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सफेद दूध का काला कारोबार

-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

 

दूध देशभर के आशीर्वाद में पिरोया हुआ शब्द है. रिश्ते में बड़ा आज भी छोटे को आशीष देते समय दूध और पुत्र का आशीर्वाद देता है लेकिन अब दूध में ऐसा जहर घोला जा रहा है कि आशीर्वाद देने वाला भी अपने आपको गलत महसूस करने लगा है. केन्द्र तथा राज्य सरकारें प्रतिदिन मानव प्रयोग में आने वाली चीजों में मिलावट करने वालों पर काबू पाने के लिए कई तरह के नए कानून बना रही है. सरकार की कोशिशों के बावजूद मिलावटखोर सफेद दूध का काला कारोबार बिना किसी रुकावट के जारी रखे हुए हैं. ये लोग बिना किसी भय के नकली दूध, पनीर, खोया खुलेआम बेचकर आमजन के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं. देश में जरूरत के हिसाब से दूध की कमी किसी से छिपी नहीं है लेकिन जितनी दूध की उपलब्धता देश में दूध की है उसमें असली दूध से अधिक नकली और सिंथेटिक दूध की हिस्सेदारी ज्यादा है. देश में हर दिन एक लाख लीटर से ज्यादा नकली दूध बेचा जा रहा है. दूध के काले कारोबार में दूध डेयरियों के साथ बड़ी-बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं. असलियत यह है कि देश में कृत्रिम श्वेत क्रांति की जड़ें काफी गहरी हो गई हैं.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि देश में 68 फीसदी से अधिक दूध खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के मानकों के अनुरूप नहीं हैं. केंद्र सरकार ने उत्तराखंड के स्वामी अच्युतानंद तीर्थ के नेतृत्व में प्रबुद्ध नागरिकों की जनहित याचिका के जवाब में दाखिल हलफनामे में न्यायालय को यह जानकारी दी. केंद्र सरकार के हलफनामे के अनुसार खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने अपने सर्वे में पाया कि शहरी क्षेत्रों में 68 फीसदी से अधिक दूध निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है. निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं मिले दूध में से 66 फीसदी खुला दूध है. हलफनामे में कहा गया है कि आमतौर पर दूध में पानी के अलावा कुछ नमूनों में डिटरजेन्ट के भी अंश मिले हैं. मानक पर खरे न उतर पाने की मुख्य वजह दूध में ग्लूकोज और दूध के पाउडर की मिलावट बताया गया है. न्यायालय ने इस याचिका पर हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड व दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किए थे. याचिका में आरोप लगाया गया है कि सिंथेटिक और मिलावटी दूध तथा दूध के उत्पाद यूरिया, डिटरजेंट, रिफाइंड ऑयल, कॉस्टिक सोडा और सफेद पेंट आदि से तैयार हो रहे हैं और यह मानव जीवन के लिए बहुत घातक है क्योंकि इससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारिया हो सकती हैं. खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने खुले दूध और पैकेट वाले दूध में आमतौर पर होने वाली मिलावट का पता लगाने के इरादे से 33 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से दूध के 1791 नमूने एकत्र किए थे. ये नमूने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों से एकत्र किए गए थे. सार्वजनिक क्षेत्र की पाच प्रयोगशालाओं में इन नमूनों के विश्लेषण से पता चला कि इनमें से 68.4 फीसदी नमूने मिलावटी थे और वे निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थे. विश्लेषण के बाद 565 नमूने निर्धारित मानकों पर खरे मिले जबकि दूध के 1226 नमूने इन मानकों के अनुरूप नहीं मिले.

दूध के नकली कारोबार के फैलने से दूध का पारंपरिक कारोबार ठप्प होने की कगार पर पहुंच गया है. इसका कारण मिलावटी दूध व बढ़ी हुई कीमतें हैं. नकली दूध का कारोबार जहां जोरों पर हो रहा है, वहीं असली दूध उत्पादकों का कारोबार भी ठप्प हो रहा है. देश में दूध के  कारोबार पर संकट के बादल छाए हुए हैं. अगर सरकार ने इस तरफ ध्यान न दिया तो देश में दूध का कारोबार करने वाले लोग इस धंधे से किनारा कर लेंगे. दूध के कारोबार में ज्यादातर के किसान लगे हुए हैं, क्योंकि जब खेती आमदनी वाला धंधा न रही तो किसानों ने दूध का कारोबार अपनाकर इसे सहायक धंधे के तौर पर अपना लिया. कुछ किसानों ने बड़े स्तर पर इस कारोबार को किया लेकिन देश की सवा सौ के लगभग दूध पैकेजिंग कंपनियां दूध को महंगा बेच रही है. ये कंपनियां भारी मुनाफाखोरी कर रही है. जिसके चलते छोटे कारोबारियों और किसानों के लिए दूध के धंधे में मुनाफा दिनों दिन घटता जा रहा है. बेशक प्रत्येक गांव में प्रत्येक किसान थोड़ा-बहुत दूध का कारोबार कर रहा है. ऐसे कारोबार में 50 रुपए प्रति किलो का खर्च आता है, क्योंकि कम पशु होने के कारण खर्चा ज्यादा पशुओं जितना ही हो रहा है. लेकिन दूध में हो रही मिलावट तथा लागत खर्चों के बढ़ रहे भाव के कारण यह कारोबार भी ठप्प होता जा रहा नकली दूध कारोबार के पीछे बड़ी कंपनियों की भारी मुनाफाखोरी, दूध के ऊंचे भाव अहम् कारण है.

बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में वैसे तो सामान्य दिनों में भी दूध की मांग ज्यादा रहती है, लेकिन त्योहारों के समय मांग और भी बढ़ जाने से कृत्रिम दूध और मावे के धंधे में लिप्त लोगों के वारे-न्यारे हो जाते हैं. दस लीटर कृत्रिम दूध में सिर्फ 200 ग्राम ही असली दूध होता है. यह दो सौ फीसदी मुनाफे का धंधा है. कृत्रिम दूध ज्यादातर फैक्ट्रियों में भेजा जाता है,जो इसे पाउडर मेें बदल देती हैं. मावा बनाने के लिए जहां इसमें खतरनाक रसायन मिलाए जाते हैं,वहीं पनीर बनाने के लिए स्टार्च का उपयोग किया जाता है. देश भर में यह व्यवसाय धड़ल्ले से फल-फूल रहा है. मिलावटखोरी के खिलाफ कार्रवाई करने वाले महकमे इस बात से अनजान नहीं हैं. हर साल त्योहारों पर मिठाइयों के नमूने लेने की रस्म अदायगी की जाती है,मगर कभी किसी को इतनी सजा नहीं होती कि बाकी लोग इस धंधे से तौबा कर लें. कस्बों में लोगों ने डेयरी रूपी गोरखधन्धा शुरू कर रखा है और अपने प्राइवेट वाहनों द्वारा दुकानों पर ये नकली दूध उत्पादन बेच रहे हैं. डेयरी मालिक सिंथैटिक दूध तैयार करने के लिए यूरिया खाद का प्रयोग करते हैं. यहीं बस नहीं ये लोग सूखे दूध का घोल तैयार कर लोगों तक पहुंचाते हैं और दूध की फैट बढ़ाने के लिए कई तरह के जहरीले कैमिकल का इस्तेमाल भी करते हैं.

उत्तर भारत में नकली दूध का कारोबार चरम पर है. उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला नकली मावे यानी खोया की बड़ी मंडी माना जाता है. वैसे पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहर का ये कारोबार जोरों पर है. हर रोज यहां हजारों लाखो किलों नकली खोया बनाया जाता है और आसपास के इलाके जैसे दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, जैसे बड़े शहरों में भेजा जाता है जहां हर रोज हजारों किलो मिठाई की खपत होती है. कृत्रिम दूध और मावे से बनी चीजें इस्तेमाल करने वालों को उल्टियां, सिरदर्द, चर्मरोग के अलावा लकवा और कैंसर जैसी घातक बीमारियां भी हो सकती हैं. सबसे बड़ी चिंता उन बच्चों एवं युवाओं की सेहत के लिए होनी चाहिए जो इन खाद्य वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं. देश की इस भावी पीढ़ी के साथ कुछ लालची लोग खिलवाड़ कर रहे हैं. इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. त्योहार के समय देश भर में करोड़ों रुपए का हजारोंं क्विंटल नकली पनीर और मावा पकड़ा जाता है लेकिन फोरी कार्रवाई के सिवाए कुछ ओर नहीं होता है.  देश में दूध की आवक से कहीं अधिक खपत है. जिसे पूरा करने के लिए मिलावटी दूध का कारोबार धड़ल्ले से जारी है. विडंबना यह है कि कानून के बावजूद मिलावटी दूध को रोकने के लिए सरकार तथा स्वास्थ्य विभाग गंभीर नजर नहीं आ रहा है. कृत्रिम दूध-मावा बनाने के धंधे में लगे लोग सीना ठोककर अपना काम जारी रखे हुए हैं. उनका दावा है कि पहुंच हो तो कृत्रिम मावा क्या, कुछ भी काम आसानी से हो सकता है. पैसे की चकाचौंध के आगे सबकी आंखें बंद हो जाती हैं. जो भी हो, धंधेबाजों की इस प्रवृत्ति पर रोक लगना जरूरी है. अन्यथा देश में श्वेत क्रांति की बजाय इस कृत्रिम श्वेत क्रांति के खतरनाक परिणाम हो सकते हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.