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क्या ठाकरे के विरुद्ध लिखना अभिव्यक्ति की आज़ादी का उल्लंघन है..?

By   /  November 20, 2012  /  4 Comments

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-अनुराग मिश्र||

मुबई की एक युवती को फेसबुक पर टिप्पणी करना इतना महंगा पड़ा कि टिप्पणी के चलते उसकी गिरफ़्तारी हो गई। युवती ने बाला साहेब ठाकरे की मृत्यु के पश्चात फेसबुक पर एक टिप्पणी की थी। अपनी टिप्पणी में उसने लिखा था कि ठाकरे जैसे लोग रोज पैदा होते और मरते हैं। इसके लिए बंद करने की कोई जरूरत नहीं है, नतीजा ये हुआ की मुंबई पुलिस ने तत्काल प्रभाव से उस युवती को आईपीसी की विभिन्न धाराओ के तहत गिरफ्तार कर लिया जिनमे धार्मिक उन्माद  की धारा 295 (ए) भी शामिल है। इतना ही नहीं मुंबई पुलिस ने इस युवती की टिप्पणी को पसंद करने वाली एक और युवती से भी पूछ ताछ की। अपनी कार्यवाही के बाबत मुंबई पुलिस का कहना है की ऐसा कृत्य से शहर में उन्माद फ़ैल सकता है इसे मात्र अभिवयक्ति मान कर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। हलाकि मुंबई पुलिस के इस बयान में कोई दम नहीं दिखता जिसके दो कारण है।

प्रथम ये कि ठाकरे कभी भी जन स्वीकार्य नेता नहीं रहे उनका जो भी जनाधार रहा वो सिर्फ मराठियों में रहा। दूसरा ये कि सोशल साईटो की प्रभाविकता अभी भी भारत में उतनी नहीं कि इन पर लिखी टिप्पणियाँ सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का कारक बन सके  इसलिए मुंबई पुलिस का ये कहना कि “युवती की टिप्पणी से धार्मिक उन्माद फ़ैल सकता था” थोडा समझ से परये है। हाँ ये बात जरुर समझ में आती है कि इस कार्यवाही के जरिये मुंबई पुलिस ने अपनी कमजोरियों को छुपाने की कोशिश की है। मुंबई पुलिस के मन में अब भी ये डर बैठा है कि यदि बाला साहेब के सम्बन्ध में कुछ भी लिखा या कहा गया को स्तिथि बेकाबू हो जाएगी जिससे निपट पाना आसान नहीं होगा। और यही कारण है की जब भी किसी भी व्यक्ति ने शिवसेना या बाल ठाकरे के खिलाफ बोलना चाहा मुबई पुलिस ने उसकी आवाज़ को दबा दिया। सीधे शब्दों में कहा जाये तो ठाकरे की मृत्यु के बाद भी ठाकरे का खौफ मुंबई पुलिस के दिलो दिमाग में छाया हुआ है जिसके चलते वो ठाकरे से जुडी किसी भी अभिव्यक्ति को स्वीकार करने में असर्मथ हो चुकी है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि मुंबई पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही क्या संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजदी का हनन नहीं है ?
हालाँकि यहाँ भी विरोधाभास की स्थिति है। विरोधाभाष इस बात का है कि व्यक्ति द्वारा कही जा रही किस बात को अभिव्यक्ति माना जाये और किसे साजिश का हिस्सा। हमारे संविधान ने अभिवयक्ति की आजादी का अधिकार दिया है और इसके संदर्भ में कुछ बातें भी स्पष्ट की है। हमारा संविधान कहता है कि ये अधिकार उस जगहों पर प्रतिबंधित हो जायेंगे जहाँ धार्मिक उन्माद, व्यक्ति की निजता या फिर राष्ट्रीय अखंडता पर खतरा हो। पर संविधान में इस बात को स्पष्ट नहीं किया गया है कि कौन सी बातें अभिव्यक्ति की श्रेणी में जाएगी और कौन सी नहीं। खासकर जहाँ पर बात व्यक्ति की निजता के सम्बन्ध में  कही गयी हों । ऐसे में किन बातों को निजता का उल्लंघन माना जाये यह स्पष्ट नहीं है। क्योकि सामन्यतः हर आदमी एक दूसरे के विरोध में कुछ न कुछ कहता और अपनी राय रखता है ऐसे में हर बात को तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि अभिव्यक्ति के संदर्भ में संविधान में दिए गए निर्देशों की पुनः समीक्षा की जाये और नए तरीके से अभिव्यक्ति की परिभाषा को परिभाषित किया जाये क्योकि जब संविधान की रचना हुई थी तब देश में अभिव्यक्ति को व्यक्त करने के माध्यम बहुत कम थे जिसके चलते आम आदमी की अभिवयक्ति भी बहुत कम थी। लेकिन मौजूदा दौर में परिस्थतियाँ काफी ज्यादा बदल चुकी है। अब अभिव्यक्ति के माध्यम भी हजार है और अभिव्यक्ति को व्यक्त करने वाले भी हजार हैं।  इसलिए अब ये समय की मांग है की अभिव्यक्ति  की परिभाषा को पुनः परिभाषित किया जाये।
जहाँ तक बात मुंबई पुलिस की कार्यवाही की है तो मुंबई पुलिस की कार्यवाही को खुद कोर्ट ने अस्वीकार करते हुए ये माना है की युवती द्वरा लिखी गयी

