/कारगिल शहीद कैप्टन सौरभ कालिया के मातापिता पहुंचे सर्वोच्च न्यायालय..

कारगिल शहीद कैप्टन सौरभ कालिया के मातापिता पहुंचे सर्वोच्च न्यायालय..

-अरविन्द शर्मा||

धर्मशाला के समीप पालमपुर के निवासी और कारगिल युद्ध के शहीद कैप्टन सौरभ कालिया के मातापिता इस  हादसे के १३  साल बाद भी पीडा से बाहर नही आ पाए है. सौरभ कालिया के शव  के साथ पाकिस्तान फौज की अमानवीय प्रताडना(टार्चर) को वे आज भी नही भूल पाएं है.

कैप्टन सौरभ कालिया की मां विजय कालिया और पिता को इस बात का मलाल है कि भारत सरकार इस बात को पाकिस्तान के साथ पूरी ताकत से नही उठा पायी है , जिस कारण  सौरभ कालिया के साथ दुर्व्यवहार करने वाले पाकिस्तानी सैनिको के खिलाफ कारवाई नहीं हो सकी है . शहीद कैप्टन सौरभ कालिया  के माता पिता का कहना है कि उन्होने कई बार इस बारे भारत सरकार को लिखा लेकिन उन्हे आश्वासनों के सिवाए कुछ नही मिला.

सौरभ के पिता एन के कालिया ने कहा कि “तत्कालीन प्रधान मंत्री और रक्षा मंत्री ने इस मामले को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का वादा किया परन्तु किया कुछ नहीं.अब जब हमे गत १३ वर्ष से न्याय नहीं मिला तो मजबूरन सर्वोच न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पद रहा है.” सौरभ का परिवार चाहता है कि इस पाकिस्तान फौज की प्रताडना(टार्चर) को युद्ध अपराध माना जाए  और पकिस्तान इस किये की माफ़ी मांगे . सौरभ अपने पांच सिपाहियों अर्जुन राम, भंवर लाल भगारिया, भीखा राम, मूला राम तथा नरेश सिंह के साथ १५ मइ १९९९ को बजरंग पोस्ट पर गश्त कर रहे थे जब पाकिस्तानी सेना ने उन्हें जिंदा पकड लिया . और कैद मे उने मार कर उनके शव  के साथ पाकिस्तान फौज की प्रताडना(टार्चर) का खेल खेला.

१३ साल के अंतराल के बाद सौरभ कालिया के मां वाप ने अब एडवोकेट अरविन्द शर्मा द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की  है उन्हे आशा है कि देश  की सर्वोच्च न्याय प्रणाली के माध्यम से इस बात कों हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट के माध्यम से उठाया जा सकेगा  और उन पाकिस्तानी फोजी अधिकारियों जो इसके पीछे जिम्मेवार रहे है को सजा मिल सकेगी.

सौरभ कालिया की मां को यह भी मलाल है कि जब पाकिस्तान ने सौरभ का शव उन्हें  सौंपा तो इसके निरीक्षण के लिए किसी भी अंतर्राष्ट्रीय एजेसी को शामिल नही किया गया अन्यथा  इस मामले को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  उठाया जा सकता था.

कालिया परिवार का यह भी मानना है कि अगर सरकार ऐसे ही ढील दिखाती रही तो एक समय ऐसा आएगा जब देश  की रक्षा के लिए कोई भी नौजवान आगे नही आएगा. उनका  यह भी मानना है कि इससे देश  के इन रक्षकों के मनोबल पर भी कुप्राव पड़ सकता है.

विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने इस मामले पर दिल्ली में कहा कि ये एक बेहद दुखद कहानी है सरकार इस मामले में हर सम्भव कदम उठाएगी अब मामला न्यायालय में है कांग्रेस महा सचिव दिग्विजय ने इस पर दुःख ज़ाहिर करते हुए  तब की एन डी ए सरकार पर मामला न उठाने का इलज़ाम लगाया .

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.