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अजमल कसाब को फांसी: सॉफ्ट स्टेट ने दिया हार्ड मैसेज

By   /  November 21, 2012  /  No Comments

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-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

26/11 हमले के गुनहगार आमिर अजमल कसाब को आखिरकर फांसी देकर भारत ने पूरी दुनिया को हार्ड मैसेज भेजा है कि उसे सॉफ्ट स्टेट न समझा जाए, वक्त आने पर वो कड़े कदम और फैसले लेने में पूरी तरह सक्षम और समर्थ है. असल में आंतकवाद के प्रति ढुलमुल रवैये और लचर नीति के कारण ही विश्व बिरादरी के समक्ष हमारे देश की छवि एक सॉफ्ट स्टेट की बनी थी, इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है. पिछले एक दशक में एक के बाद एक हुए आंतकी हमलों ने इस बात को पुख्ता किया है. नब्बे के दशक के प्रारंभ से जम्मू-कश्मीर में आंतकवादी हिंसा ने अपना सर उठाया. भारत के आंतरिक हिस्सों में जो आंतकवादी गतिविधियों में बढ़ोत्तरी हुई है, उसमें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएआई की प्रमुख भूमिका रही है. सीमापार और देश के भीतर पनप रहे आंतकवाद की तारें कहीं न कहीं पाकिस्तान से जुड़ी हैं. विभिन्न मंचों पर पाकिस्तान की नापाक हरकतों के प्रमाण सौंपने के बावजूद भी स्वार्थ सिद्घि में मशगूल विश्व के ताकतवर देशों न बयानबाजी और संवेदना प्रगट करने के सिवाए कोई ठोस कार्रवाई इस दिशा में नहीं की. समस्या हमारे तंत्र और व्यवस्था की भी है. वोट बैंक, तुष्टिïकरण और जात-पात की राजनीति कारण सत्तासीन राजनीतिक दल आंतकवाद और आंतकियों के विरूद्घ कड़े निर्णय लेने बचते रहे जिसका खामियाजा देश की जनता ने बरसों से भोग रही है.

 

इतिहास के पन्ने में कई ऐसे किस्से दर्ज हैं जिन्होंने भारत को सॉफ्ट स्टेट का तगमा दिलाया. पिछले एक दशक में हुयी आंतकी घटनाओं और उनसे जुड़े नुकसान का लेखा-जोखा जोड़ा जाए तो जान-माल का भारी नुकसान हुआ है. राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी के चलते आंतकवादियों के विरूद्घ कड़े निर्णय लेने में हीला-हवाली ने आंतकियों का हौसला बढ़ाने और देश की जनता का मनोबल कम करने का काम किया. कानूनी दावपेंच, राजनीति और कूटनीति के चलते देश की जेलों में बंद आंतकियों को कड़ी सजा और फांसी देने से सरकार के हाथ कांपते रहे. आंतकियों को कड़ी सजा न दे पाने के चलते दुनियाभार में यह में ये मैसेज जाता रहा कि भारत एक सॉफ्ट स्टेट है. जहां आप आसानी से किसी भी वारदात को अंजाम दे सकते हैं और पकड़े जाने पर जेलों में सरकारी मेहमान नवाजी का मजा भी ले सकते हैं. असल में आंतक और आंतकियों से सख्ती से न निपटने की लचीली नीति और राजनीति के कारण ही आंतकी हर बार सरेआम वारदात करने में कामयाब हो जाते हैं और सरकार मुआवजा और बनावटी सख्ती दिखाने के अलावा कुछ नहीं करती है. 1993 से 2011 तक मुंबई पर पांच बार आंतकी हमले हुए हैं और जिनमें लगभग 1658 बेकसूरों ने अपनी जान गंवाई और 700 गंभीर रूप से घायल हुए. गौरतलब है कि पिछले एक दशक में देश भर में हुये आंतकी हमलों में मृतकों और घायलों का आंकड़ा हजारों में है.

