/मात्र औपचारिकता न निभाएँ, शुभकामनाएं और बधाइयाँ दें तो मन से

मात्र औपचारिकता न निभाएँ, शुभकामनाएं और बधाइयाँ दें तो मन से

– डॉ. दीपक आचार्य||
आजकल बधाइयों और शुभकामनाओं का बाज़ार सर्वत्र फल-फूल रहा है। हर कोई बधाइयों और औपचारिकताओं की नदियों में बिना रुके बहता ही चला जा रहा है। बधाइयां और शुभकामनाएं जाने कितने पर्यायवाचियों और कितनी ही भाषाओं में घुल कर लच्छेदार स्वरूप में पेश की जाने लगी हैं।
कोई सा पर्व-त्योहार, उत्सव हो, दिन-सप्ताह या पखवाड़ा, माह हो, या फिर कोई सा कार्यक्रम या अवसर, अब मेल-मुलाकात की बातें हवा हो गई हैं, रह गया  है सिर्फ एसएमएस। इसमें  मन की भावनाओं और उत्साह के अतिरेक को सामने वाला ही समझ सकता है। वाणी की बजाय कैनवासी संदेशों का जमाना अब मुँह बोलने लगा है।
कोई सा अवसर हो, जान-पहचान हो या न हो, दिल में खुशी हो या गुस्सा, या फिर सामने वाले के प्रति कैसी भी भावनाएं हों, अब हमारी फितरत में आ गया है मोबाइल को तोप या मशीनगन की तरह चलाकर धड़ाधड़ एसएमएस उगलना।
यह एसएमएस का ही कमाल है कि मन चाहे जब संदेश भेज दो, फिर भूल जाओ। औपचारिकता का निर्वाह भी हो गया और सामने वाला भी खुश। लॉलीपाप की तरह एसएमएस भेजे जाने लगे हैं।
फिर अब तो किसी को भी शुभकामना या बधाई संदेश देने के लिए हाथ की अंगुलियों को भी कष्ट नहीं देना पड़े। जात-जात के लाखों संदेश नाम बदल-बदल कर एक से दूसरी जगह फॉरवर्ड होने  लगे हैं। न लिखने का झंझट और न सोचने का, बटन दबाया और पहुंचा तीर निशाने पे।
आजकल सर्वाधिक संदेश फॉरवर्डिया किस्मों से भरे पड़े हैं। फॉरवर्ड का नायाब ब्रह्मास्त्र हमने ऐसा पा लिया है कि व्यवहार मनोविज्ञान का पूरा ग्रंथ ही इसमें समाया हुआ है। करोड़ों लोग फॉरवर्डिंग फैक्ट्री के मैनेजर के रूप में रोजाना अपने कामों में भिड़े हुए हैं। तिस पर मोबाइल कंपनियों के शानदार और सस्ते एसएमएस पैकेजों ने तो दुनिया को निहाल ही कर दिया है।
रोजाना उठने से लगाकर सोने तक करते रहो एसएमएस, और निभाते रहे औपचारिकताओं को। यों भी आदमी के रिश्तों में अब भावनात्मक गंध तो कहीं खो ही चली है, ऐसे में एसएमएस से संदेशों का आवागमन  ही रिश्ते निभाने का सहज और सर्वसुलभ माध्यम रह गया है।
मंगलमय संदेशों के आदान-प्रदान और फॉरवर्डिंग जोब में इतना उछाल आ चुका है कि लोगों की जिन्दगी से बोरियत का नामोनिशान मिट गया है। हर आदमी हमेशा बिजी रहने लगा है। और कुछ नहीं तो हाय-हैलो या एसएमएस पढ़ने और भेजने में।
बात चाहे फोन या एसएमएस से बधाइयों और शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति की हो चाहे प्रत्यक्ष तौर पर मिलकर। इन सभी में अब मिलावट आ रही है। बहुत कम लोग ऐसे हुआ करते हैं जिनके दिल से यह सब कुछ निकलता है। वरना अधिकांश लोग तो इस मामले में मात्र औपचारिकता के व्यवहार का निर्वाह ही कर रहे हैं।
