/बिहारशरीफ में चल रहे हैं कई अवैध न्यूज चैनल..!

बिहारशरीफ में चल रहे हैं कई अवैध न्यूज चैनल..!

-नालंदा से संजय कुमार की रिपोर्ट||

अगर कोई गलत कार्य भी प्रशासन से मिलीभगत के बिना किया जाए तभी वह अवैध कहलाता है. परन्तु वही कार्य प्रशासन के मेल से किया जाए तो वह वैध हो जाता है. ऊपर कही गई बातें सौ फीसदी सही है. वह कार्य हो रहा हैं, सुशासन बाबू के अपने गृह जिले मुख्यालय बिहारशरीफ में बिहारशरीफ शहर में केबल के माध्यम से करीव आधे दर्जन लोकल समाचार चैनल चल रहे है, जिनका कोई रजिस्ट्रेशन नहीं हैं और ना ही चलाने के लिए किसी ने आदेश दिया है. परन्तु प्रशासन द्वारा इन्हें सरकारी कार्यक्रमों तथा चुनाव के दौरान आयोग द्वारा समाचार संकलन हेतु पास तक उपलब्ध करवाया जाता हैं.
करीब एक दशक पूर्व जिला जिला मुख्यालय बिहारशरीफ में केबल के माध्यम से एक लोकल चैनल का प्रशासन शुरु किया गया था. जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए आधे दर्जन से अधिक हो गई . मीडिया का लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है तथा वह निष्पक्ष होकर कार्य करता है . परन्तु, अवैध रुप से चल रहे लोकल चैनलों की निष्पक्षता पर सवालियाँ निशान लगा हुआ है. ये चैनल वाले आम जनता के विरुद्ध गलत-सलत खबरें दिखा दें तो भी इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ेगा, परन्तु सरकार व प्रशासन के विरुद्ध अगर कोई सही खबरे दिखा दे तो इन चैनलों के प्रसारण पर ही सवालियाँ निशान लग जाता है तथा बंद करने की नौबत आ जाती है.

अवैध कार्य में ही ज्यादा आमदनी होती है , जिसके कारण लोग गलत धंधे करने लगते हैं. करीब एक लाख की पूंजी लगाकर केबल के माध्यम से लोकल समाचार चैनल शुरु कर दिया जाता है .लागत पूंजी से आधी आमदनी हर माह होने लगती है. ऐसे चैनल संचालको को पत्रकारिता के मापदंड से कोई वास्ता नहीं है, उन्हें तो सिर्फ पैसे कमाने से मतलब है. चाहे किसी भी स्तर तक क्यों ना  जाना पड़े.

चैनल संचालको द्वारा रिर्पोटर के नाम पर 2-3 लोगों को रख लिया जाता है. इन कथित रिर्पोटरों द्वारा डरा-धमकाकर विभिन्न संस्थानों से विज्ञापन लिया जाता है. अगर, कोई संस्थान विज्ञापन देने में आनाकानी करता है तो उसके खिलाफ मनगढ़त समाचार चैनल पर दिखा दिया जाता है. प्रत्येक लोकल चैनलों को विज्ञापन से ही करीब शुद्ध आमदनी 50000/- हैं. विज्ञापन कितना मिलता है, इनके चैनल देखने वाले ही खुद क्या करते है. दो समाचार के बाद 3-4 विज्ञापन दिखाया जाता है. अखवारों तथा चैनलों पर विज्ञापन हेतु सरकार द्वारा मापदंड बनाया गया है कि कितना समाचार रहेगा तथा विज्ञापन, लेकिन अवैध रुप से चल रहे चैनलों पर कोई शिकंजा नहीं है. समाचार से ज्यादा विज्ञापन का ही अनुपात है .

इन चैनलों का एक ही सिद्धांत है , आम जनता के बारे में चाहे कितना भी गलत समाचार दिखा दो , परन्तु प्रशासन के बारे में कितना भी सही क्यों ना हो उसे मत दिखाओं. उदाहरण स्वरुप, एक प्रिटिंग प्रेस के संचालक को नकली लेबल छापने के आरोप में गिरफ्तार किया, चैनल वाले दो लोगों को गिरफ्तारी की खबरे अपने चैनल पर तीन दिनों तक चलाते रहे, वह भी वीडियों के साथ. परन्तु, सच्चाई यह थी कि एक ही व्यक्ति पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी. किस आधार पर एक अन्य व्यक्ति का 3 दिनों तक वीडियों दिखाया गया , क्या उसकी छवि को धूमिल करने हेतु, मुक्तभोगी व्यक्ति जाय तो कहाँ , ना रजिस्ट्रेशन नंबर है और ना ही किसी पदाधिकारी के आदेश . पीड़ित व्यक्ति मन मारकर रह जाता है .

भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष की यह टिप्पणी कि ‘‘नीतीश राज में बिहार का मीडिया आजाद नहीं है,‘‘ उक्त अवैध लोकल चैनलों पर पूरी तरह फीट बैठती है. प्रशासन द्वारा कोई भी कार्यक्रम हो, उसे प्रमुखता के साथ 3-4 दिनों तक दिखाया जाता है. वही प्रशासन की विफलता की खबरें खोजने पर भी नहीं मिलेगी इन चैनलों पर.

बताया जाता है कि स्थानीय चैनल के संवाददाताओं द्वारा प्राइवेट कार्यक्रम कवरेज के नाम पर आयोजकों से 500 से हजार रुपये तक वसूला जाता है. राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर चल रहे सेटेलाईट चैनल अपनी जरुरत के अनुसार समाचारों का चयन करते है, कि कौन समाचार दिखाना है या नही, इनके नाम पर पैसा नहीं वसुला जा सकता है. परन्तु लोकल चैनल स्वंय समाचारों का चयन करते है तथा वसूली गई राशि के अनुसार उक्त समाचार का कवरेज दिखाते है.

लोकतंत्र में पक्ष-विपक्ष दोनों की अहम भूमिका रहती है. सरकारी पक्ष द्वारा गलत कार्य करने पर विपक्ष उसका विरोध करता है, ताकि सुधार हो,. परन्तु विपक्ष मौन रहे तो लोकतंत्र की दुर्दशा होना निष्चित ही है.  उसी प्रकार स्वच्छ व निष्पक्ष मीडिया का होना भी जरुरी है. परन्तु, राज्य व जिला प्रशासन के गुण – अवगुण को नजर अंदाज करते हुए स्थानीय लोकल चैनल के संवाददाता सिर्फ प्रशासन पक्षीय समाचार दिखाकर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले स्तंभ की मर्यादा को कुछ रुपये के चक्कर में गला-घोटने पर तुले हुए है.

बताया जाता है कि इन चैनल कर्मियों द्वारा प्रशासन के निकट होने का रौब, आम जनता तथा विभिन्न संस्थानों के संचालकों पर दिखाकर विज्ञापन वसूला जाता है . इन चैनल संचालकों द्वारा ना तो बिक्रीकर और ना ही आयकर सरकार को दिया जाता है . आय-व्यय का व्यौरा भी नही दिया जाता है. सरकार को भी राजस्व का चूना लगाया जा रहा है.

बताया जाता है कि एक आर .टी.आई . कार्यकर्ता ने सूचना के अधिकार के तहत जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी से जानकारी चाही कि बिहार शरीफ शहर में केबल से माध्यम से कितने चैनलों का प्रसारण हो रहा है , इनका निबंधन संख्या, विज्ञापन से आय तथा 2005 के विधानसभा चुनाव में कितने मीडियाकर्मी को चुनाव आयोग द्वारा पास दी गई. पास के संबंधित नामों की सूची मांगी गई . परन्तु , जबाब देना तो दूर, पदाधिकारी ने कथित रुपसे यह कहा कि, जवाब मांगने वाले को औकात बता देगें. संचालकों ने भी उक्त आवेदनकर्ता को धमकी दी कि आप अपना आवेदन वापस ले ले वरना पुलिस व प्रशासन से कहकर अंदर करवा देगे.

जनसम्पर्क पदाधिकारी ने अपीलीय सीमा एक माह की अविध समाप्त हो जाने के ठीक एक माह यानि दो माह के बाद जवाब भेजा , वो भी आधा – अधूरा . जवाब में दो ही चैनल का जिक किया गया है तथा जबकि 6 से अधिक चैनल बिं किसी अनुमति पर स्थानीय केबल पर दिखाए जा रहे हैं. 2005 के विधानसभा चुनाव में निर्गत पास के बारे में उक्त पदाधिकारी ने लिखा है कि अभी सूची उपलब्ध नही है, उपलब्ध होते ही करवा दी जाएगी. परन्तु 4 माह से अधिक बीत गया है परन्तु आज तक जवाब नहीं मिला है .

पदाधिकारी द्वारा जानबुझकर आधा-अधूरा जवाब देना यह ज़ाहिर कर देता है कि प्रशासन की मिली भगत से ही अवैध चैनल चल रहे है. सुशासन बावू के द्वारा कानून का राज चलाने का किया जा रहा दावा पूरी तरह खोखला साबित हो रहा है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.