/क्या डेंगू पीड़ित कसाब को फांसी पर लटकाया..?

क्या डेंगू पीड़ित कसाब को फांसी पर लटकाया..?

-सुग्रोवर||

जैसे ही अजमल कसाब को फांसी पर लटका दिए जाने की खबर आयी देशभर में पटाखे चला कर खुशियों का इज़हार किया गया मगर इसी के साथ इस खबर की सच्चाई पर संदेहों के बादल भी मंडराने लगे.

जिस तरह से अजमल कसाब को अचानक फांसी दिए जाने की खबर फ़्लैश हुई लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि अजमल कसाब को फांसी पर लटका दिया गया. जबकि राष्ट्रपति के पास कसाब से पहले गुरमीत सिंह, धरम पाल, सुरेश और रामजी- (यूपी), सिमोन, ज्ञानप्रकाश मदायाह और बिलावेंदर (कर्नाटक), प्रवीण कुमार (कर्नाटक), मो. अफजल (दिल्ली), सायबन्ना (कर्नाटक), जफर अली (यूपी), सोनिया और संजीव (हरियाणा), सुंदर सिंह (उत्तराखंड), अतबीर (दिल्ली) और बलवंत सिंह राजोआना (चंडीगढ़) की दया याचिका बरसों से राष्ट्रपति महोदय के पास लंबित पड़ी हैं.

हालत यह है कि इस समय राष्ट्रपति के पास एक दर्जन दया याचिकाएं लंबित हैं. इनमें छठे नंबर पर मो. अफजल की याचिका है. जबकि 2001 में संसद में हमले के दोषी अफजल की फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट 2005 में ही अपनी मुहर लगा चुका है. ऐसे में कसाब की फांसी के लिए सालों इंतजार करना पड़ सकता था. ऐसे में एकदम से ऐसा क्या हुआ कि बिना किसी पूर्व सूचना के इन सब लंबित याचिकाओं को फलांगते हुए अजमल कसाब की दया याचिका पर निर्णय ले लिया गया और आनन फानन में अजमल कसाब को गुप चुप तरीके से फांसी पर लटका भी दिया गया.

पिछले दिनों खबर आयी थी कि कसाब को डेंगू मच्छर ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है और अजमल कसाब के डेंगू बुखार से उबरने की कोई खबर नहीं आयी. ऐसे में क्या महाराष्ट्र सरकार ने डेंगू पीड़ित अजमल कसाब को फांसी पर लटका दिया?

वरिष्ठ कानूनविद पूनम चंद भंडारी का कहना है कि “किसी भी सजायाफ्ता बीमार व्यक्ति को फांसी पर नहीं लटकाया जा सकता. उसे फांसी पर लटकाए जाने से पहले उसका उपचार किया जाना जरूरी है. पूर्णत: स्वस्थ होने की पुष्टि मिलने के बाद ही उसे फांसीपर लटकाया जा सकता है.

कहीं ऐसा तो नहीं कि कसाब की मौत डेंगू से हो गयी हो और सरकार ने अपनी बदनामी से बचने के लिए इसे इस मौत को अपने प्लस पॉइंट में तब्दील करने के लिए इसे फांसी का जामा पहना दिया हो?

कसाब को गुप चुप में फांसी पर लटकाए जाने की खबर पर सोशल मीडिया पर भी शंकाएं ज़ाहिर की जा रही हैं. फेसबुक पर मनीष खत्री ने टिप्पणी की है कि आज सुबह आठ बजे के करीब पहली खबर आयी कि राष्ट्रपति ने कसाब की दया याचिका खारिज कर दी है.. फिर बताया गया कि कसाब को पुणे के येरवडा जेल में ले जाया जा रहा है और उसे जल्द ही फांसी दी जा सकती है.. उसके बाद कहने लगे कि मुंबई हमले की बरसी तक फांसी दी जा सकती है.. अचानक ये खबर आयी कि कसाब को फांसी दे दी गयी.. इतनी त्वरित कार्यवाही तो भारत के इतिहास में शायद ही कभी की गयी हो… सबसे मजेदार बात तो ये है कि कसाब पिछले कुछ दिनों से डेंगू से पीड़ित था.. हमारी सबसे तेज़ मीडिया का ध्यान इस बात पर भी नहीं गया कि हमारा कानून किसी बीमार को फांसी पर लटकाने की इजाज़त नहीं देता… हमारी सरकार की तरह हमारी मीडिया भी कमाल की है !!!

इस पुरे घटनाक्रम के बाद मस्तिष्क में कुछ सवाल कौंध गए, क्या आपके पास इनके उत्तर हैं..

1. क्या कसाब की मौत डेंगू से हो चुकी थी ?

2. ये फांसी का कार्यक्रम अचानक कैसे ?

3. अगर कसाब की मौत डेंगू से नहीं हुई तो अफजल गुरु की फांसी में देर क्यों?

4. गुजरात चुनाव के लिए प्रलोभन तो नहीं कहीं ये ?

5. मिडिया लगातार कांग्रेस का गुणगान कर रही है, ठीक चुनाव से पहले ये कदम कहीं वोट बैंक की राजनीती तो नहीं ?

खैर सवाल कई है, जवाब भी हम सोशल मीडिया वाले खोज ही लेंगे, पर फिलहाल इसी बात की ख़ुशी है कि देश के गुनाहगार को फांसी दे दी

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.