हमारा चरित्र और व्यवहार सब कुछ दोहरा-तिहरा और रहस्यमय होता जा रहा है। मन में कितना ही राग-द्वेष भरा हो, प्रतिशोध का हलाहल विष उछाले मार रहा हो, एक-दूसरे को नीचे गिराने की मनोवृत्ति सारी हदें पार करती जा रही हो, कटुता, विद्वेष और मार-काट, टांग खिंचाई की प्रवृत्ति का घिनौना षड़यंत्र पाँव पसार रहा हो या फिर वो सारे स्टंट आजमाए जा रहे हों जो आदमी को शोभा नहीं देते, मगर जहाँ कोई मौका आएगा, एक-दूसरे को  बधाई और शुभकामनाएं ऐसे व्यक्त करेंगे जैसे कि उनके मुकाबले कोई हितैषी या शुभचिंतक-प्रशंसक दुनिया में न कभी हुआ है, न होगा।  फिर अब तो यह सिलसिला एसएमएस से शुरू हो गया है जिसमें सामने वाला न भी चाहे तो संदेश झेलने की विवशता तो है ही।
बहुत कम लोग ऐसे हुआ करते हैं जो इंसानियत के वजूद में विश्वास रखते हैं और ये ही लोग होते हैं जो दिल से शुभकामनाएं और बधाइयां देते हैं और असल में देखा जाए तो इन्हीं की दुआओं का फर्क पड़ता है। वरना डुप्लीकेट चरित्र वाले लोगों की शुभकामनाओं का कहीं कोई फर्क नहीं पड़ता। ये केवल वाग् विलास या मोबाइल विलास से कहीं कुछ ज्यादा नहीं हुआ करता।
कई बार हम जानते हैं कि सामने वाला कितना भ्रष्ट, बेईमान, हरामखोर, रिश्वतखोर, व्यभिचारी, नाकारा, नुगरा और विघ्नसंतोषी है लेकिन हम मजबूरी में मन ही मन में गालियां बकते हुए भी उसके लिए अच्छा सा शुभकामना संदेश टाईप कर भेज देते हैं। अथवा मुलाकात हो जाने पर उसकी प्रशस्ति में इतना कुछ कह जाते हैं जितना वह सामने वाला होता भी नहीं।
इन मजबूरियों से विवश होकर शुभकामना संदेश या बधाई देने का कहीं कोई अर्थ नहीं रह जाता है। इससे तो अच्छा है कि हम ऐसे लोगों से दूरी ही रखंे और संदेशों की ताकत को समझें।
जब हम संदेशों के सामर्थ्य को भूल जाते हैं तभी इस प्रकार का व्यवहार करते हैं। या फिर हम संदेशों का दुरुपयोग करना शुरू कर देते हैं और झूठ-मूठ के चापलुसी से तरबतर संदेश भेज देते हैं तब भी संदेश अपनी क्षमता और अर्थवत्ता को खो देते हैं और ऐसे में यह सब कुछ निरस तथा निरर्थक शब्दालाप के सिवा कुछ नहीं होता।
जिन्हें हम पसंद नहीं करते हैं उन्हें बिना कारण शुभकामनाएं और बधाइयां न दें क्योंकि हमारे हर शब्द में ताकत होती है और यह ताकत अच्छे और सिर्फ अच्छे लोगों के लिए ही है, बुरे और नाकाराओं के लिए कभी नहीं। इसलिए संदेश संवहन में ईमानदारी लाएं अन्यथा हमारे संदेशों, शब्दों, वाक्यों और हमारी वाणी का कोई  अर्थ नहीं रहेगा और हम भी मिथ्याभाषी लोगों की लम्बी कतार में ऊँघते हुए शामिल हो जाएंगे।
शब्दों का मूल्य तभी है जब वे सही हों, झूठी तारीफ और शुभकामनाओं वाले शब्दों में प्राण तत्व नहीं होता बल्कि इनमें शब्दों के शव की गंध आती है जिसका सूतक जिन्दगी भर हमारा पीछा नहीं छोड़ता।
समाज को ठिकाने पर लाने के लिए जरूरी है कि जिन्हें भी संदेश दें सटीक और स्पष्ट हो। जो अच्छे हैं उन्हें प्रोत्साहन और सम्मान से भरे संदेश दें और जो बुरे हैं उनसे या तो दूरी बनाए रखें या समय-समय पर आईना दिखाते रहें।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.