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मुट्ठी भर छाँव की तलाश में भटकती व्यवस्था

By   /  November 26, 2012  /  No Comments

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-डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर||

मुम्बई हमले की चौथी बरसी के आलोक में पुनः उस हमले की और अपनी सुरक्षा-व्यवस्था की समीक्षा करनी आवश्यक प्रतीत होती है। इस बरसी के चन्द दिनों पूर्व ही एकमात्र जिन्दा पकड़े गये आतंकवादी के फांसी पर लटकाये जाने से मुम्बई हमलों से प्रभावित लोगों के घावों पर कुछ मरहम तो अवश्य ही लगा होगा। सरकार की ओर से उठाया गया यह कदम इस बात की ओर कतई संकेत नहीं करता है कि हमारी सरकार आतंकवादियों को सजा देने के मामलों में दृढ़ हो गई है अथवा आतंकवादियों से निपटने के लिए सख्त हो गई है।

यदि ऐसा होता तो न तो मुम्बई हमले के बाद होने वाली छिटपुट आतंकी घटनायें नहीं हुई होती और न ही संसद के मुख्य आरोपी को फांसी पर लटकाये जाने में इतनी देर हो रही होती। कसाब की फांसी दिये जाने की अपनी राजनैतिक रणनीति हो सकती है और हमें किसी भी रूप में इस एक फांसी की सजा पर प्रसन्नता और निश्चिन्तता की आवश्यकता कतई नहीं है। कसाब की फांसी के अपने ही निहितार्थ होंगे क्योंकि विगत वर्ष जब इसको और अफजल को फांसी देने की मांग ने बहुत जोर पकड़ा था तो सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि महामहिम के पास अफजल की दया याचिका उन्नीतसवें क्रम पर है। ऐसे में व्यतिक्रम करके कसाब को आनन-फानन फांसी पर लटका देने के अपने ही अर्थ निकाले जा रहे हैं।

फिलहाल तो इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि किसे फांसी पहले दी गई और किसको बाद में दी गई। अभी भी सवाल वही है कि क्या हमारा सुरक्षा-तन्त्र अथवा हमारी सरकारें इतनी सक्षम हो सकी हैं कि आने वाले दिनों में आतंकी हमलों को रोक अथवा उन्हें मिटा सकें? आज भी हमारे देश में जिस तरह के राजनैतिक हथकंडे अपनाये जाते हैं उनमें देश, प्रदेश, यहां के नागरिक दोयम दर्जे में शामिल करके देखे जाते हैं, यदि प्राथमिकता में किसी को शामिल किया जाता है तो वह होता है इन राजनैतिक दलों का वोट बैंक। यह विद्रूपता ही कही जायेगी कि एक प्रदेश का मुख्यमंत्री यहां तक बयान देता है कि यदि अफजल को फांसी दी गई तो घाटी के हालात बिगड़ जायेंगे। खबर तो यहां तक है कि कसाब की फांसी के बाद पाकिस्तान की ओर से किसी छिपे हुए आतंकी हमले की आशंका व्यक्त की जाने लगी है। यह अपने आपमें बहुत ही विचारणीय स्थिति है, कि हमारी सरकार ने एक आतंकवादी को फांसी पर लटका कर देश को, यहां के नागरिकों को क्या संदेश देना चाहा है? सिर्फ यह दिखाने के लिए कि सरकार कड़ा कदम उठाने में सक्षम है, सरकार आतंकवादियों की सजा के प्रति ढुलमुल रवैया नहीं अपनाये हुए है, यदि कसाब को फांसी पर लटकाया है तो हमें याद रखना होगा कि मुम्बई हमले के मास्टरमाइंड अभी भी पाकिस्तान में खुलेआम वहां के युवाओं को भारत के विरुद्ध भड़काने का काम करने में लगे हैं। हमारी सरकार कसाब से पर्याप्त सबूत और जानकारी हासिल करने के बाद भी आज तक खुलकर पाकिस्तान के खिलाफ कोई भी सख्त कदम नहीं उठा सकी है।

यह अपने आपमें बहुत बड़ा सत्य है और तथ्य भी कि विदेशनीति को देखते हुए ही कई बार सरकारों की तरफ से कदम उठाये जाते हैं किन्तु इसके साथ यह भी बहुत बड़ा सत्य है कि देश में प्रत्येक आतंकी घटना के पीछे पाकिस्तान का हाथ होने के पर्याप्त सबूत हमें मिले हैं; उनमें शामिल आतंकवादियों के पाकिस्तान में खुलेआम घूमते रहने के भी सबूत हमारे पास हैं। यदि ऐसी स्थिति के बाद भी हमारे देश की सरकार की ओर से कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जाती है तो स्पष्ट है कि अभी भी आतंकवाद के विरुद्ध, आतंकवादियों के विरुद्ध सरकार का रवैया ठोस और दृढ़तापूर्ण नहीं है। मात्र एक आतंकवादी को फांसी देने भर से देश के अंदर का आतंकवाद समाप्त नहीं होना है, इसके लिए सरकार को पूरी ईमानदारी से सभी गिरफ्तार आतंकवादियों के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाते हुए उनके लिए कड़ी से कड़ी सजा देने का कदम उठाये। सरकार की स्पष्ट और कठोर नीति से न केवल देश में फैले आतंकवादियों के हौसले कमजोर होंगे वरन् लगातार देश को कमजोर कर रहे हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की और वहां से आतंकवाद को संचालित कर रहे आतंकियों की हालत कमजोर होगी। देश की सुरक्षा, नागरिकों की सुरक्षा के लिए ठोस और स्पष्ट रणनीति की ही अब आवश्यकता है। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो अमन-चैन की तलाश में भटकते नागरिक का करुण-अशांत मन बस यही पुकार लगाता दिखेगा-

‘‘सारा आकाश तुम्हारा है, सारी जमीं भी तुम्हारी है।

तपिश से बचने को कहीं, क्या मुट्ठी भर छांव हमारी है?’’

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About the author

बुन्देलखण्ड के उरई-जालौन में जन्म। बुन्देलखण्ड क्षेत्र एवं बुन्देली भाषा-संस्कृति विकास, कन्या भ्रूण हत्या निवारण, सूचना का अधिकार अधिनियम, बाल अधिकार, पर्यावरण हेतु सतत व्यावहारिक क्रियाशीलता। साहित्यिक एवं मीडिया क्षेत्र में सक्रियता के चलते पत्र-पत्रिकाओं एवं अनेक वेबसाइट के लिए नियमित लेखन। एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन।
सम्प्रति साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ और इंटरनैशनल रिसर्च जर्नल ‘मेनीफेस्टो’ का संपादन; सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’ तथा ‘पीएचड होल्डर्स एसोसिएशन’ का संचालन; निदेशक-सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान; महाविद्यालय में अध्यापन कार्य।
सम्पर्क – www.kumarendra.com
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