/‘आप’ से कितना जुड़ेगा आम आदमी

‘आप’ से कितना जुड़ेगा आम आदमी

-डॉ. आशीष वशिष्ठ||
आखिरकर एक सामाजिक जनआंदोलन की कोख से राजनीतिक दल का जन्म हो ही गया. इण्डिया अंगेस्ट करप्श्न के मुख्य कत्र्ता-धत्र्ता, पूर्व आयकर आयुक्त एवं सोशल एक्टिविस्ट  अरिवंद केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक पार्टी का नाम आम आदमी पार्टी [आप] रखा है. केजरीवाल अब उस जमात में शामिल हो गए हैं जिसको देश की जनता संदेह की दृष्टि से देखती है और जिस पर दो पैसे का भी यकीन आमजन को शेष नहीं है. केजरीवाल और उनकी टीम पिछले लगभग दो वर्षों से राजनीति की कालिख, बेशर्मी और हठधर्मिता देश की जनता लाते रहे हैं और राजनीतिक दल के गठन से कुछ दिन पूर्व राबर्ट वाड्रा, सलमान खुर्शीद, नितिन गडकरी जैसे नेताओं की पोल खोल चुके हैं.

केजरीवाल स्वयं देश की जनता को यह बता रहे हैं कि राजनीतिक व्यवस्था और नेता आकंठ तक भ्रष्टाचार में डूबे हैं. जब राजनीति काजल की कोठरी और भ्रष्टाचार के कीचड़ में सनी हुई है तो फिर केजरीवाल ने स्वयं इस कीचड़ में उतरने का निर्णय क्यों लिया? वर्तमान भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था और नेताओं से ऊबी जनता जिस भावना, जोश और आवेश के साथ इण्डिया अंगेस्ट करप्शन से जुड़ी थी क्या उसी तर्ज पर आम आदमी ‘आप’ से जुड़ेगा, यह अहम् प्रश्न है. केजरीवाल राजनीति की पथरीली, कंटीली और ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चल पड़े है वो इसमें सफल होंगे या असफल इस प्रश्न का उत्तर भविष्य के गर्भ में छिपा है. राजनीति बड़ी कठोर, निर्दयी और संवेदनहीन होती है उसका कुछ अनुभव पिछले दो वर्षों में अरविंद को हो ही चुका है. क्या अरविंद को राजनीतिक दल बनाने के बाद पूर्व की भांति भारी जन समर्थन मिलेगा? क्या अरविंद राजनीति की काली कोठरी के काजल से स्वयं को बचा पाएंगे? क्या अरविंद राजनीति में सफल होने के लिए दूसरे राजनीतिक दलों व नेताओं की भांति वही तो करने लगेंगे जिसका अब तक वो विरोध करते आए हैं? अरविंद व्यवस्था परिवर्तन की बात कर रहे इसलिए उन पर देश के आम आदमी से लेकर विशेष तक सबकी दृष्टिï लगी हुई है. राजनीति में वोट की शक्ति अहम् भूमिका निभाती है ऐसे में आम आदमी अरविंद के साथ कितना खड़ा होगा और जुड़ेगा.