कसाब 2008 में मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में शामिल था इस हमले में 166 लोग मारे गए थे. कसाब और उसके नौ साथियों ने शिवाजी रेलवे स्टेशन और ताज होटल समेत शहर के कई इलाकों को निशाना बनाया था. शुरू में पाकिस्तान इनकार करता रहा कि कसाब पाकिस्तानी है. 2009 में पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि कसाब उसका नागरिक है. 6 मई 2010 को ट्रायल कोर्ट ने कसाब को फांसी सजा सुनाई जिसे हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट ने बरकरार रखा था. गृह मंत्रालय की सिफारिश पर राष्टï्रपति ने कसाब की दया याचिका खारिज कर दी. जिसके बाद उसे फंासी पर लटका दिया गया. कसाब की सुरक्षा पर देश की जनता के हिस्से का लगभग 50 करोड़ रुपए खर्च किए गए. कसाब को फांसी पर लटकाकर सरकार ने आंतकवाद के मुंह पर जोरदार तमाचा तो मारा है लेकिन अहम् सवाल यह है कि कानूनी प्रक्रिया के नाम पर सरकार ने चार वर्षों तक इस गंभीर मामले क्यों लटकाया गया? जिस व्यक्ति के हाथ बेगुनाहों के हत्या और खून से सने हो उसके लिए स्पेशल कोर्ट और त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या सरकार को इस हादसे में मारे गए बेगुनाहों और पुलिसकर्मियों की बजाय आंतकियों के हितों की अधिक चिंता थी?

कसाब को फांसी की सजा देकर अगर सरकार यह समझती है कि उसने आंतकवाद का सिर कुचल दिया है तो यह भारी गलती होगी. कसाब को फंासी देकर उसने एक अच्छी शुरूआत जरूर की है लेकिन फांसी की सजा पाए अफजल गुरू और करीब दर्जन भर दुर्दांत कैदी भारतीय जेलों में आराम की जिंदगी बसर कर रहे हैं. असल में आंतकी घटनाओं में बारम्बार एक खास समुदाय का नाम आने से राजनीतिक दल और नेता बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं और सीधे तौर पर आंतक से जुड़े मसलों पर बयानबाजी करने के बजाय इधर-उधर की बातें करके मुख्य समस्या से ध्यान हटा देते हैं. देश की विभिन्न जेलों में वर्षों से मौज काट रहे आंतकवादियों को भी कानून के अनुसार सजा मिलने में हो रही देरी भी सरकार को कटघरे में खड़ा करता है.

भारत  में आंतकवाद की समस्या समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है. लचर और लंगड़ी विदेश नीति, अपाहिज कानून और न्याय व्यवस्था और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण सीमापार और देश के भीतर पनपने वाले आंतकवाद पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है. असल में जब भी देश में कोई आंतकी घटना होती है तो सरकार का  सारा ध्यान बयानबाजी, मुआवजे का ऐलान करने और अपने दामन को पाक-साफ करने में अधिक रहता है. विपक्ष सरकार की आलोचना और हो-हल्ला मचाने को अपना धर्म समझता है. बयानबाजी और मुआवजे से अगर आतंकवाद मिटने वाला होता तो हमारे देश में कई साल पहले ही आंतक का खात्मा हो चुका होता. कसाब को  फांसी के बाद सरकारी अमला एक्टिव मोड में आ चुका है. यह आशंका भी जाहिर की जा रही है कसाब के समर्थन में देश के अंदर से आवाज उठ सकती है. आंतकवाद को धर्म, जाति और संप्रदाय से जोडऩा राष्ट्रहित में नहीं है. जब सरकार मजबूत इच्छाशक्ति के साथ तटस्थ भाव से कानून को अपना काम करने देगी तो आंतकवाद पर असरदार तरीके से रोक लग पाएगी. कसाब की फांसी से बौखालाए आंतकी संगठन देश में कोई बड़ी आंतकी कार्रवाई या वारदात को अंजाम देने की योजना बना रहे होंगे इस आंशका से इंकार नहीं किया जा सकता है जिसके लिए सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क रहने की जरूरत है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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