/भारी पड़ गया दलित को रथ पर सवार हो शादी करने जाना…

भारी पड़ गया दलित को रथ पर सवार हो शादी करने जाना…

नाथ समुदाय के पवननाथ को क्या पता था कि रथ पर सवार हो दुल्हन ब्याहने जाना उसे मुश्किल में डाल देगा.  अब पवननाथ का रथ रास्ते में रोक लिया गया है और दुल्हन शादी के जोड़े में बरात का इंतज़ार कर रही है…

-भंवर मेघवंशी||

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के करेड़ा, थाना क्षेत्र के गांव बरावलों का खेड़ा में घुमन्तु कालबेलिया जाति के युवक पवननाथ की बरात को कथित पिछड़ों ने महज इसलिये रोक रखा है, क्योंकि यह दलित युवक रथ पर सवार होकर शादी करने जा रहा है, जो कि गांव के गुर्जर समुदाय के देव सैनिकों को बर्दाश्त नहीं है.

दलित दूल्हे का रथ रूका हुआ है, एक थाने की पुलिस मौके पर पहुंच गई है, पड़ौसी थाने का जाप्ता रास्ते में है, घटना की जानकारी कार्यवाहक कलक्टर के.सी. मीणा और पुलिस अधीक्षक नितिनदीप ब्लग्गन को दे दी गई है, क्षेत्रीय विधायक रामलाल जाट, प्रधान गोपी सारस्वत तथा तहसीलदार देवीसिंह रावत इत्यादि सक्रिय होकर मामले का समाधान निकालने की कोशिश कर रहे है.

दलित आदिवासी एवं घुमन्तु अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के पदाधिकारी भी मौके पर पहुंच गए है और दलित अपने स्वाभिमान की खातिर बिन्दौली निकालने के लिए डटे हुए है. वहीं कथित पिछड़े जिन्हें राजस्थान सरकार ने विशेष पिछड़े वर्ग में डाल रखा है, वे सामना करने को तत्पर है अपनी झूठी शान को बचाने के लिये. आखिर इन पिछड़ो या यों कहिये वर्णवादी हिन्दू धर्म के शूद्रों को कब अकल आयेगी और ये न्याय, समानता और मानवता के मूल्यों को समझेंगे तथा दलितों के अधिकारों पर कुठाराघात बंद करेंगे.गुर्जरों के इस प्रकार के आततायी व्यवहार पर कर्नल किरोड़ी बैंसला और सचिन पायलेट चुप क्यों रहते है, वे एक भी बार इस इलाके में गुर्जर समुदाय द्वारा दलितों पर किये जा रहे अत्याचारों पर मुंह क्यों नहीं खोलते है ?
बात सिर्फ एक दलित दूल्हे की बिन्दौली या बारात को रोके जाने की नहीं है, इसी क्षेत्र का दलित पुजारी जयराम बलाई पिछले 6 महीनों से न्याय के लिए दो-दो एफआईआर दर्ज करवा कर भी दर-दर की ठोकरें खाता फिर रहा है, उससे भी गुर्जर समुदाय के कतिपय तत्वों ने 13 बीघा जमीन छीन ली है, एक अन्य दलित पुजारी हजारी भोपा वर्ष 2006 से सूलिया गांव में दलितों द्वारा एक हजार वर्ष पूर्व निर्मित चामुण्ड़ा माता मंदिर में प्रवेश, पूजा के अधिकार को लेकर संघर्षरत है, ताजा जानकारी के मुताबिक इलाके के गुर्जर समुदाय व अन्य सवर्ण हिन्दुओं ने दलितों द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर को ढहाकर दूसरा मंदिर बनाने का ऐलान किया है, एक प्राचीन मंदिर के तोड़े जाने के समाचार सुनकर भी तमाम धार्मिक व दक्षिणपंथी संगठन चुप है तो आखिर क्यों ? क्या सिर्फ इसलिए कि दलितों के खिलाफ सब एक है? क्या शर्मनाक घृणित मानसिकता है कथित सवर्णों की ?

हद तो यह है कि इसी भीलवाड़ा जिले के रायपुर थाना क्षेत्र के दूल्हेपुरा गांव में सवर्णों के मोहल्ले में दीवाली मनाने गए दलितों ने एक पटाखा क्या छोड़ दिया, गांव के दबंग जाट नाराज हो गए, दलितों को एक पटाखे की सजा दी गई, दलित युवती शांता सालवी को सरेआम ‘‘नीच औरत’’ कहते हुए अश्लील गालियां दी गई, उसके वृद्ध पिता की गर्दन तोड़ने की कोशिश  की गई और जवान भाई को मार-मार कर अधमरा कर दिया गया. आज हालात यह है कि 14 नवम्बर की घटना की अब तक प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की गई, सिफ रिपोर्ट ले ली गई, दूसरी तरफ दबंगों ने भी दलितों के विरूद्ध जवाबी रिपोर्ट दे दी है और अब स्थिति यह है कि दलित अपनी जान पुलिस और कथित पिछड़े मगर अत्यंत दंबग जाटों से बचाने के लिए भागते फिर रहे है. ..

ये तो महज बानगी है वर्ना तो इस देश का हर दलित हर दिन भेदभाव, शोषण तथा अन्याय उत्पीड़न का शिकार होता ही है. यह कैसा देश है और कैसा धर्म जहां 30 फीसदी जनता के साथ आज भी जानवरों जैसा बर्ताव किया जा रहा है, पशुओं के इस देश में पवननाथ नामक दलित दूल्हे का रथ आगे बढ़ेगा या रूकेगा, यह तो वक्त ही बताएगा मगर हमारी लड़ाई जारी है और तब तक यह जंग चलेगी जब तक अन्याय, उत्पीड़न, शोषण और भेदभाव बरकरार है, हम उस निराली सुबह की प्रतीक्षा में है, जब सब की बराबरी का सूरज निकलेगा, हमें उम्मीद है, जी हां वह सूरज जरूर निकलेगा, फिलहाल तो दलित पवन नाथ की बारात का रथ अडि़यल गुर्जरों के गांव से निकल जाये तो बेहतर है.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.