/दिल्ली में प्रवासित कश्मीरी पंडितों का एक “हंसमुख, जाना-पहचाना चेहरा” आदिती कौल नहीं रहीं

दिल्ली में प्रवासित कश्मीरी पंडितों का एक “हंसमुख, जाना-पहचाना चेहरा” आदिती कौल नहीं रहीं

-शिवनाथ झा|| 

कल दिल्ली के लोदी रोड दाह-गृह में आदिती (अदिति कौल) अग्नि को सुपुर्द हो गयी। उस सड़क से न जाने कितने बार पिछले दो दशकों में गुजरी थी। आज उसे वहां लाया गया था। बूढ़े माता-पिता, भाई और, मित्रजनों विशेषकर कश्मीर से प्रवासित लोग जो आदिती को ‘दिल से चाहते थे’, सबों की आँखें नाम थी। जैसे जिन्दगी रुक सी गयी हो और सभी ईश्वर को कोष रहे हों उसके “गलत निर्णय’ पर।

मेरी पत्नी नीना (चश्मे में) और आदिती (बैग उठाये): पिछले 13 अप्रैल 2011 को जब शहीद उधम सिंह के पौत्र जीत सिंह को जलियाँ बाला बाग कांड के 92 साल और उधम सिंह को फांसी पर लटकाने के 72 साल बाद नयी जिन्दगी दी गयी – आन्दोलन एक पुस्तक से के तहत, एक किताब के द्वारा.

लोग कहते हैं मृत्यु का कोई समय नहीं होता। ईश्वर जितनी साँसों में इस म्रत्यु-लोक में कार्य संपन्न करने के लिए लोगों को, जीवों को, भेजता है, जो इसे संपन्न कर लिया वह मरने के बाद भी अमर हो गया – लोगों के दिलों। आदिती अपने जीवन के 35 वसंत में यह कार्य पूरी कर ली। यह अलग बात है की इश्वर ने उसे “अपना जीवन जीने का मौका नहीं दिया। हाथों में मेंहदी लगाने का मौका नहीं दिया। शादी का जोड़ा पहनने का मौका नहीं दिया। सिर्फ एक और महीने की तो बात थी। ईश्वर  उसकी अतृप्त इक्षाओं को पूरा करे, उसे शांति दे, प्रार्थना है।

सन 1992 की बात है। पी वी नरसिम्हा राव प्रधान मंत्री थे। आम-बजट की चर्चाएँ चल रही थीं। भारत के महान से महानतम अर्थशास्त्र के हस्ताक्षर देश को नयी आर्थिक नीति के बारे में अपने-अपने विचार दे रहे थे। मैं उस समय आनन्द बाज़ार पत्रिका समूह के “सन्डे पत्रिका” में एक अदना सा संवाददाता था। दिल्ली की धरती पर बस समझें ‘अवतरित’ ही हुआ था। आम तौर पर जब बिहार का कोई “प्राणी” दिल्ली “टपकता” है तो मुखर्जी नगर की ओर ही कदम बढ़ता है – एक आशा और विस्वास के साथ की कोई न कोई मित्र “पनाह” देगा ही, चाहे कुछ दिनों के लिए ही सही। मैं भी उसी श्रेणी में था।

 

नई दिल्ली स्टेशन पर जब “लखनऊ मेल” बिराजी और मैं मुगलों की बस्ती में अपना कदम रखता, तब तक “दिल्ली के दरिंदों” ने मेरे बटुआ का कत्ल्याम कर दिया था। जेब में हाथ डालते ही ऊँगली “कहीं और टकरा गयी”. मैं समझ गया दिल्ली में क्या दर्द है! बहरहाल नई दिल्ली स्टेशन के उस कुली को धन्यवाद देता हूँ जो “बिना मेहनतनामा” लिए मुझे अजमेरी गेट की ओर ले जाकर मुखर्जी नगर का मार्ग-दर्शन किया। अपने छोटे भाई के मित्रों के यहाँ ठिकाना बनाया और फिर अपनी दुनियां बसाने का मार्ग प्रसस्त करने दिल्ली की पत्रकारिता और पत्रकारों की दुनियां में “डुबकी” लगाने निकल पड़ा।

तीसरे दिन जब दफ्तर पहुंचा सभी ने “धनबाद माफिया डॉन” के नाम से स्वागत किया। तत्कालीन संपादक वीर सिंघवी कुछ वरिष्ट पत्रकारों से घीरे गुफ्तु कर रहे थे। लेकिन मेरे “स्वागत गान” को सुनकर हंस दिए और कहे “शिवनाथ फ्रॉम धनबाद, वेलकॉम” उन्ही संपादकों के बीच बैठे थे राजीव शुक्ला साहेब। इनकी पहुँच या यूँ कहें की उनका ‘केमेस्ट्री’ उन दिनों भी सत्ता के गलियारे में “जबरदस्त” था

