/मुख्यमंत्री जी उनका क्या होगा जो रसूखदार है…

मुख्यमंत्री जी उनका क्या होगा जो रसूखदार है…

-अनुराग मिश्र||
कल अखिलेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना महिला हेल्पलाइन का शुभारम्भ किया गया। भैय्या दूज के अवसर पर शुरू की गयी इस योजना को महिलाओ का खासा समर्थन मिला। पहले ही दिन 792 लड़कियों ने काल करके अपनी समस्याए दर्ज करायी। ज्यदातर समस्याए छेड़खानी और फेक काल्स की थी। सभी समस्यों को महिला कांस्टेबलो ने  गंभीरता से सुना और उनका उचित निवारण भी किया जो की काबिले तारीफ है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा शुरू की गयी यह योजना प्रशंसा की पात्र है,  खासकर इस योजना में  पकडे गए अपराधियों पर की जाने वाली दंडात्मक कार्यवाही के प्राविधान। पर यहाँ एक प्रश्न यह भी खड़ा है कि उनका क्या होगा जिनके लिए कानून मात्र एक खिलौना है और जो रसूखदार खानदान के चिराग है। इसके अतिरिक्त एक प्रश्न यह भी उठता है कि छेड़खानी और फेक्स काल्स या फिर बलात्कार जैसे अपराध ज्यदातर कौन लोग करते है,  वो जो आम आदमी के लड़के है या वो जो रसूखदार है। जब तक इस प्रश्नों  का उत्तर न ढूंढ़ लिया जाये तब तक महिला हेल्पलाइन जैसी किसी भी योजना की सफलता संदेह के घेरे में रहेगी।
साधारण तौर पर देखें तो हम पाएंगे की इस तरह के मामलो में सभी तरह के युवक शामिल है वो चाहे आम आदमी के लड़के हो या फिर रसूखदार घर के चिराग। पर अगर थोड़ी सी भी गंभीरता से इस विषय में सोचा जाये तो हम पाते हैं कि इस तरह की समस्या में ज्यादातर वे लोग शामिल है जिनके पास पावर का रसूख है और जो सत्ता के नशे में डूबे हैं। ऐसे लोग छेड़खानी और फेक काल्स क्या,  किसी भी युवती का बलात्कार कर देना भी अपना नैतिक हक़ समझते है क्योकि उनको पता है की अगर पीड़ित युवती पुलिस के पास जाएगी भी तो उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा,  सत्ता के गलियारों में बैठे उनके तकथित ठेकेदार उन्हें बचा लेंगे। अभी पिछले दिनों ही राजधानी में एक घटना देखने को मिली थी जहाँ पर सरे-राह एक युवती के साथ छेड़खानी की गयी। विरोध करने पर उसके कपडे तक फाड़ दिए गए। न्याय की उम्मीद से नजदीकी थाने में पहुची युवती के साथ ऐसा व्यव्हार किया गया जैसे वो शिकायतकर्ता न होकर स्वयं में एक अपराधी हो। इतना ही नहीं ज्यादातर मामलो में तो उच्च अधिकारीयों के निर्देश के बाद भी पुलिस कार्यवाही करने से कतराती है।

यहाँ पर यह बात गौर करने योग्य है कि इस तरह के ज्यादातर मामलों में पुलिस कार्यवाही करना चाहती है पर आरोपी की पहुच के आगे वो कमजोर पड़ती है और उसे हारना पड़ता है। इसी के चलते इस तरह मामलो में पुलिस कार्यवाही के बजाय मामले को नजर अंदाज करना ज्यादा बेहतर समझती है। ऐसे में महिला हेल्पलाइन योजना की कितनी सफल होगी यह बात इस योजना को चलने वालो पर निर्भर करेगी क्योकि हेल्पलाइन भी वही से संचालित होगी जहाँ से पूरे राज्य की कानून व्यवस्था संचालित होती हैं।

कल इस योजना के शुभारम  के अवसर पर अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने माना की पुलिस में कुछ गड़बड़ है पर उन्होंने यह सोचने या जानने का प्रयास नहीं किया कि आखिर इस समस्या की मूल जड़ क्या है ? इस समस्या की मूल जड़ है सत्ता में बैठे वो लोग जो सत्ता में आने के बाद खुद को कानून से उप्पर समझते है। जब भी पुलिस इमानदारी से इस तरह की घटनाओ को रोकने और कानून व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास करती है तो मात्र सामंती ठसक को बनाये रखने के लिए ये लोग कानून व्यवस्था को मजबूत करने वाले ईमानदार अधिकारीयों का सत्ता में पहुच के चलते स्थानांतरण करा देते है जिसके चलते इन रसूखदार घर के चिरागों की तो बात छोडिये इन चिरागों के साथ रहने वाले चमचे भी खुद को कानून व्यवस्था से उप्पर मान बैठते है। ऐसे लोग न सिर्फ कानून व्यवस्था के लिए गहरा संकट खड़ा करते है,  बल्कि सत्ता के सुचारू संचालन में बाधा उत्पन्न  करते है। इनके अनैतिक कृत्य के चलते ही सरकार की छवि धूमिल होती है। इसलिए यह आवश्यक है कि युवा मुख्यमंत्री राज्य की कानून व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पहले इन रसूखदारों को चिन्हित करें और इनके विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्यवाही का निर्देश पुलिस को दे। जब इन रसूखदारों के विरुद्ध कार्यवाही होगी तो पुलिस का भी मनोबल उठेगा।
हलाकि यह सही है कि कुछ अधिकारीयों में गड़बड़ी है पर ये गड़बड़ी इतनी नहीं है कि जिसे सुधार न जा सके पर इनको सुधरने से पहले मुख्य्म्नात्री को उनको सुधरना होगा जो इन अधिकारीयों की गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं अर्थात वे लोग जो खुद को सत्ता का केंद्र बिंदु मान बैठते है। जब तक ऐसे लोगो विरुद्ध कार्यवाही नहीं ही होगी तब तक महिला हेल्पलाइन योजना की पूर्णकालिक सफलता मात्र एक कोरा आश्वाशन ही साबित होगी।  इतना ही नहीं इसके परिणाम भी उन्ही योजनाओ जैसे हो जायेंगे जिनकी शुरवात तो जनहित के लिए की गयी थी पर उनके परिणाम दोषपूर्ण रहे।

लेखक तहलका न्यूज के उप संपादक हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.