Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

केजरीवाल पर हेगड़े की आशंका में दम है..

By   /  November 29, 2012  /  1 Comment

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

सामाजिक आंदोलन के गर्भ से राजनेता के रूप में पैदा हुए अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को बने जुम्मा जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए हैं कि उसकी सफलता पर आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं। यूं तो जब वे टीम अन्ना से अलग हट कर राजनीति में आने की घोषणा कर रहे थे, तब भी अनेक समझदार लोगों ने यही कहा था कि राजनीतिक पार्टियों व नेताओं को गालियां देना आसान काम है, मगर खुद अपनी राजनीतिक पार्टी चलना बेहद मुश्किल। अब जब कि पार्टी बना ही ली है तो सबसे पहले टीम अन्ना के सदस्य कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने ही प्रतिक्रिया दी है कि उसकी सफलता संदिग्ध है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक 546 सदस्यों को चुनने के लिए एक बड़ी रकम की जरूरत पड़ती है। यह कार्य इतना आसान नहीं है। आज के समय में किसी भी राजनीतिक पार्टी को चलाने के लिए काफी चीजों की जरूरत पड़ रही है।
हेगड़े की इस बात में दम है कि आम आदमी पार्टी के विचार तो बड़े ही खूबसूरत हैं, मगर सवाल ये है कि क्या वे सफल हो पाएंगे? यह ठीक वैसे ही है, जैसे एक फिल्मी गाने में कहा गया है किताबों में छपते हैं चाहत के किस्से, हकीकत की दुनिया में चाहत नहीं है। केजरीवाल की बातें बेशक लुभावनी और रुचिकर हैं, मगर देश के ताजा हालात में उन्हें अमल में लाना नितांत असंभव है। यानि कि केजरवाल की हालत ऐसी होगी कि चले तो बहुत, मगर पहुंचे कहीं नहीं। उनकी सफलता का दरवाजा वहीं से शुरू होगा, जहां से व्यावहारिक राजनीति के फंडे अमल में लाना शुरू करेंगे।
अव्वल तो केजरीवाल उसी सिस्टम में दाखिल हो गए हैं, जिसमें नेताओं पर जरा भी यकीन नहीं रहा है। ऐसे में अगर वे सोचते हैं कि भाजपा की तरह वे भी पार्टी विथ द डिफ्रेंस का तमगा हासिल कर लेंगे तो ये उनकी कल्पना मात्र ही रहने वाली है। यह एक कड़वा सच है कि जब तक भाजपा विपक्ष में रही, सत्ता को गालियां देती रही, तब तक ही उसका पार्टी विथ द डिफ्रेंस का दावा कायम रहा, जैसे ही उसने सत्ता का स्वाद चखा, उसमें वे भी वे अपरिहार्य बुराइयां आ गईं, जो कांग्रेस में थीं। आज हालत ये है कि हिंदूवाद को छोड़ कर हर मामले में भाजपा को कांग्रेस जैसा ही मानते हैं। किसी पार्टी की इससे ज्यादा दुर्गति क्या होगी कि जिसे बड़ी शान से अनुशासित पार्टी माना जाता था, उसी में सबसे ज्यादा अनुशासनहीनता आ गई है। आपको ख्याल होगा कि भाजपा सदैव कांग्रेस के परिवारवाद का विरोध करते हुए अपने यहां आतंरिक लोकतंत्र की दुहाई देती रहती थी, मगर उसी की वजह से आज उसकी क्या हालत है। कुछ राज्यों में तो क्षेत्रीय क्षत्रप तक उभर आए हैं, जो कि आए दिन पार्टी हाईकमान को मुंह चिढ़ाते रहते हैं। राम जेठमलानी जैसे तो यह चैलेंज तब दे देते हैं उन्हें पार्टी से निकालने का किसी में दम नहीं। इस सिलसिले में एक लेखक की वह उक्ति याद आती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दुनिया में लोकतंत्र की चाहे जितनी महिमा हो, मगर परिवार तो मुखियाओं से ही चलते हैं। पार्टियां भी एक किस्म के परिवार हैं। जैसे कि कांग्रेस। उसमें भी लाख उठापटक होती है, मगर सोनिया जैसा कोई एक तो है, जो कि अल्टीमेट है। कांग्रेस ही क्यों, एकजुटता के मामले में व्यक्तिवादी पार्टियां यथा राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, अन्नाद्रमुक, द्रमुक, शिवसेना आदि आदि भाजपा से कहीं बेहतर है। ऐसे में केजरीवाल का वह आम आदमी वाला कोरा आंतरिक लोकतंत्र कितना सफल होगा, समझा जा सकता है।
