Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

खुद को पाक साफ़ ज़ाहिर करने के चक्कर में नंगा हुआ ज़ी…

By   /  November 28, 2012  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-सुग्रोवर||

ज़ी न्यूज़ का “जिंदल धारावाहिक” अपने सम्पादक व बिज़नेस हेड सुधीर चौधरी व ज़ी बिज़नेस चैनल के सम्पादक समीर अहलूवालिया की गिरफ्तारी पर भी खत्म नहीं हुआ बल्कि उसकी बेशर्मी ने नया रूप ले लिया और खुद को पाक साफ साबित करने की असफल कोशिश में उसने कई वरिष्ठ पत्रकारों के फ़ोनो रिकॉर्ड किये जिसमें आजतक के पूर्व संपादक और वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी का भी फ़ोनों रिकॉर्ड किया और उसे कांट छांट कर इस तरह से प्रस्तुत किया कि लगे नकवी ज़ी न्यूज़ और ज़ी बिजनेस के संपादकों की गिरफ्तारी की निंदा कर रहे हों. जबकि सच्चाई कुछ और ही थी.

वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी द्वारा मीडिया दरबार को किये गए एसएमएस और उनकी फेसबुक वाल पर अपडेट किये गए स्टेट्स के अनुसार “ज़ी न्यूज़ ने अपने सम्पादक व बिज़नेस हेड सुधीर चौधरी व ज़ी बिज़नेस चैनल के सम्पादक समीर अहलूवालिया की कल हुई गिरफ़्तारी पर मेरा फ़ोनो कल रात किया था. इसके बाद मेरे पास कई लोगों के फ़ोन और एसएमएस आये कि क्या आपने ज़ी को दिये फ़ोनो में पुलिस कार्रवाई को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है क्योंकि ज़ी न्यूज़ अपने यहाँ ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टी पर आपका ऐसा बयान चला रहा है.

मुझे इससे बड़ी पीड़ा पहुँची है. यह तथ्यों को अपने पक्ष में तोड़ कर पेश करने की निन्दनीय हरकत है.

इस मामले में मेरा स्पष्ट मानना है कि दो राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों के सम्पादकों पर अवैध उगाही और आपराधिक साज़िश जैसे आरोपों का लगना पत्रकारिता जगत के लिए बड़ी शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण बात है. चूँकि इस मामले में साक्ष्य के तौर पर वीडियो सीडी उपलब्ध है और उसकी फ़ॉरेन्सिक रिपोर्ट आ चुकी है कि उसके वीडियो-आडियो के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गयी है, इसलिए प्रथम दृष्ट्या इन दोनों सम्पादकों के विरुद्ध गम्भीर आपराधिक मामला बनता है और पुलिस ने इनके ख़िलाफ़ जो कार्रवाई की है, वह किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं लगती.

गौरतलब है कि ज़ी समूह के यह दोनों कथित पत्रकार कभी पत्रकार थे ही नहीं बल्कि मार्केटिंग एक्सपर्ट थे और सम्पादक पद पर इन दोनों की नियुक्ति के पीछे संस्थान के आर्थिक हित छिपे थे.”

नब्बे के दशक की शुरुआत में पत्रकारिता में निज़ी चैनलों के प्रवेश के साथ ही लगा था कि पत्रकारिता अब क्रांतिकारी युग में प्रवेश कर गयी है और आने वाला समय इलेक्ट्रोनिक मीडिया का होगा. यह हुआ भी. धीरे धीरे यहाँ भी पत्रकारिता की बजाय “खबरों की ठेकेदारी” ने अपने पांव ज़माना शुरू कर दिया. विज्ञापन तो सिर्फ सात सौ रुपये का दस सेकंड था जो किसी चैनल को चलाये जाने के लिए पर्याप्त नहीं था. केबल वाला भी चैनल को प्राइम बैंड पर चलाने के लिए हफ्ता वसूली कर रहा था. याने हर शहर में दसियों केबल ऑपरेटर और हर एक की हफ्ताबंदी. किसी भी चैनल को लांच करने के साथ ही सिर्फ केबल ऑपरेटरों को बाँटने के लिए करोड़ों रुपयों का बजट अलग से रखना पड़ता था. इसीके चलते इलेक्ट्रोनिक न्यूज़ चैनल चलाना किसी आम पत्रकार के बूते की बात नहीं रही और यह मीडिया भी कार्पोरेट जगत की बपौती बन कर रह गया. इसीके साथ सरोकार पत्रकारिता से कोसों दूर चले गए.

आप आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि चार पांच सौ करोड़ रुपये का निवेश कर शुरू होने वाला न्यूज़ चैनल सिर्फ सात सौ रुपये प्रति दस सेकंड की दर पर मिलने वाले विज्ञापन के बूते कैसे चलेगा. और जरूरी नहीं कि सात सौ रुपये प्रति दस सेकंड का विज्ञापन भी सब को मिलेगा. कार्पोरेट जगत कभी घाटे के लिए काम नहीं करता. मोटी तनख्वाहों पर रखे गए पत्रकारों पर अधिकांश संस्थानों की तरफ से दवाब बनाया जाने लगा कि ऐसी ख़बरों पर ध्यान केन्द्रित किया जाये जो संस्थान को आर्थिक फायदा पहुंचाए. ऐसे में पत्रकार तो बिचारा बन कर रह गया और ऐसे लोगों की चांदी हो गयी जो मालिकों को हर महीने करोड़ों का लाभ दिलाने का ठेका उठाने लगे. सुधीर चौधरी और समीर आहलुवालिया भी इसी जमात से आते हैं.

मैं निज़ी तौर पर नवीन जिंदल को बरसों से जानता हूँ. जिंदल से हुई कई निज़ी मुलाकातों से जैसा मैंने समझा वे जितनी मासूम मुस्कराहट के साथ पेश आते हैं उतने ही गुस्सैल भी हैं और अपने गुस्से को नतीजे तक भी पहुंचाते हैं मैं यह भी मानता हूँ कि ज़ी समूह के इन दोनों संपादकों को वे पहले हो रहे सौदे की बीस पच्चीस करोड़ की रकम भी देने के लिए राज़ी हो गए होगें. यह भी तय है कि जिंदल से हो रहे इस सौदे के बारे में ज़ी समूह के करता धर्ता सुभाष चंद्रा, जो खुद नवीन जिंदल के शहर हिसार से हैं, को ना केवल पूरी जानकारी ही थी बल्कि परदे के पीछे वे अपनी इन दोनों कठपुतलियों को निर्देशित भी कर रहे थे और जब उन्हें यह महसूस हुआ कि यदि नवीन जिंदल पच्चीस करोड़ रूपये देने को राज़ी है तो ज्यादा भी दे सकता है. सुभाष चन्द्र यहीं मात खा गए और नवीन जिंदल के जिद्दीपन और गुस्से को भूलकर सुभाष चंद्रा ने अपनी मांग चौगुनी कर दी. जिसके नतीजे में नवीन जिंदल ने रिवर्स स्टिंग करवा कर बाज़ी अपने हाथ में ले ली. नतीजा आपके सामने है.

बेशर्मी की हद यह है कि ज़ी समूह अब भी खुद को पाक साफ़ साबित करने के बेहूदा प्रयत्नों में जुटा है और इसीके चलते नकवी जैसे बेदाग व्यक्तित्व को भी अपनी चाल का शिकार बना कर अपने गुनाह छुपाने की कोशिश में अंतर्वस्त्र भी उतार पूरी तरह से नग्न हो गया.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

राजस्थान के पत्रकार सरकार के समक्ष घुटने टेकने पर विवश हैं..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: