Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  रहन सहन  >  Current Article

उपेक्षा से बचने के लिए अपेक्षाओं का त्याग करें…

By   /  November 23, 2012  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

 

– डॉ. दीपक आचार्य||

आजकल आदमी जिन प्रमुख कारणों से परेशान और दुःखी है वह है अपनी उपेक्षा. आदमी ने उम्मीदों के जाने कितने पहाड़ खड़े कर दिए हैं कि वह खुद भले किसी के काम न आए, उसे लगता है कि दुनिया के और लोग जरूर उसके काम आने चाहिएं.

व्यवहारकुशलता में लगातार फिसड्डी होते जा रहे आदमियों को भी यही भ्रम सदैव बना रहता है कि यह दुनिया और दुनियावी लोग उसी की खिदमत के लिए पैदा हुए हैं. फिर बड़े कहे जाने वाले और स्वनामधन्य लोगों को तो यही लगता है कि यह पूरा जहाँ उन्हीं की आवभगत और सेवा-चाकरी के लिए है.

पहले जमाने में आदमी खुद के बूते जीने की कोशिश करता था और ऐसे में हाड़तोड़ मेहनत और पुरुषार्थ से वह अपनी जिन्दगी को तेजस्वी और मस्ती भरी बनाते हुए चलता चला जाता था.

आज आदमी खुद न कोई पुरुषार्थ करना चाहता है न शरीर का बूंद भर पसीना बहाना.  आज का आदमी बैठे-बैठे सब कुछ हथिया लेना चाहता है.  अपनी कुटिल तथा चंचला (कु)बुद्धि के माध्यम से जमाने भर को नचाना और अपना बना लेने के लिए दिन-रात भिड़ा रहता है.

आदमी पूरी जिन्दगी ऐषणाओं, आशाओं और आकांक्षाओं के विशालकाय पर्वतों को अपने जेहन में प्रतिष्ठित करता रहता है और उसे उन सबसे अपेक्षाएं होती हैं जो उसके आस-पास हैं या उससे परिचित हैं.

घर वालों से लेकर बाहर वालों तथा अपनों से लेकर परायों तक के प्रति भी वह आशान्वित रहता है, जमाने भर से वह अपेक्षाएं रखने लगता है. इन अपेक्षाओं के पहाड़ कभी कम नहीं होते बल्कि लगातार ऊँचाई और विस्तार पाते जाते हैं.

इन आशाओं और अपेक्षाओं के चलते आदमी की पूरी जिन्दगी कई-कई कुटिलताओं, एकतरफा भ्रमों, शंकाओं और आशंकाओं से भर जाती है.  इन पहाड़ों के साथ ही उसे संबंधों में कटुता, गंधहीनता और उतार-चढ़ावों से भरी सर्पाकार पगडण्डियों के दर्शन भी होते हैं .

आदमी हर कहीं अपनी अपेक्षाओं को पूर्ण करना चाहता है और जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होती तब मन ही मन खिन्न, एकतरफा दुःखी होकर मानसिक अवसादग्रस्त हो जाता है और उसकी अपेक्षाओं का रूपान्तरण उपेक्षाओं में होने लगता है.

यह जरूरी नहींे कि हर किसी कि अपेक्षाओं को पूरा कर ही दिया जाए अथवा पूरी हो ही जाएं.  कई विषमताओं और विडम्बनाओं के बीच झूलते हुए आदमी का पूरा जीवन एक के बाद एक उपेक्षा से साक्षात करने लगता है. जिस अनुपात में अपेक्षाएं बढ़ती हैं उससे दूगुनी संख्या और परिमाण में उपेक्षाओं की बढ़ोतरी होती चली जाती हैं और यहीं से शुरू होता है संसार में दोष दर्शन तथा परिवेशीय रंगों और सुकून का पलायन.