चलो, भाजपा में तो फिर भी राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी मौजूद हैं, पार्टी कहीं न कहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे सशक्त संगठन की डोर से बंधा है, मगर केजरीवाल और उनके साथियों को एक सूत्र में बांधने वाला न तो कोई तंत्र है और न ही उनमें राजनीति का जरा भी शऊर है। उनकी अधिकांश बातें हवाई हैं, जो कि धरातल पर आ कर फुस्स हो जाने वाली हैं।
वे लाख दोहराएं कि उनकी पार्टी आम आदमी की है, नेताओं की नहीं, मगर सच ये है कि संगठन और वह भी राजनीति का होने के बाद वह सब कुछ होने वाला है, जो कि राजनीति में होता है। नेतागिरी में आगे बढऩे की खातिर वैसी ही प्रतिस्पद्र्धा होने वाली है, जैसी कि और पार्टियों में होती है। राजनीति की बात छोडिय़े, सामाजिक और यहां तक कि धार्मिक संगठनों तक में पावर गेम होता है। दरअसल मनुष्य, या यो कहें कि जीव मात्र में ज्यादा से ज्यादा शक्ति अर्जित करने का स्वभाव इनबिल्ट है। क्या इसका संकेत उसी दिन नहीं मिल गया था, जब पार्टी की घोषणा होते ही कुछ लोगों ने इस कारण विरोध दर्ज करवाया था कि वे शुरू से आंदोलन के साथ जुड़े रहे, मगर अब चुनिंदा लोगों को ही पार्टी में शामिल किया जा रहा है। इसका सीधा सा अर्थ है कि जो भी पार्टी में ज्यादा भागीदारी निभाएगा, वही अधिक अधिकार जमाना चाहेगा। इस सिलसिले में भाजपा की हालत पर नजर डाली जा सकती है। वहां यह संघर्ष अमतौर पर रहता है कि संघ पृष्ठभूमि वाला नेता अपने आपको देशी घी और बिना नेकर पहने नेता डालडा घी माना जाता है। ऐसे में क्या यह बात आसानी से हलक में उतर सकती है कि जो प्रशांत भूषण पार्टी को एक करोड़ रुपए का चंदा देंगे, वे पार्टी का डोमिनेट नहीं करेंगे?
सवाल इतने ही नहीं हैं, और भी हैं। वर्तमान भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था से तंग जनता जिस जोश के साथ अन्ना आंदोलन से जुड़ी थी, क्या उसी उत्साह के साथ आम आदमी पार्टी से जुड़ेगी? और वह भी तब जब कि वे अन्ना को पिता तुल्य बताते हुए भी अपना अलग चूल्हा जला चुके हैं? शंका ये है कि जो अपने पिता का सगा नहीं हुआ, वह अपने साथियों व आम आदमी का क्या होगा? राजनीति को पानी पी-पी कर गालियां देने वाले केजरीवाल क्या राजनीति की काली कोठरी के काजल से खुद को बचा पाएंगे? क्या वे उसी किस्म के सारे हथकंडे नहीं अपनाएंगे, जो कि राजनीतिक पार्टियां अपनाती रही हैं? क्या उनके पास जमीन तक राजनीति की बारीकियां समझने वाले लोगों की फौज है? क्या उन्हें इस बात का भान नहीं है कि लोकतंत्र में सफल होने के लिए भीड़ से ज्यादा जरूरत वोट की होती है? ये वोट उस देश की जनता से लेना है, जो कि धर्म, भाषा, जातिवाद और क्षेत्रवाद में उलझा हुआ है। क्या केजरीवाल को जरा भी पता है कि आज जो तबका देश की खातिर बहस को उतारु है और कथित रूप से बुद्धिजीवी कहलाता है, उससे कहीं अधिक अनपढ़ लोगों का मतदान प्रतिशत रहता है? ऐसे ही अनेकानेक सवाल हैं, जो ये शंका उत्पन्न करते हैं आम आदमी पार्टी का भविष्य अंधकारमय प्रतीत होता है। हां, अगर केजरीवाल सोचते हैं वे चले हैं एक राह पर, सफलता मिले मिले, चाहे जब मिले, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता तो ठीक है, चलते रहें।
-तेजवानी गिरधर

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।

1 Comment

  1. मैँ चाहता हूँ की आप अपने विचारोँ को यहाँ रखेँ.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

पाकिस्‍तान ने नहीं किया लेकिन भाजपा ने कर दिखाया..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: