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कसाब फ़ांसी से नहीं डेंगू से मरा है..?

मीडिया दरबार ने अजमल कसाब को फांसी पर लटकाए जाने के बाद इस फांसी में बरती गयी गोपनीयता के चलते सोशल मीडिया पर उठ रहे सवालों की रोशनी में खबर प्रकाशित की थी कि अजमल कसाब को कहीं डेंगू ने तो नहीं मारा और सरकार ने वाहवाही लूटने के लिए उसकी मौत को आनन फानन में फांसी पर लटकाने  का जामा पहना दिया हो?  कल सारा दिन परम्परागत मीडिया  अजमल कसाब की फांसी  के बारे में सरकार द्वारा उपलब्ध जानकारी के अनुसार खबरें देता रहा. मगर आज खुद इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकार  प्रमोद रिसालिया  भी अज़मल कसाब की फांसी को संदेहास्पद मान कुछ सवाल उठा रहे हैं…

मुंबई हमले के आतंकी कसाब की फ़ांसी को लेकर आज पूरा देश खुशी मना रहा है. खुशी मनानी भी चाहिए. क्योंकि 4 साल बाद 166 लोगों की हमले हुई मौत का बदला जो लिया गया है. लेकिन फ़ांसी पर विश्वास नहीं होता है. ऐसा लगता है कि कसाब की मौत डेंगू से ही हुई है. तमाम सवाल उठ रहे हैं. पूरा भारतवर्ष कसाब की मौत पर खुशी का इज़हार कर रहा हैं.

कसाब की फ़ांसी पर सवालिया निशान है. खासकर क्या कसाब की मौत डेंगू से हुई है?  अचानक फ़ांसी ने कहीं न कहीं लोगों को ये सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया है कि आखिर कसाब की मौत का सच क्या है? क्या डेंगू से कसाब की मौत होने के बाद सरकार ने उसे फ़ांसी की शक्ल देने की कोशिश की है. शायद इसलिए ही फ़ांसी को पूरी तरह से गोपनिय रखा गया. ये सवाल उठना लाज़मी है क्योंकि कहीं न कहीं कसाब और उसके जैसे कई लोगों को फ़ांसी की सजा मुकर्रर होने के बाद भी लंबे समय तक उन्हें फ़ांसी नहीं दी गई? खैर ऐसे कई सवाल और भी हैं मसलन संसद पर हमले के आरोपी अफज़ल गुरु का क्या होगा? उसे कब कसाब की तरह फ़ांसी देकर उसके अंजाम तक पहुंचाया जाएगा? कसाब की फ़ांसी को दूसरे पहलू से देखें तो एक और सवाल उठता है कि अगर वाकई में कसाब की मौत डेंगू से नहीं बल्कि उसे फ़ांसी दी गई है तो फ़िर कसाब की गरदन का निशान क्यों नहीं दिखाया जा सकता? क्या इतना ताबड़तोड़ दफ़नाना जरूरी था ? जब गद्दाफ़ी की घसीटी हुई लाश दिखाई जा सकती है, जब लादेन की फूटी हुई आँख दिखाई जा सकती है, जब सद्दाम के दाँतों का डीएनए भी देखा जा सकता है, तो फ़िर कसाब की गरदन का निशान क्यों नहीं? जब तक फ़ांसी के सबूत , पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और इतनी जल्दबाजी में नियमों को ताक पर रख कर फ़ांसी दिए जाने के कारण सामने नहीं आते, फिर ये देश कसाब की मौत फ़ांसी से हुई है कैसे मान लें.

अब सवाल ये भी उठता है क्या सरकार ने कसाब की फ़ांसी का नाटक कर नई राजनीतिक चाल चली है ? अगर राजनीतिक चाल नही है तो कसाब को इतना ताबड़तोड़ दफ़नाना जरूरी था? सरकार ने कसाब को फ़ांसी देने के लिए शीतकालीन सत्र से ठीक पहले का वक्त क्यों चुना? यह वक्त सिर्फ शीतकालीन सत्र का ही नही 2014 के आम चुनाव से ठीक पहले का भी वक्त है. क्या यूपीए सरकार ने 2014 के आम चुनाव में कसाब की फ़ांसी के बहाने देश की जनता की सहानुभूति लूटने के लिए वोटों को साधने की कवायद तो नहीं की है? 22 नवंबर से शुरु हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में जहां विपक्षी दलों ने सरकार को एफडीआई के मुद्दे पर घेरने की पूरी तैयारी कर ली है वहीं अविश्वास प्रस्ताव की तलवार भी सरकार के सिर पर लटक रही है. ऐसे में क्या शीतकालीन सत्र से ठीक पहले मुंबई हमले के दोषी आतंकी कसाब को फ़ांसी देने का सरकार का फैसला क्या इन मुद्दों से विपक्ष और जनता का ध्यान हटाने की कवायद तो नहीं है? इन सारे पहलुओं को जोड़ा जाए तो सामने आता है कि वर्तमान में यूपीए सरकार अपने कुछ फैसलों को लेकर खासी मुश्किलें में घिरी हुई है जिसे भुलाने के लिए शायद कसाब की फ़ांसी को अपना हथिहार बनाया हो.

सवाल ये भी मन भटकाने वाला है कि कसाब को फ़ांसी देने में कौन सी बड़ी अड़चन थी ? चार साल से हमारी  जेल में बंद था, तो फिर फ़ांसी देना कौनसी बड़ी बात थी. सरकार ने विशेष टीम बनायी, ओपरेशन को नाम भी दिया गया. चार साल तक लगातार उसके खाने और सुरक्षा के लिए पानी की तरह पैसे बहाए गए जबकि खुद भारत के लोग भूखे मरते रहे. एक तरफ जहां हम सुपर पॉवर होने का दम भरते है और दूसरी तरफ पकड़े गए आतंकवादी को फ़ांसी देने के लिए ऊपर से नीचे तक एडी चोटी का जोर लगाना पड़े और फ़ांसी देने पर ऐसा फील हो की हमने कोई बड़ा ही दुर्भर मिशन पूरा कर लिया है. लादेन के मारे जाने और समंदर में समाहित करने की गुप्त घटना के बाद यह दूसरी ऐसी घटना है जो मीडिया की मौजूदगी के बाद भी चुपचाप अंजाम दे दी गई.

सवाल ये भी है यदि किसी मुस्लिम को फ़ासी दी जाए और उसके शव को लेने वाला कोई न हो तो उसके शव को उस शहर के मुस्लिम धर्म के किसी संस्था को सौंप दिया जाता है ताकि उसका अंतिम संस्कार उसके धर्म के अनुसार हो सके. ये जेल के मैन्युल में भी है फिर कसाब का शव जेल में ही बिना किसी धर्मगुरु के कैसे दफ़ना दिया गया?
कसाब अपने पाकिस्तान में स्थित गाँव में बैठा काफी समय बाद माँ के हाथ का बना खाना खा रहा होगा. कसाब भी मर गया अब सरबजीत की भी रिहाई हो जायेगी. इस हाथ दे उस हाथ ले. अल्लाह मेरे गुनाहों को माफ़ करे.
(लेखक प्रमोद रिसालिया टीवी पत्रकार है)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.