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विज्ञापन के नाम पर रंगदारी कितना सही?

By   /  December 2, 2012  /  2 Comments

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– सिंगरौली से अब्दुल रशीद||

हम एक ऐसे सनसनीख़ेज दौर से गुजर रहें हैं जहां हर कोई सनसनी फैला कर देश का नायक और लोकप्रिय नेता बनने की हसरत रखता है. तो क्या यह मान लिया जाए के महज सनसनी फैलाकर कोई नायक बन सकता है? शायद नहीं, क्योंकि जो देश का नायक होता है उसकी जिंदगी एक खुली किताब की मानिंद होती है जिसमें उसके अच्छे – बुरे सभी कर्मों का लेखा जोखा होता है, और उसी लेखा जोखा के आधार पर लोक तय करता है की देश का नायक बनने योग्य है या नहीं. यानी सनसनी फैलाकर सस्ती लोकप्रियता तो हासिल कि जा सकती है लेकिन देश का नायक नहीं बना जा सकता. यदि हम अपने देश के इतिहास पर नजर डाले तो यह बात आईने की तरह साफ नजर आती है कि हमारे देश को आजादी दिलाने वाले और दुनियाँ को आईना दिखाने वालो ने जो किया वह अपने देश को आजादी दिलाकर सम्मानपूर्वक दुनियाँ के सामने सर उठाकर जीने का हक दिलाने के लिए किया. ऐसा करने में लेसमात्र भी उनका निज स्वार्थ नहीं था.
देश में आज जो हलचल है उसका कारण है ईमानदारी पर लालच का और कर्म पर निज स्वार्थ का हावी होना. यही लालच और स्वार्थ है जो हमारे देश के नेताओं को देश के प्रति उनके कर्म और जिम्मेंदारी भरे पथ से भटका रहा है नतीजा आए दिन एक नए घोटाले का सामने आना. यही लालच और स्वार्थ है जो खबर लेने वाले खबरची को भी खबर बना दिया. जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया को उनके कृत ने उस काल कोठरी में पहुंचा दिया जो गुनेहगार लोग की मंजिल है. इससे बड़ी त्रासदी पत्रकारिता जगत के लिए क्या होगी के संपादक, जिन्हें बुद्धिजीवी वर्ग में श्रेष्ठ स्थान दिया जाता है उन्हें कठघरे और सवालों के घेरे में उन कारणों से पहुंचना पड़ा जो अनैतिक व कुकृत्य में शुमार है. सच क्या है सबके सामने आना ही चाहिए. खुद मीडिया जगत से जुड़े लोगों को भी पहल करना चाहिए ताकि पत्रकार से बने रंगदार लोगों को बाहर का रास्ता दिखाकर पत्रकारिता जगत को शर्मसार होने से बचाया जा सके और आम जनता का भरोसा बरकार रहे.
इन सवालों को भी टटोलना चाहिए के क्या जिंदल पाक – साफ है या नहीं आखिर उन्होनें मीटिंग का स्टिंग क्यों किया या क्या वज़ह थी स्टिंग कर सरेआम करने का. क्या कभी उन्होनें ने किसी कार्पोरेट मीडिया को इससे पहले कभी कुछ नहीं दिया या महज लोकप्रियता और मीडिया को बदनाम करना ही उनका मकसद था. ज्ञात हो कि नवीन जिंदल ने 25 अक्टूबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक स्टिंग ऑपरेशन की सीडी दिखाई और दावा किया था कि जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया उनसे खबर रुकवाने के बदले सौदा करने की कोशिश की..नवीन जिंदल ने आरोप लगाया था कि सितंबर से कोयले के आवंटन के मामले में जी न्यूज पर हमारी कंपनी के खिलाफ लगातार गलत खबरें दिखाई जा रही थीं और जब हमने इस बारे में जी न्यूज से बात की तो पहले हमसे 20 करोड़ रुपये मांगे गए. बाद में ये रकम बढ़ाकर 100 करोड़ कर दी गई.
यदि खबर गलत थी तो जिंदल को अदालत का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए था. लेकिन उन्होनें ऐसा न करके ऐसा रास्ता अपनाया जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टुटे. बहरहाल इस घटना के बाद कार्पोरेट मीडिया शर्मशार हुआ और कार्पोरेट नायक बन बैठा. यह बात भी आम हो गया कि खबरों के खेल में पर्दे के पीछे क्या है? यह मीडिया के स्वतंत्रता पर हमला नहीं बल्कि मीडिया का भी मोह माया के कुचक्र में फंसने का प्रमाण है. यह बात भी किसी से छुपी नहीं कि कार्पोरेट मीडिया किस हद तक कार्पोरेट जगत का साथ निभाता रहा है. हां, यह बात बेहद चौकाने वाला है के जिस कार्पोरेट का साथ दिया उसी कार्पोरेट ने कार्पोरेट मीडिया के काले कारनामों को सरेआम कर दिया.
यह घटना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले के लिए सबक भी है के चाहे कोई भी कितना भी उड़ान क्यों न भर ले कानूनन जो गलत है वह गलत है. जहां अब एक ओर सच को लोक के सामने लाने की जिम्मेंदारी है वहीं अब खुद को पाक – साफ रखने की चुनौती भी है. पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों को इस बात पर गम्भीर होकर विचार करना ही होगा कि पत्रकार और साहुकार का साथ न तो देश हित में है और नहीं पत्रकारिता जगत के सम्मान के लिए? क्योंकि जिन्हें दौलत की भूख है उनके लिए कुछ भी बेचना नामुमकिन नहीं बस कीमत मिलनी चाहिए.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Ashok Sharma says:

    patrakar nahin dalal bolo bhai.

  2. ashok sharma says:

    मीडिया मे दलाल गुंडे भर्ती अधिक संख्या में हो गए हैं इस लिऐ पत्रकरिता का स्तर गिरता जा रहा है

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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