सामाजिक आंदोलन जनआक्रोश, मुसीबतों, परेशानियों और व्यवस्था सुधार की उपज होते हैं जिनमें नि:स्वार्थ भाव से आमजन और समूह के कल्याण और सुधार की बात होती है. पिछले दो वर्ष में इण्डिया अंगेस्ट करप्शन के बैनर तले लाखों की भीड़ जुटने का सबसे बड़ा कारण यही था कि देश की जनता सार्वजनिक जीवन में तेजी से बढ़ते और फैलते भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगाने के लिए जन लोकपाल बिल चाहती थी. लेकिन राजनीति की हठधर्मिता और अड़चनों से जनता का मनोबल टूट चुका है और भीड़ छित्तर चुकी है. अन्ना और केजरीवाल अलग रास्तों पर चल पड़े हैं. अन्न अभी भी जनआंदोलनों में विशवास रखते हैं लेकिन केजरीवाल ने व्यवस्था परिवर्तन के लिए राजनीति की राह पकड़ी है. टीम अन्ना के टूटने से आम आदमी का जनआंदोलनों से विश्वास भी टूटा है. वर्तमान में आम आदमी राजनीतिक दलों और सामाजिक आंदोलनों से बराबर की दूर बनाये हुए है और वो चुपचाप सारे ड्रामे और उछल-कूद को देख रहा है. असल में आम आदमी अनिर्णय की स्थिति में पहुंच चुका है उसे यह समझ में नहीं आ रहा है कि वो किसका साथ दे और किससे किनारा करे. कौन सच्चा है या झूठा वो यह भी समझ नहीं पा रहा है. आए दिन राजनीति और नेताओं के काले कारनामों का भंडाफोड़ हो रहा है. दो-चार दिन की उठापटक और बयानबाजी के बाद मुद्दा फाइलों और जांच के नाम पर दफना दिया जाता है. ऐसे वातावरण में आम आदमी यह सोचने लगा है कि नेता और सामाजिक कार्यकर्ता स्वार्थसिद्धि के लिए उसका प्रयोग कर रहे हैं. रामदेव और अन्ना के आंदोलन ने आम आदमी को और कुछ दिया हो या नहीं लेकिन तर्कशील और अच्छा-बुरा समझने की शक्ति तो प्रदान की ही है.

आज आम आदमी के परेशानियों का अहम् कारण राजनीति और नेता ही हैं. इक्का-दुक्का नेताओं को छोडक़र आम आदमी राजनीति और नेताओं के बारे में अच्छे विचार नहीं रखता है. वोट बैंक, जात-पात, बोली-भाषा और धर्म की ओछी राजनीति करने वाले नेताओं की कथनी-करनी में कितना फर्क और भेद है वो स्वतंत्रता के 65 वर्षों बाद ही सही जनता को समझ में आने लगी है. राजनीति सेवा की बजाय मेवा खाने और कमाने का जरिया बन चुकी है. देश की जनता और विशेषकर युवा पीढ़ी और लिखा-पढ़ा वर्ग राजनीति से दूरी बनाये हुए है. अरविंद के आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति देश के युवा, मध्यम वर्ग और पढ़े-लिखे लोग ही थे. ये वर्ग राजनीति और नेताओं को भ्रष्ट, स्वार्थी, अपराधी, गुण्डा, अनपढ़ और देश के विकास में बाधक मानता है, और अब केजरीवाल जब उसी रास्ते पर चल पड़े है जिसे वो अब तक कोसते रहे हैं. अहम् सवाल यही है कि केजरीवाल के आहवान पर लाखों की संख्या में रामलीला मैदान पहुंचने वाली भीड़ उनके साथ राजनीति के सफर में साथ चलेगी?

लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीति में सफल होने के लिए जनसमूह और भीड़ से अधिक आवश्यकता वोट की होती है. किसी की पोल खोलना आसान हो सकता है लेकिन एक-एक वोट बटोरना कितना मुशकिल होता है यह केजरीवाल को अभी मालूम नहीं है. जिस देश में जनता धर्म, भाषा, जात-पात और क्षेत्रवाद के जाल में फंसी हो. जहां काम की बजाए नाम और चुनाव चिन्ह देखकर वोट दिया जाता हो, जहां चरित्र प्रमाण पत्र से अधिक जिताऊ होना टिकट पाने की प्राथमिकता हो वहां सीधे-सीधे चलकर या बोलकर कोई सफल हो पाएगा इसमें संदेह है. जो लोग नेताओं पर भड़ास निकालने के लिए सडक़ों पर निकलते हैं वहीं लोग वोट डालने की बजाए घर में सोना अधिक पसंद करते हैं. वहीं वर्षों से प्रदूषित राजनीति के हवाओं में सांसें ले रहे लोगों की मानसिकता भी राजनीतिक दलों के समान हो चुकी है जो सैंकड़ों प्रयत्नों के बाद भी बदली नहीं है.  ऐसे में वो ‘आप’ का कितना साथ देंगे ये प्रश्न सोचने को विवश करता है. अरविंद राजनीति के गंदे तालाब में उतरकर घर की गंदगी साफ करना और व्यवस्था बदलना चाहते हैं लेकिन शायद वो भूल गए हैं कि खूबसूरत मोर के पैर ही उसके शरीर में सबसे बदसूरत अंग होते हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.