अच्छी भली सृष्टि आदमी को उपेक्षा की वजह से ऐसी लगती है जहां उसे हमेशा अपनी आशाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के अधूरेपन का भूत सताता रहता है और यही भूत उसकी भूतकालीन जिन्दगी के घोर स्याह बिम्बों को अपने हृदयाकाश में प्रतिष्ठापित कर देता है जो ताजिन्दगी वहां से बाहर निकल नहीं पाते.

जीवन में उपेक्षाओं के दंश से बचने के लिए आत्मसंयम की आराधना का अभ्यास करते हुए अपेक्षाओं से मुक्त जीवन जीने की दिशा में कदम बढ़ाया जाना जरूरी है.

जो प्राप्त हुआ है और हो रहा है उसमें ही संतोष तथा आत्म आनंद में रमे रहते हुए इसे ईश्वरीय विधान का हिस्सा मानकर अध्यात्म की राह को अपनाया जाना चाहिए.

इसी से वास्तविक, शाश्वत और चरम शांति, प्रसन्नता और आनंद का अनुभव किया जा सकता है. अन्यथा किसी व्यक्ति, संस्था या परिवेश से किसी भी प्रकार की अपेक्षाओं के होने पर जीवन के तमाम आनंद फीके लगने लगते हैं और विषादों से पूरा जीवन घिर जाता है. ऐसे में उपलब्ध संसाधन, घर-परिवार और आत्मीय संबंधों की अभिव्यक्ति का प्रतीक परिवेश भी हमें बेकार लगने लगता है.

किसी और से किसी भी प्रकार की अपेक्षा रखने का अर्थ है अपनी पुरुषार्थहीनता का प्रकटीकरण. वरना कोई भी व्यक्ति आत्मतोष और आनंद के साथ जीना चाहे तो उसके लिए संतोष और आत्मानंद के सिवा कोई दूसरा मार्ग है ही नहीं.

जो अपने लिए उपलब्ध है उसे अच्छी तरह संतोषपूर्वक भोगने और जीवन के प्रत्येक कर्म को यज्ञ की तरह मानकर कर लिए जाने का अभ्यास तमाम प्रकार की उपेक्षाओं के उन्मूलन का सर्वाधिक कारगर हथियार है. जो लोग अपेक्षाओं से मुक्त हो जाते हैं उन्हें न किसी प्रकार की उपेक्षा परेशान कर सकती है और न ही वे लोग जो अपेक्षाएं पूरी करने लायक माने जाते हैं.

एक बार अपेक्षाओं से मुक्ति का अभ्यास परिपक्व हो जाने पर दुनिया का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता है जिसके लिए हमें कृतज्ञता ज्ञापित करनी पड़े.  हमारे आस-पास की बात हो या दुनिया की, कोई भी व्यक्ति हमें ओब्लाईज करने या हम पर किसी भी प्रकार की दया अथवा कृपा करने का न दावा कर सकता है, न दम भर सकता है.

अपेक्षाओं से मुक्त व्यक्तियों की उपेक्षा ईश्वर भी नहीं कर सकता, आम आदमी से लेकर लुच्चों और लफंगों या बड़े कहे जाने वाले लोगों की तो औकात ही क्या है.

अपेक्षाओं से पूर्ण मुक्त होना वह सबसे बड़ा हथियार है जो सत्याग्रह से सौ गुना प्रभावशाली है और आत्मदर्शन तथा ईश्वर प्राप्ति के सारे द्वारों को एक साथ खोल देता है.

जीवन में उपेक्षाओं से बचना चाहें तो अपेक्षाओं से दूर रहने का संकल्प लें. यह एकमात्र संकल्प ही ऐसा है जो जीवन को हर प्रकार के आनंद और मस्ती से भर देने के लिए काफी है.

 

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 5 years ago on November 23, 2012
  • By:
  • Last Modified: November 23, 2012 @ 9:12 pm
  • Filed Under: रहन सहन

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

UN में भारत ने समलैंगिकता का किया विरोध..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: