/महान क्रांतिकारी शहीद तात्या टोपे की “धरोहर” विश्व बाज़ार में होगी नीलाम

महान क्रांतिकारी शहीद तात्या टोपे की “धरोहर” विश्व बाज़ार में होगी नीलाम

स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के नाम का “राजनीतिकरण” के खिलाफ मुहिम:  भारत के स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के वंशजों को ‘सुरक्षित सामाजिक और आर्थिक जीवन’ देने के लिए महान क्रांतिकारी शहीद तात्या टोपे की “धरोहर” को विश्व बाज़ार में नीलाम किया जायेगा 

 -शिवा जैन||

शहीद रामचंद्र पांडुरंग टोपे @ तात्या टोपे

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी, बाजी राव पेशवा के सेनापति और महारानी लक्ष्मीबाई के अभिन्न मित्र शहीद रामचंद्र पांडुरंग टोपे @ तात्या टोपे की “सुरक्षित धरोहर” को विश्व-बाज़ार में नीलामी कर बेचा जायेगा.

नीलामी से मिलने वाली राशि का उपयोग भारत के कोने-कोने में समाज और सरकार से उपेक्षित और गुमनामी जीवन जी रहे 1857-1947 के शहीदों के वंशजों को एक ‘सुरक्षित सामाजिक और आर्थिक जीवन’ देने के अतिरिक्त उनकी ‘बेटियों को उचित शिक्षा और विवाह पर” खर्च किया जायेगा.

भारत के उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के बिठुर तहसील में महारानी लक्ष्मी बाई, बाजीराव पेशवा और तात्या टोपे ने प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन का सूत्रपात किया था. भारत के स्वतंत्रता मिलने के 66 साल बाद भी आज बिठुर रेल-यातायात से कटा है. वैसे पिछले सरकारों ने अनेकों बार इसे रेल-मार्ग से जोड़ने का “झूठा वादा” किया. भारत का एक विशिष्ट औद्योगिक क्षेत्र होने के बाद भी इस इलाके में शिक्षा और रोजगार के कोई साधन “नहीं के बराबर” हैं.

तात्या टोपे का संदूक

अमर शहीद तात्या टोपे के पैंसठ वर्षीय प्रपौत्र विनायकराव टोपे ने कहा की स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए, अंग्रेजी हुकूमत के गोलियों का शिकार हुए क्रांतिकारियों के वंशजों को एक सम्मानित जीवन दिया जा सके. तात्या टोपे के लिए यह सबसे बड़ी श्रधांजलि होगी.”

विनायक राव कहते हैं की शिवनाथ और नीना “आन्दोलन एक पुस्तक से” नामक आन्दोलन पिछले सात वर्षों से चला रहे हैं और पुस्तक के माध्यम से प्रत्येक वर्ष स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों और शहीदों के वंशजों को एक प्रतिष्ठित सामाजिक और आर्थिक जीवन देने में लगे हैं. ये दंपत्ति ही हमें और हमारे परिवार को 2007 में गुमनामी जिन्दगी से निकल कर एक नयी जिन्दगी दिया था. तत्कालीन भारत के रेल मंत्री लालू प्रसाद ने भारतीय रेल में इनकी दो बेटियों – प्रगति टोपे और तृप्ति टोपे – को नौकरी दी थी साथ ही, आन्दोलन के तहत, पांच लाख रुपये का भी इजाफा हुआ था.

तात्या टोपे का संदूक

विनायक राव के अनुसार स्वतंत्रता के पश्च्यात कानपूर शासन ने तात्या टोपे की समस्त वस्तुओं को  अधिगृहित कर लिया था, जो आज कहाँ है किसी को भी  पता नहीं. 2007 में जब वे तत्कालीन जिलाधीश से मिलने गए थे तो उन्हें धक्के मर कर बहार निकल दिया गया था. तात्या टोपे के वंशज आज मध्य प्रदेश में भी हैं जो बदतर आर्थिक स्थिति से जूझ रहे हैं.