दुसरे ही दिन मुझे डेल्ही स्कुल ऑफ़ इकोनोमिक्स के महान प्राध्यापक कौशिक बासु से मिलने को कहा गया और उनसे बजट पर सन्डे मैगजीन के लिए लिखने का अनुरोध करने को कहा गया। दफ्तर और घर के रस्ते के बीच कौशिक बासु का विभाग था, इसलिए यह कार्य कुछ “तुरंत में आसान” लगा।

मैं सुबह सुबह डेल्ही स्कुल ऑफ़ इकोनोमिक्स पहुँच गया। उन दिनों मोबाईल फोन का जमाना नहीं था इसलिए मैं घन्टों उनके विभाग में उनका प्रतीक्षा किया – आखिर शिक्षक थे। पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में छात्र-छात्रों का पहनाबा, तौर-तरीका, बात-चीत करने का अंदाज को नजदीक से देखने-परखने-समझने का मौका मिला। मन अन्दर से तो गदगद था क्योकि अक्सर बिहारी छात्र या बिहार के युवक जब दिल्ली टपकते हैं तो इन्हीं बातों को “दिल्ली का धरोहर” लेकर मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा और अन्य पिछड़े जिलों के चौराहे पर झोपड़ी में चलने वाली चाय और कचरी की दुकानों पर बैठकर अपने मित्रों को अनवरत-बार सुनते हैं जैसे कोई “वेद” सुना रहे हों और श्रोता भी टकटकी लगाकर उस “समय का अंदाज अपने मानसपटल पर कर उन्मोदित होते रहते हैं।

बहरहाल, कौशिक बासु से मिलने और अपने संपादक की याचना को सुनाने के बाद नीचे सीढ़ी की ओर बढ़ा ही था की दो आवाज एक साथ टकराई। एक कौशिक साहेब की थी और दूसरी एक कश्मीरी लड़की जो कौशिक साहेब से मिलने की इक्षा रखती थी। उसने कहा “सर, आप कौशिक साहेब से मिलने जा रहे हैं, मैं आपके साथ चल सकती हूँ?” मैंने कहा, आप मेरे साथ क्यों, मैं आपके साथ चलता हूँ। हम दोनों एक-दुसरे को जानते तक नहीं थे। मन अन्दर से “भयभीत” भी था कहीं “कोई चक्कर तो नहीं है? कौशिक साहेब कहीं गुस्सा तो नहीं हो जायेंगे? फिर दोनों कौशिक साहेब के कमरे में गए। एक बार दोनों को उन्होंने देखा और पूछा : “झा साहेब, ये मैडम कौन हैं?” मैंने बेबाक कहा: “सर, ये बाहर खड़ी थीं और आपसे मिलने की इक्षा रखती थी। मैं अन्दर आ रहा था तो इन्होने साथ आने की जिज्ञासा जतायीं।” वह कौशिक साहेब का एक इंटरव्यू लेना चाहती थी।

यही हमारी पहली मुलाकात थी आदिती कॉल से जो कल तरके अपने जीवन का 35 वां वसंत देखे और हाथों में मेंहदी, चूड़ी, शादी का लहंगा लगाये-पहने बिना अपने बूढ़े माता-पिता भाइयों को, पत्रकार मित्रों, विशेषकर कश्मीरी पंडित समूह को छोड़कर “अलविदा” कर दीं। ईश्वर के इस कार्य पर हम कोई “सन्देश” नहीं करेंगे, शायद यही “नियति” थी उसकी, लेकिन “इश्वर काश इशारा किये होते”.

सन 1996 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 दिनों बाद लुढ़क गयी थी, एक दिन हमदोनो भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय के पीछे स्थित दो-कमरे वाले घर में पहुंचे। गोविन्द आचार्य उसी में रहते थे। गोविन्द जी को हम दोनों को बहुत अच्छी तरह जानते थे। मैं 70 के दसक में जब पटना में था और पटना विश्वविद्यालय के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के खजांची रोड स्थित आया जाया करता था, गोविन्द जी हम सभी छात्रों का मार्ग-दर्शन किया करते थे। उस दिन गोविन्द जी अकेले थे और 13-दिनों की सरकार के अस्तित्व पर मंथन कर रहे थे। जैसे ही हमलोग दरवाजे पर दस्तक दिए, गोविन्दजी खिलखिला उठे और बोले “अरे, तुम दोनों आ गए। यशु भाई (मेरा घर का नाम है) आप बहुत दिनों से खिचड़ी नहीं खिलाये, भूख जोरों से लगी है, आप सीधा किचेन में जाएँ। और आदिती को कुछ कागजात दिए जिसे लिखना था। फिर हम तीनो खिचरी और आलू चोखा दबाकर खाए।

