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खुद मीडिया लिख रहा है अपना मृत्युलेख…

By   /  November 30, 2012  /  3 Comments

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-प्रणय विक्रम सिंह||

मीडिया की भूमिका समाज में चौकीदार की है। जो दिन-रात जागते रहो की आवाज लगा कर सोते समाज को जगाने की कोशिश करता है। हमें समझना चाहिए कि समाज के समस्त परिवर्तनों में सूचना सम्प्रेषण ने केन्द्रीय भूमिका निर्वाहित की है। प्रत्येक जन आन्दोलन सूचना सम्प्रेषण की गतिशीलता व प्रमाणिकता का सहोदर रहा है। सूचना सम्प्रेषण की गतिशीलता और प्रमाणिकता का सयुंक्त उपक्रम पत्रकारिता कहलाता है और उत्तरदायित्व पूर्ण सूचना सम्प्रेषण की अनेक अनुषांगिक विधाओं का समुच्चय मीडिया नामक संस्था को स्वरूप प्रदान करता है। कभी प्रेमचंद, धर्मवीर भारती, माखनलाल चतुर्वेदी इस परम्परा के धवज वाहक थे। आज भी अनेक नौजवान कलमकार और खबरनवीस उसी शहीदी परिपाटी का अनुगमन कर रहे है। किन्तु बदलते वक्त के साथ कलमकारों की स्याही बाजार ने खरीद ली है। मां सरस्वती के वरदपुत्र पूंजी के आंगन में सजदा करने को मजबूर है। लिहाजा जिनकी निगरानी होनी थी वही थानेदार बन गये।

खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया। मतलब मुलजिम ही मुंसिफ बन गये। अब चोर ही साहूकार है। और जब चौकीदार ही चोरी की पटकथा लिखने लगे तो जी-समाचार चैनल व नीता राडिया जैसे काण्डों का प्रकाश में आना सनसनी नहीं पैदा करता हैं। जी समाचार चौनल के दो शीर्ष पत्रकारों की गिरफ्तारी हो गयी है। एक प्रतिष्ठित समाचार चौनल के दो रसूखदार पत्रकारों की उगाही के आरोप में गिरफ्तारी ने मीडिया जगत की साख पर बट्टा लगा दिया है। पत्रिकारिता के दामन को दागदार करता हुआ वह वृत्तचित्र एक मिशन के प्रोफेशन तक बहकते कदमो के भटकते निशानों की दस्तान कह रहा था। वह आपरेशन उस दौर के गुजरने का ऐलान कर रहा था कि जब पत्रकारिता को खबर छापने और दिखाने का पेशा माना जाता था। अब यह खबर न दिखाने ओर न छापने का पेशा है। यही पत्रकारिता का मुख्य धंधा है। इसी प्रचलित रास्ते पर चलते हुए जी न्यूज ने खबर न दिखाने के लिए सौ करोड़ की घूस मांगी। यदि सौ करोड़ रुपये की घूस का यह स्टिंग आपरेशन किसी नेता या अफसर का होता तो तय मानिये ये सारे न्यूज चौनलों की हेड लाइन होती और सारे अखबारों की पहली हैंडिंग होती। आजादी के फौरन बाद हमारे अखबार व्यावसायिक रूप से निर्बल थे, पर वैचारिक रूप से उतने असहाय नहीं थे, जितने आज हैं।
पिछले 65 साल में दुनिया भर की पत्रकारिता में बदलाव हुए हैं। गुणात्मक रूप से पत्रकारिता का ह्रास हुआ है। जैसे-जैसे पत्रकारिता के पास साधन बढ़ रहे हैं, तकनीकी सुधार हो रहा है वैसे-वैसे वह अपने आदर्शों और लक्ष्यों से विमुख हो रही है। ऐसा सारी दुनिया में हुआ है, पर जो गिरावट हमारे देश में आई है वह शेष विश्व की गिरावट के मुकाबले कहीं ज्यादा है।स्वतंत्रता पूर्व से लेकर वर्तमान समय तक मीडिया की भूमिका सदैव समीक्षा के दौर से गुजरती रही है। किंतु मीडिया की उपयोगिता को दृष्टिगत रखते हुए विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र ने इसे चौथे स्तम्भ के रूप में स्वीकार किया है। राष्टड्ढ्रपिता महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रारम्भ हुई पत्रकारिता द्वारा सत्यशोधन का प्रयास वर्तमान तक बदस्तूर जारी है किंतु बदलते वक्त के साथ मीडिया जगत के मूल्यों में भी तरलता परिलक्षित हो रही है। अब पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन की राह पर भटकती नजर आ रही है। खबरों के अन्वेषण के स्थान पर उनका निर्माण किया जा रहा है। निर्माण में सत्यशोधन न होकर मात्र प्रहसन होता है और प्रहसन कभी प्रासंगिक नही होता। वह तो समाज को सत्य से भटकाता है और सत्य से भटका हुआ समाज कभी परम वैभव को प्राप्त नही होता।
शायद भारतीय मीडिया ने अपना मृत्युलेख खुद लिख लिया है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारों की भूमिका बदल गई है। उनके सामने लक्ष्य बदल दिए गए हैं। मीडिया हाउसों ने नए पत्रकारों को पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों से काट दिया है। उनके ऊपर अधकचरी समझ के मैनेजरों को सवार कर दिया है। यह इस देश के पाठक से धोखा है। उसे मीडिया पर भरोसा था और शायद अब भी है, पर वह टूट रहा है। अब मीडिया जगत पर नियंत्रण की अविलंब दरकार महसूस हो रही है। जब वकील बार काउंसिल के नियंत्रण में हैं और किसी भी पेशेवर कदाचार के लिए उनके लाइसेंस को रद्द किया जा सकता है। इसी तरह, डाक्टरों पर मेडिकल काउंसिल की नजर होती है और चार्टर्ड अकाउंटेंट पर चार्टर्ड की इत्यादि। फिर क्यों मीडिया को किसी भी दूसरी रेगुलेटरी अथारिटी के नियंत्रण में आने से एतराज है। मीडिया में समाचारों के प्रसारण के संबंध में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है परंतु मीडिया संगठनों के आर्थिक स्त्रोतों और उसकी कार्यप्रणाली की निगरानी की व्यवस्था करना आवश्यक प्रतीत होता है। जिससे मीडिया के कार्यव्यवहार में स्वतरू ही सुधार दिखाई देने लगेगा परंतु मीडिया के समाचार प्रसारण पर नियंत्रण से अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता का ही हनन होगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि दर्शकों एवं पाठकों ने भी अब जागरूकता प्रदर्शित करनी शुरू की है, सनसनीखेज और टीआरपी की पत्रकारिता को जनता ने नकारना शुरू कर दिया है। यह कांड मीडिया का व्यक्तिगत मसला नहीं है बल्कि यह इस देश की जनता के विश्वास का मसला है। सबको डर है कि यदि उन्होने इस पर मुंह खोला तो पूरा कारपोरेट मीडिया उनके पीछे हाथ धोकर पड़ जाएगा। यह मीडिया का ही आतंक है जिसके नीचे ऐसा जनविरोधी सन्नाटा फैला हुआ है। पर यह सन्नाटा टूटना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. Amit Gambhir says:

    bhai sahab sampoorn visw me agar ghotalo ko napa jay to wah midiyame hi hai be causei am also a media person.

  2. Amrendra Mohan says:

    निशिचत ही इस तरह की घटनाओं से पत्रकारों को बचना चाहिए, इससे पत्रकारिता के स्तर मे गिरावट आती है, सामाजिक मूल्यों का ह्रास होता है, सामाजिक विकृतियाँ, कुरीतियाँ के साथ अनेक प्रकार कि समस्या होती है। यह कटु सती है।.

    लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह भी है की आज एलेक्ट्रोनिक मीडिया के कुछ शीर्ष पत्रकारों को छोड़कर हमारे अन्न पत्रकार जो कि अपने जान जोखिम मे डालकर बिभिन्न समाचारों का संकलन करते है, उन्हे कितना मासिक वेतन मिलता है। इसपर भी विचार होना चाहिए।.

  3. managers ki bhumika jinhe chhote naye patrakaron par thop diya gaya hai.use bistaaaar se batate.lekh kaphi achha tha.dhanyawaadd.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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