विनायक राव के अनुसार आज भी उनके पास तात्या टोपे की “गुप्ती”, जिससे न जाने कितने अंग्रेजों को मौत के घाट सुलाया गया होगा, विशेष कर कानपूर के ‘सत्ती चौरा घाट पर” उनके पास सुरक्षित है. इसके अलावे, पीतल का एक घड़ा जो तात्या टोपे की माँ का है और सागवान से बना दो लकड़ी का संदूक जो आज भी जस-के-तस है. इन वस्तुओं के अतिरिक्त कुछ पुराने कागजात और पुस्तकें हैं जिसे विश्व  बाज़ार में बेच कर स्वतंत्रता संग्राम (1857-1947) के दौरान शहीद हुए क्रांतिकारियों के आज के जीवित वंशजों को, जो भारत के विभिन्न राज्यों में गुमनामी जीवन जी रहे हैं, एक सुरक्षित सामाजिक और आर्थिक जीवन पर खर्च करेंगे.

 

तात्या टोपे की माँ का पीतल का घड़ा

पौराणिक कथन के अनुसार कानपूर शर में गंगा के तट पर बसा बिठुर वही स्थान है जहाँ व्यास मुनि ने “वेद” की रचना की थी. भगवन रामचंद्र-सीता के दोनों पुत्रों – लव-कुश का जन्म इसी स्थान पर हुआ था. मराठा युद्ध के बाद बाजीराव पेशवा नाना साहेब के साथ इसी बिठूर में स्थान लिया था जहाँ नाना साहेब, महारानी लक्ष्मी बाई और तात्या टोपे की आगुआयी में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा था.

 

दुर्भाग्य यह है की भारत के आजादी के 66 साल बाद भी यह इलाका भारत के अन्य इलाकों की तरह उपेक्षित है.

 

तात्या टोपे की “गुप्ती”

विनायक राव टोपे के पिता स्वर्गीय नारायण राव टोपे को सन 1857 के युद्द के सौ साल पुरे होने पर तत्कालीन उत्तर प्रदेश शाशन की ओर  से सम्मानित किया गया था. नारायण राव टोपे, शहीद रामचंद्र पांडुरंग टोपे के भतीजे थे. उस समय उत्तर प्रदेश शाशन के सचिव स्वर्गीय आदित्य नाथ झा ने एक चाँदी  की थल के अतिरिक्त 1001 रूपये भी प्रदान किये थे. ज्ञातव्य हो की पचास साल बाद, बिहार के उसी स्थान के एक वंशज शिवनाथ झा और नीना झा ने 2007 में विनायक राव टोपे का जीवन सवांरा  था. अपने घर लाकर इनके दोनों पुत्री – प्रगति और तृप्ति टोपे – को नौकरी के अतिरिक्त पांच लाख रूपये का भी इजाफा कराया था.

नीना झा कहती हैं: कुछ दिन पूर्व भारत के एक राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन दिल्ली में संपन्न हुआ था. दिल्ली के सड़कों पर बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर लटके थे और उसी में लटका था स्वतंत्रता संग्राम के कुछ शहीदों के तस्वीर. शहीद रामचंद्र पांडुरंग टोपे @ तात्या टोपे की भी तस्वीर उनमे से एक था. नीना ने उस राजनैतिक पार्टी के अध्यक्ष सहित पांच वरिष्ट राजनेताओं से तात्या टोपे के वंशजों के बारे में पूछा की वे अभी जीवित हैं या नहीं? किसी ने भी सकारात्मक उत्तर नहीं दिए. लेकिन सबों के विचार में एक चीज सामान्य था “कौन किसको याद रखता है? यह राजनीती है और हमें भारत के हिन्दू समाज को जोड़ना है इसलिए तात्या टोपे ही नहीं अन्य सभी हिन्दू शहीदों की तस्वीर लगी है. हमें मालूम नहीं वे कहाँ है? हैं भी या नहीं? जीवित हैं या मर गए. ” उस दिन तात्या टोपे के प्रपौत्र विनायक राव टोपे, उनकी पत्नी सरस्वती टोपे, बीटा आशुतोष और दोनों बेटियां प्रगति टोपे और तृप्ति टोपे हमारे घर में थे जिनके जीवन के लिए हम कार्य कर रहे थे.” उस दिन 29 जून 2007 था और दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय  अधिवेशन हो रहा था. (क्रमशः)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.