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नाम पर होती राजनीति

राममनोहर लोहिया अस्पताल, महात्मा गान्धी मार्ग, पटेल चौक, महावीर जयंती पार्क इत्यादि महापुरुषो, देशभक्तो, समाजसेवियो के नाम पर रखे गये दिल्ली के अस्पतालो, सडको, चौको और पार्को का नाम हम देख सकते है जिन्हे पढ्कर निश्चित ही हमे उन देशभक्तो का देश को योगदान याद आता है जिससे हम गौरवान्वित मह्सूस करते है. अगर हम एक नजर अतीत मे डाले तो पायेंगे कि भारत मे “नाम” को लेकर कई दिग्गज देशभक्तो ने भी संघर्ष किये है, परंतु उनकी “नाम-परिवर्तन” के पीछे की मंशा राजनीति न होकर देशभक्ति की भावना थी. 1922 मे दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना कर विधानसभा के अन्दर से अंग्रेज सरकार क विरोध करने हेतु कलकत्ता (वर्तमान नाम कोलकाता) महानगर पालिका का चुनाव जीता और वे स्वयम् महापौर बन गये तथा उन्होने सुभाष चन्द्र बोस को कलकत्ता महानगर पालिका का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया था. सुभाष चन्द्र बोस जब कलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाये गये तो उन्होने कलकत्ता महानगर पालिका का पूरा तंत्र एवम उसकी कार्यपद्धति तथा कोलकाता के रास्तो के नाम बदलकर उन्हे भारतीय नाम दे दिया था. कुछ इसी तरह का काम समाजवादी राजनारायण ने भी किया. उन्होने बनारस के प्रसिद्ध बनिया बाग़ में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की स्थापित प्रतिमा के टुकड़े – टुकडे कर गुलामी के प्रतीक को मिटटी में मिला दिया हालाँकि उनके इस कृत्य के लिये पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था परंतु  आज उसी पार्क को ‘ लोकबन्धु राजनारायण पार्क, के नाम से जाना जाता है.

परंतु इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इतिहास ने उस हेमू के नाम को ही बिसार दिया जिसने पानीपत के तीसरे युद्ध से पूर्व 22 युद्ध लड़े, जिनमें 20 में अफगानों को व 2 में अकबर की सेना को पराजित किया. अकबर की सेना 7 अक्तूबर, 1556 को तुगलकाबाद, दिल्ली की लड़ाई में हेमचन्द्र से हारकर भाग गई. हेमचन्द्र का तब सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य के रूप में दिल्ली में राज्याभिषेक हुआ. गाजी की उपाधि पाने के लिए अकबर द्वारा हेमू का सिर काट कर उसे काबुल भेजा गया और धड़ तुगलकाबाद के किले में टांग दिया गया. हेमू व उनके पिता और परिवार पर किए गए इन अत्याचारों से भी अकबर का संरक्षक बैरम खां संतुष्ट नहीं हुआ तो उसने हेमू के समस्त भार्गव कुल को नष्ट करने का निश्चय किया.

अपनी फतह के जश्न में उसने हजारों बंदी भार्गवों और सैनिकों के कटे सिरों से मीनारें बनवार्इं गयी जिसका उल्लेख प्रसिद्ध इतिहासकार सतीश चन्द्र ने अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत, सल्तनत से मुगलो तक मे भी किया है. ऐसी एक मीनार की मुगल पेंटिंग राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली में आज भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है और नवस्थापित पानीपत संग्रहालय में भी प्रदर्शित है. इतना ही नही अकबर की क्रूरता का राजस्थान आज भी गवाह है जिसके कारण महाराणा प्रताप  को घास तक की रोटियाँ खानी पडी थी. औरंग्जेब की क्रूरता तो आज भी इतिहास मे अक्षम्य है जिसका मुक़ाबला छत्रपति शिवाजी महाराज ने डट कर किया और हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की.

परंतु वर्तमान समय मे देशभक्ति को राजनीति ने अपने पंजे मे जकड लिया है. सार्वजनिक जगहो जैसे अस्पताल, सडक, चौक, पार्क इत्यादि का “नामकरण”  मात्र एक राजनीति करने का हथियार बनकर रह गया है अगर ऐसा मान लिया जाय तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी. सत्ताधारी राजनेता कभी अपने नाम पर तो कभी अपने दल के किसी अन्य “श्रेष्ठ” के नाम पर अथवा समाज के किसी विशेष वर्ग को खुश करने के लिये ऐसे सार्वजनिक सभी स्थलो का नामकरण कर राजनीति करते आये है.

अभी हाल मे ही पिछले दिनो पहले जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलकाता स्थित इंदिरा भवन का नाम बदलकर क्रांतिकारी कवि काजी नजरूल इस्लाम के नाम पर रखना चाहा तो यह खबर अखबारो और समाचार चैनलो की सुर्खिया बनी थी क्योंकि इमारत का नाम बदले जाने के प्रस्ताव पर कांग्रेस ने कहा था कि वे काजी नजरूल इस्लाम के खिलाफ नहीं है लोकिन इंदिरा गांधी का इस तरह से अपमान नहीं सहा जा सकता. उल्लेखनीय है कि इस इमारत का निर्माण वर्ष 1972 में किया गया और कांग्रेस के एक सत्र के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इस भवन में ठहरी थीं.

2004 मे तत्कालीन केन्द्रिय पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने अंड्मान की राजधानी पोर्टब्लेयर की ऐतिहासिक जेल सेलुलर जहाँ वीर सावरकार को दो जन्मो का आजीवन कारावास की सजा के लिये रखा गया था वहा वीर सावरकर के नाम की पट्टिका लगी थी को बदलवाकर  महात्मा गान्धी जी के नाम की पट्टिका लगवा दी थी जबकि गान्धी जी का सेलुलर जेल से कोई दूर-दूर तक सम्बन्ध ही नही था.

सिर्फ बंगाल ही नही एक समय उत्तर प्रदेश मे भी नाम-परिवर्तन को लेकर राजनीति काफी गर्म हुई थी जब उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने पूर्ववर्ती माया सरकार का एक बड़ा फैसला बदल दिया था.  मायावती सरकार द्वारा यूपी के सात् जिलों के नाम बदल दिए गये थे लेकिन सपा सरकार ने इस निर्णय को बदलते हुए सभी सात जिलों को उनके पुराने नाम लौटाने का निर्णय लिया.

विज्ञान से लेकर मान्यताओ तक मे नामकरण की व्यवस्था बहुत प्राचीन और सटीक है. भारतीय चिंतन के अनुसार आत्मा अजर-अमर है. शरीर नष्ट होता है, कितुं जीवात्मा के संचित संस्कार उसके साथ लगे रहते हैं. हिन्दू धर्म संस्कारो में नामकरण-संस्कार पंचम संस्कार है. जिसके तीन आधार माने गए हैं. पहला, जिस नक्षत्र में शिशु का जन्म होता है, उस नक्षत्र की पहचान रहे. इसलिए नाम नक्षत्र के लिए नियत  अक्षर से शुरू होना चाहिए, ताकि नाम से जन्म नक्षत्र का पता चले और ज्योतिषीय राशिफल भी समझा जा सकें. दूसरा, मूलरुप से नामों की वैज्ञानिकता बनें और तीसरा यह कि नाम से उसके जातिनाम, वंश, गौत्र आदि की जानकारी हो जाए.  गुरु वशिष्ठ द्वारा  श्रीराम आदि चार भाइयों का नामकरण और महर्षि गर्ग द्धारा श्रीकृष्ण का नामकरण उनके “गुण-धर्मों” के आधार पर करने की बात सर्वविदित है.

विज्ञान की भाषा मे भी किसी वस्तु, गुण, प्रक्रिया, परिघटना आदि को समझने-समझाने के लिये उसका समुचित नाम देना आवश्यक होता है. नाम देने की पद्धति को ही नामकरण अर्थात “नोमेंक्लेचर” कहा जाता है जिसमे तकनीकी शब्दों की सूची, नामकरण से संबन्धित सिद्धान्त, प्रक्रियाएं आदि शामिल होते है. जीव विज्ञान मे द्विपद नामकरण प्रजातियो के नामकरण की एक प्रणाली है जिसे कार्ल लीनियस नामक एक स्वीडिश जीव वैज्ञानिक द्वारा शुरू किया गया. जिसमे उन्होने पहला नाम  वंश अर्थात “जीनस” का और दूसरा प्रजाति विशेष का विशिष्ट नाम को चुना था.  उदाहरण के लिए, मानव का वंश “होमो” है जबकि उसका विशिष्ट नाम “सेपियंस” है, तो इस प्रकार मानव का द्विपद या वैज्ञानिक नाम “होमो साप्येन्स्” है. इतना ही नही रसायन विज्ञान मे आईयूपीइसी नामकरण की व्यवस्था से  आज भी स्कूलो मे विभिन्न प्रकार के रसायनो के नाम उनके गुण-धर्मो के आधार पर रखने की पद्धति सिखायी जाती है.

जब विज्ञान और मान्यताओ मे “गुण-धर्म” की महत्ता के आधार पर ही “नामकरण-पद्धति” का अस्तित्व है तो इतना सब कुछ जानते हुए भी न जाने क्यों अकबर को महान व औरंग्जेब, इब्राहिम लोदी जैसे अन्य मुस्लिम आक्रान्ताओं के नाम को महिमामंडित करने हेतु आज भी भारत की राजधानी की सडको का नाम इन आक्रांताओ के नाम पर है और तो और इन सडको का रख्र-रखाव करने वाली नईदिल्ली नगरपालिका को भी नही पता कि इन सडको का नाम इन आक्रांताओ के नाम पर क्यो रखा गया है व उसका आधार क्या है. ध्यान देने योग्य है कि भारत का एक गौरवशाली इतिहास रहा है. भारत को गुलाम बनाने और लूटने के उद्देश्य से आये सभी विदेशी पूर्व मध्यकालीन-मध्यकालीन शासको को नाको चने चबवाने होते हुए भारत के कई महान सपूतो ने अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दिया इस बात का पता हमें इतिहास के पन्नो से चलता है. आये दिन हम उन सभी शहीदों को श्रद्धान्जलि देते है जो हँसते-हँसते भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने हेतु अपने प्राणों को देश-हित में न्योछावर कर दिया. जिन्हें याद करके हर भारतीय गौरवान्वित महसूस करता है. परन्तु देश की राजधानी दिल्ली की कुछ सडको के नाम उन्ही “पूर्व-मध्यकालीन एवं मध्यकालीन शासको” के नाम पर रखी गयी है जिन्होंने भारत को सैकड़ो वर्ष गुलाम बनाये रखा. हमे यह सदैव ध्यान रखना चाहिये कि जो देश अपना इतिहास भूल जाता है वह अपना अस्तित्व व पहचान खो बैठता है.

-राजीव गुप्ता, स्वतंत्र पत्रकार, 09811558925

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.