/अजमल कसाब को फांसी पर लटकाया..

अजमल कसाब को फांसी पर लटकाया..

मुंबई 26/11 हमले के गुनहगार आमिर अजमल कसाब को फांसी दे दी गई है. सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार कसाब को 7:36 बजे फांसी दे दी गई है. डाक्टरों ने कसाब को मृत घोषित भी कर दिया है.

इससे पूर्व, बुधवार सुबह कसाब को मुंबई की ऑर्थर रोड जेल से पुणे की यरवदा जेल में गुपचुप तरीके से शिफ्ट कर दिया गया था. सात नवंबर को ही तय हो गई थी यह तारीख. लेकिन सरकार ने कसाब को फांसी देने के मामले में पूरी गोपनीयता बरती.

पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अजमल आमिर कसाब मुंबई में 2008 के सबसे बड़े आतंकवादी हमले में शामिल था. कसाब एक मात्र आतंकवादी था जो जिंदा पकड़ा गया था. 2008 में कसाब अपने 10 साथियों के साथ समुद्री रास्ते से मुंबई आया था. कसाब और उसकी आतंकी टीम ने शिवाजी रेलवे स्टेशन और ताज होटेल समेत शहर के कई इलाकों को निशाना बनाया.

शुरू में पाकिस्तान इनकार करता रहा कि कसाब पाकिस्तानी है. 2009 में पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि कसाब उसका नागरिक है.

कसाब के खिलाफ हत्या, भारत पर युद्ध थोपने, हत्या की साजिश,सरकार को अस्थिर करना,अपहरण, डकैती, तस्करी, अवैध हथियार और विस्फोटक अपने पास रखने के मामले तय किए गए. 6 मई 2010 को ट्रायल कोर्ट ने कसाब को फांसी सजा सुनाई. 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले में 166 लोग मारे गए थे. इसमें 9 आतंकवादी भी शामिल थे. अजमल आमिर कसाब 2008 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार हमलों के जिंदा बचा एकमात्र हमलावर था.

मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए हमलों के दौरान अरेस्ट हुए कसाब को पहले बॉम्बे हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा कायम रखी. कसाब को 29 नवंबर 2011 को जस्टिस आफताब आलम और सीके प्रसाद की बेंच ने फांसी की सज़ा सुनाई थी. जस्टिस आफताब आलम और सीके प्रसाद की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा था, ‘कसाब के बारे में फैसला करने में कोई दुर्भावना नहीं है. इस शख्स ने भारत के खिलाफ लड़ाई छेड़ी है. भारत की संप्रभुता को चुनौती दी है और युद्ध का ऐलान किया है. इसलिए ऐसे शख्स को मृत्युदंड की सजा बरकरार रखने में कोई समस्या नहीं है.’मुंबई की विशेष अदालत में अजमल कसाब ने खुद ही गुनाह कबूल लिया था.

कसाब की सुरक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च हुए. कसाब जब-तक जिंदा रहा तब-तक हाई-प्रोफाइल कैदी बनी रहा. उसकी सुरक्षा को लेकर सुरक्षा एजेंसियां बेहद संवेदनशील थीं. अब-तक उसकी सुरक्षा पर 40 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं. सरकार को इस बात के लिए भी बेहद आलोचना झेलनी पड़ी.

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पास कसाब ने दया याचिका दाखिल की. इसके बाद गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति से सिफारिश की कि कसाब की दया याचिका खारिज कर दी जाए. उन्होंने तत्काल कसाब की दया याचिका खारिज कर दी. इसके बाद सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा था.

यूपीए सरकार पर आतंकियों के साथ उदारता से पेश आने के आरोप लग रहे थे. मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी कसाब को फौरन फांसी देने की मांग करती रही. देश की राजनीति में चौतरफा घिरी कांग्रेस इस दाग को धोना चाहती थी और उसने अपने हिसाब से सही वक्त पर फैसला लिया.

26 नवंबर 2011 के आतंकी हमले में सुरक्षा बलों को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी. आतंकवादियों से लोहा लेते हुए एटीएस चीफ हेमंत करकरे, इनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालस्कर और एसीपी अशोक कामटे शहीद हो गए थे.

पूरी दुनिया ने यह तस्वीर देखी थी कि कसाब किस तरीके से मुंबई के ताज होटल में लोगों पर गोलियां बरसा रहा था. इसके बावजूद कसाब को कानूनी रूप से दलील रखने का मौका दिया गया. कसाब को फांसी तक ले जाने में पूरी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा.

देश के मुस्लिम संगठनों ने कसाब को फांसी पर लटकाने का समर्थन किया. मुल्क में कसाब को लेकर एक अवाज थी कि उसे फांसी दी जाए.

कसाब का जन्म पाकिस्तान के पंजाब में फरीदकोट में हुआ था. कसाब को आतंकी ट्रेनिंग लश्कर ने दी. उसे पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में भारत पर हमले के लिए आतंकी ट्रेनिंग दी गई.

मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तान पूरी तरह से बैकफुट पर रहा. इस मामले में पाकिस्तान का नकाब उतरता गया. इससे पहले वह हमेशा कहता था कि हिन्दुस्तान बिना कोई सबूत के आतंकी हमले का आरोप लगाता है.

चार नवंबर को कसाब की मेडिकल जांच की गई. 21 नवंबर को 7:30 बजे कसाब को फांसी पर लटका दिया गया.

(एजेंसी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.