उक्त  टिप्पणी अभिव्यक्ति का उल्लंघन नहीं है और न ही इस टिप्पणी से कोई धार्मिक उन्माद फैलने की स्थिति बनती है। कोर्ट ने इसी आधार पर युवती को जमानत भी दे दी। रहा सवाल ठाकरे का तो जब सरकारे नियमो के विपरीत जाकर उस व्यक्ति को जिसने लोकतान्त्रिक मूल्यों को कभी माना ही नहीं, जिसने हिटलरशाही को अपना आदर्श माना हों, राष्ट्रीय सम्मान दे सकती है तो आम आदमी उनके विरुद्ध क्यों नहीं लिख सकता हैं।

(अनुराग मिश्र  तहलका न्यूज  में बतौर उप-संपादक  कार्यरत हैं)

 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. pualias soacha biachar kar kam nhiya krtia hiya.

  2. Arjun Bhardwaj says:

    hyderabad me shoshal media dwara hi dharmik unmaad faila tha jab ye dalil kahan thi

  3. मेरे विचार से मुम्बई के जिन लडकियों के संदर्भ में यह चर्चा है.. उस सम्बन्ध में गिरफ्तारी को मै उचित नही मानता…. पर मै यह भी उचित नहीं मानता कि किसी के घर में मातम का माहौल हो और वही कहा जाए कि "…ऐसे लोग रोज मरते है…", इससे विपरीत प्रतिक्रिया हो सकती है… और मुम्बई में हुआ भी.. तोड़ फोड भी हुई / शान्ति भंग हो गयी.. पुलिस को प्रतिबंधात्मक कार्यवाही करनी ही चाहिए / पुलिस ने जिन धाराओं का प्रयोग किया उस पर बहस हो सकती है… जो कानूनी बहस है / कोर्ट ने तुरंत जमानत भी दे दी / अब उस बात को लेकर चर्चा जरूर होना चाहिए पर इसे राजनीतिक रंग रूप देकर चर्चा करना बुद्धिमानी नहीं मानता / यदि चर्चा ही करना उद्देश्य है तो महाराष्ट्र सरकार से इस्तीफा क्यों नहीं माँगा जाता? ठीक इसके विपरीत हैदराबाद में सांसद ने पूरे देश में हिन्दूओ के खिलाफ आतंक फैलाने की धमकी दी , उस पर किसी ने कोई टिप्पणी नहीं की. क्यों? इससे ऐसा लगता है कि मामला किसी खास को बदनाम करने के लिए ,या किसी राजनैतिक दल को बदनाम करने के लिए जानबूझकर किसी खास के द्वारा संचालित है /.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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