/बिना पढ़ी संग्रहित पुस्तकें देती हैं, स्मृतिभ्रम और तनावों का श्राप

बिना पढ़ी संग्रहित पुस्तकें देती हैं, स्मृतिभ्रम और तनावों का श्राप

– डॉ. दीपक आचार्य||

यों तो टीवी और इंटरनेट के मौजूदा युग में पुस्तकों के लिए कद्रदानों की संख्या कम होती जा रही है और इसी अनुपात में लोगों के भीतर स्वाध्याय या कुछ न कुछ पढ़ते रहने की रुचि भी समाप्त होती जा रही है. फिर भी स्वाध्याय का अपना वजूद सदियों से रहा है और सदियों तक रहेगा.

पुस्तकों या छपी हुई सामग्री का मूल्य दुनिया में कभी कम न होगा. यह दिगर बात है कि पुस्तकों के प्रति आज जो भाव देखने को मिल रहा है उतना पुराने जमाने में कभी देखा नहीं गया.

लेकिन यह कुछ समय की बात हो सकती है. पुस्तकों के वजूद और मन-मस्तिष्क से लेकर देश-दुनिया और परिवेश की जहां तक बात है, यह समय के साथ अपने आप ठीक होगा लेकिन वर्तमान में जहां जो पुस्तकें हैं उनकी स्थिति की चर्चा करना ज्यादा प्रासंगिक होगा.

पुस्तकों के संबंध में लोगों की कई प्रजातियां हैं. एक उस किस्म के लोग हैं जिन्हें न ज्ञान से मतलब है न औरों से, उन्हें अपने स्वार्थों से ही फुर्सत नहीं है और ऐसे लोगों का पुस्तकों या छपी हुई किसी भी सामग्री से कोई मतलब नहीं होता इसलिए उनके लिए पुस्तकें उसी तरह हैं जैसे घर के भीतर या बाहर पड़ा हुआ अनुपयोगी सामग्री या मिट्टी का ढेर. ये लोग जहाँ भी होंगे वहां पुस्तकों को शत्रु मानकर चलते रहेंगे.

दूसरी किस्म उन लोगों की है जो पुस्तकों को पढ़ने की बजाय अपने घर या प्रतिष्ठान में कहीं न कहीं संग्रहित करने का शौक पाले हुए हैं. ऐसे लोग जहाँ कहीं से मिल जाएं वहां से पुस्तकें एकत्रित कर अपने घर के शो केस में सजा लेते हैं.

इन लोगों को कोई पुस्तक पढ़ने की बजाय जमा करने में ज्यादा आनंद आता है. ऐसे अधिकांश लोग पुस्तकें खरीदने की बजाय चुराकर या किसी की नज़र चुराकर इन्हें अपने कब्जे में ले लेने के आदी होते हैं.

जो लोग पुस्तकें पढ़ने की बजाय सिर्फ जमा कर लेने के आदी होते हैं उन्हें भले ही पुस्तकों के मामले में सेठ कहा जाए लेकिन हकीकत ये है कि जो पुस्तकें अपने घर में अनपढ़ी रह जाया करती हैं वे पुस्तकें कुलबुलाती रहती हैं और उनके भीतर का सूक्ष्म प्राणतत्व जीवंत नहीं रह पाता है.

ये पुस्तकें जीवंतता की बजाय जड़ता देती हैं और जहां घर में जड़ता स्थान पा जाती है वहाँ रहने वाले लोगों में तनाव और स्मृतिभ्रम पैदा हो जाता है जो कालान्तर में विस्तार और विकास पाते हुए उन लोगों के लिए संकट की स्थिति पैदा कर सकता है जो पुस्तकों को पढ़ने की बजाय संग्रहित करने का शौक पाले हुए हैं.

जो लोग पुस्तकें जमा करने के आदी हैं उनकी पूरी जिन्दगी पर नज़र डालें तो साफ पता चलेगा कि इन लोगों की जिन्दगी का उत्तरार्द्ध खराब बीतने लगता है और इन लोगों में विभिन्न प्रकार के तनावों के साथ ही मेमोरी लोस की स्थिति बनी रहती है.

इन स्थितियों को देखते हुए अपनी आदत बदलने की कोशिश की जानी चाहिए ताकि हमारी जिन्दगी के उत्तरार्द्ध में इस प्रकार की स्थितियां सामने नहीं आ पाएं.

जिन लोगों को जिन्दगी सँवारनी हो उन्हें चाहिए कि वे स्वाध्याय को अपनाएं और रोजाना कुछ न कुछ पढ़ते रहने की आदत डालें. अपने घर में पुस्तकों को कबाड़ की तरह न रखें और उनका उपयोग करें. उपयोग न कर पाएं तो इसे पुस्तकालयों को भिजवा दें अथवा उन लोगों को देते रहें जिनके काम आती रहें.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.