा इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी विभाग के बीच कड़ी का काम करेगा. लेकिन आज तक इस दिशा में कोई पहल नहीं की गयी. इस दृष्टि से 1 जनवरी को अधिकारिक तौर पर चालू करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन दिखता है.

मुख्य मंत्री कार्यालय के एक वरिष्ट अधिकारी का कहना है कि “वैसे मुख्यमंत्री स्वयं भी इस कार्य को देख रहे हैं और सभी सम्बंधित मंत्रालयों को आदेश भी दिया गया है, लेकिन औसतन कार्य की गति बहुत धीमी है.”

जबकि नेशनल इन्फोर्मेशन सेंटर के अधिकारी इसे “एक टेढ़ी खीर मानते हैं”. उनका कहना है की “नेशनल इन्फोर्मेशन सेंटर के पास न तो पर्याप्त संसदन है और न ही कुशल और पर्याप्त अधिकारी और इस कार्य को निष्पादित करने वाले कर्मी.” अधिकारी ने तो यहाँ तक कहा की “यह तो मात्र एक बयां था जो अधिसूचना का रूप ले लिया ताकि आदर्श हाउसिंग स्केम की तरफ से मीडिया का ध्यान बांटा जा सके. यह कार्य सरकारी कार्य की तरह ही है.”

बहरहाल, यदि समय सीमा में इस कार्य को निष्पादित नहीं किया गया तो मुख्य मत्री पृथ्वीराज चव्हाण की छवि पर आंच भी आ सकती है. लोगों का यह भी मानना है कि कही स्वयं मुख्य मंत्री ने ही “धीरे-चलो” की नीति तो नहीं अपना ली है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.