 

इसी मंथन के दौरान एक बात सामने आई की इलाहाबाद से कुछ पंडितों को बुलाया गया है (इसका श्रेय मुरली मनोहर जोशी को जाता है), पंडितों ने सलाह दी है की पार्टी कार्यालय के दो गेटों में से एक को, जो अभी खुली था और आम-रास्ता था, को बंद कर दुसरे गेट को, जिसमे लगे ताले में जंग लग गयी है और मुद्दत से बंद पड़ा है, उसे कार्यालय में आने-जाने का रास्ता बनाया जाये। मैंने गोविन्द जी से पूछा ऐसा क्यों? गोविन्द जी तराक से जबाब दिए – “पंडितों का कहना है की इस गेट के सामने पीपल का एक बृक्ष, जो अवरोधक है सत्ता के लिए। इस बृक्ष अब भी काट देने की सलाह दी गयी है। अब तो सत्ता भी वास्तु से चलता है, मानव-कल्याण पिछली सीट पर चली गयी है।”

मैं उन दिनों इंडियन एक्सप्रेस (दिल्ली) में कार्य करता था। शाम में दफ्तर पहुंचा तो राजकमल झा से इस बात की चर्चा की। वे उछल गए और मैथिलि में उन्होंने कहा: “शिवनाथ, अहाँ की की देखैत छी। जबरदस्त कहानी। आ ई कहानी में गोविन्द जी के कोट – सोना में सुहागा”. उस दिन वह कहानी एक्सप्रेस के फ्लायर में छपा। दुसरे दिन जब हम और आदिती मिले तो मंडी हॉउस के चौराहे पर लोट-पोट कर हंस रहे थे।

1998 लोक सभा चुनाब के दौरान आदिती को बी जे पी  मेनिफेस्टो विभाग में बुलाया गया जिसे सभी पार्टियों की मेनिफेस्टो पर मंथन करना था। उसी सप्ताह मिली और बोली: “सर ये पार्टी के लोग कितने चोर होते हैं। सभी पार्टी के मेनिफेस्टो को पढ़ते हैं और अच्छी-अच्छी बातों को जो सभी पार्टियाँ लोगों को लुभाने के लिए बनती है, अपने-अपने शब्दों में रोचक बनाकर अपना मेनिफेस्टो बना लेते हैं”

कश्मीरी आतंकवादियों के दहशत से अपनी जमीं को छोड़कर पलायन किये लाखों कश्मीरी पंडितों के परिवारों में एक आदिती के माता-पिता भी थे जो दिल्ली में अपना ठिकाना ढूंढ़ रहे थे। आदिती सबसे बड़ी थी और इसके दो छोटे भाई थे। लेकिन अपनी मेहनत, तपस्या से धीरे-धीरे सपनों को समेत कर एक घर का रूप दी इसने अपने माता-पिता के साथ। सभी बड़े हुए, पढ़े-लिखे और रोजी रोजगार में लगे।

1992 के बाद 2012 तक शायद ही कोई बात हमारे घर का होगा जो वह नहीं जानती थी। जब आकाश का जन्म हुआ तब घर आई और आकाश को एक “खिलौना” दिया, आज उस खिलौने के साथ आकाश दिन-भर रोया।

पिछले महीने जब उससे मुलाकात हुयी तो बहुत खुश थी। मैंने पूछा “क्या बात है?” उसने कहा की “जल्द ही आपको कुछ अच्छा खबर मम्मी देगी।” मैं इशारा समझ लिया। आज भी भारत में बहुत ऐसी लड़कियां हैं तो खुले विचार के होने के बाबजूद “शादी” के मामले अपने माता-पिता के फैसले पर निर्भर करती है। उसकी शादी जनवरी के आसपास होने वाली थी। पर ऐसा नहीं हुआ। ईश्वर को मंजूर नहीं था। अब ईश्वर के निर्णय को भारत के किसी अदालत में चैलेन्ज तो नहीं किया जा सकता। लेकिन ईश्वर को कल भले ही अपने निर्णय पर पश्चाताप नहीं हुआ हो इस मासूम की जिन्दगी को लेकर, परन्तु कल वह भी पछतायेगा अपने कर्मो पर, अपनी गलतियों पर।

हमारी श्रद्धांजलि है आदिती कौल को.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.