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क्योकि मुआवजा इंसाफ नहीं होता…

-प्रणय विक्रम सिंह||

आज से 28 वर्ष पूर्व 2 और 3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात यूनियन कार्बाइड से निकली जहरीली गैस ने एक ही रात पांच हजार से अधिक लोगों को मौत की नींद सुला दिया. और 500,000 से ज्यादा भोपाल निवासियों को कई-कई तरह की घातक बीमारियां दे दीं. ऐसी-ऐसी बीमारियां जिसे सुनकर-देखकर मन का हर भावुक तार झनझना उठे. कोई हमेशा के लिए अपाहिज हो गया, किसी की जिंदगी में आँखें सिर्फ अंधेरों से उलझने के लिए बची है. अंदरूनी रोगों की तो कोई गिनती ही नहीं है.  त्रासदी इतनी भयंकर थी कि भोपाल की सडकें, चौराहे, पार्क लाशों से भरे थे. कब्रगाह और श्मशान घाटों में अंतिम क्रियाकर्म के लिए स्थान ही नहीं बचा था. अस्पतालों के शवगृह भर चुके थे. पोस्टमार्टम करने वाले हाथ थक चुके थे, पर मौत थी कि शहर को निगल जाने के लिए आमादा थी. दो-तीन दिसंबर की रात यूनियन कार्बाइड के टैंक-610 से निकली गैस का प्रभाव इतना घातक होगा, इसे किसी ने सोचा न था. शहर में मौत का तांडव हिरोशिमा और नागासाकी की याद दिला रहा था.

इस भयावह हादसे में मरने वालों की संख्या बढ़ते बढ़ते करीब सोलह हज़ार हो गयी तथा जो लोग इस त्रासदी में मरने से बच गए थे, उनमें से कई तो तिल-तिल कर मर गए और  जो लोग अब भी बचे हैं वे अपनी बीमारियों को लेकर अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं. इस त्रासदी से सिर्फ उस समय की पीढियों के लोग ही प्रभावित नहीं हुए बल्कि उसके बाद पैदा हुई पीढियां भी इसके असर से अछूती नहीं रहीं. त्रासदी के बाद भोपाल में जिन बच्चों ने जन्म लिया उनमें से कई विकलांग पैदा हुए तो कई किसी और बीमारी के साथ इस दुनिया में आए और अभी भी आ रहे हैं. बीसवीं सदी की इस भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के गुनहगारों को सजा दिलाने का मामला अभी भी कानूनी और प्रकारांतर से राजनीतिक झमेलों में उलझा हुआ है. पच्चीस साल तक लगातार चली न्यायिक प्रक्रिया में राज्य की सरकारों ने यूनियन कार्बाइड के अध्यक्ष वारेन एंडरसन को प्रकरण से बाहर निकलने का पूरा मौका दिया. दीगर है कि घटना के चार दिन बाद एंडरसन 7 दिसंबर 1984 को यूनियन कार्बाइड की खोज खबर लेने भोपाल आया था. जहां उसे कानूनी तौर पर गिरफ्तार कर पच्चीस हजार रुपये के मुचलके पर इस हिदायत के साथ छोड़ा गया था कि न्यायिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए वह समय-समय पर जरूरत के अनुसार भारत आता रहेगा, पर एंडरसन कभी भारत वापस नहीं आया.

उसके बात भारत की सक्षम न्यायपालिका ने उसे भगोड़ा करार दे कर अपने न्याय की हदों की मुनादी कर दी. यहां सवाल यह खड़ा हो सकता है कि हादसे तो होते रहे हैं और हर हादसा अपने पीछे तबाही का यही नर्क छोडकर जाता है फिर इसमें नया क्या है? नया यह है कि यह हादसा प्रकृतिजन्य नहीं वरन मानवजनित है. नया है 25 साल बाद हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था का वह अट्टहास जिसे फैसले का नाम दे कर अपने ही देश के रोते-झुलसते तिल-तिल मरते पीडि़तों के गाल पर एक तमाचे की तरह जड़ा गया और उसके बाद एक रही-सही उम्मीद भी डबडबाती आंखों के साथ धुंधली हो जाती है. लेकिन सच मरता नही है. दर्द से बिलखती नम आंखो में तैरती इंसाफ की ख्वाहिशें सच को सामने आने पर विवश कर ही देती हैं. देश की सबसे बड़ी गैस त्रासदी से जुड़ा कड़वा सच बाद में सामने आया है. भोपाल के तत्कालीन डीएम मोती लाल सिंह ने खुलासा किया कि सूबे की सरकार ने गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी एंडरसन को बचाने का पूरा प्रयास किया था. उनके अनुसार 7 दिसंबर 1984 की सुबह एंडरसन भोपाल आया था लेकिन उसी शाम को राज्य सरकार के भारी दबाव के चलते उसे चार्टर्ड प्लेन से वापस दिल्ली भेज दिया गया. मोती लाल सिंह ने कहा कि उस समय राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और राज्य के मुख्य सचिव ब्रम्ह स्वरूप थे. जिनके दिशा निर्देश पर एंडरसन को पकडकर छोड़ दिया गया और सही सलामत दिल्ली भेजा गया. उन्होंने राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि 7 दिसंबर को एंडरसन को पकडकर विमान से भोपाल लाया गया था लेकिन उस दिन सचिव ब्रम्ह स्वरूप ने अपने कमरे में हमें बुलाकर यह निर्देश दिया कि एंडरसन को सही सलामत वापस भेजना है, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी.

सचिव ने कहा कि एंडरसन को भोपाल एयरपोर्ट से ही वापस भेजना है, जिसके बाद एक चार्टर्ड विमान की व्यवस्था करके उसे दिल्ली भेज दिया गया. सत्ता के शिखरों पर चलने वाली धोखेबाजी, सौदेबाजी, साजिशों और बईमानी की अंतहीन कहानी का यह एक नमूना भर है. इसमें एक हाईप्रोफाइल सनसनीखेज धारावाहिक का पूरा पक्का मसाला है. गैस त्रासदी आजाद भारत का अकेला ऐसा मामला है, जिसने लोकतंत्र के तीनो स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया है. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कई अहम ओहदेदार एक ही हमाम के निर्लज्ज नंगों की कतार में खड़े साफ नजर आए. इस त्रासदी पर एक पत्रकार की अंग्रेजी में लिखी पुस्तक के कवर के चित्र को मैने देखा. इस त्रासदी की भयावहता और खौफ को उजागर करने के वह लिए काफी था. देखने के बाद कलेजा मुंह को आ रहा था. कवर में एक मृत शिशु का चित्र था, पथरायी आंखों वाला मृत शिशु का शव जिसे पिता के हाथ जमीन में दफना रहे हैं. रोंगटे खड़े कर देने वाला वही चित्र अब अखबारों में उन लोगों के बैनरों में दिख रहा है जो भोपाल गैस त्रासदी पर आये फैसले से नाखुश हैं और जगह-जगह इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

जिस किसी भी इंसान में तनिक भी इंसानियत या संवेदना है उसके दिल को हिला देने के लिए वह चित्र ही काफी है. पर पता नहीं सरकारों का दिल क्यों नहीं दहला. आखिर वक्त रहते वारेन एंडरसन के प्रत्यर्पण की गंभीर कोशिश क्यों नहीं की गयी? उसके बाद भी जो दोषी पाये गये उन्हें इतनी कम सजा क्यों दी गयी? होना तो यह चाहिए था कि इस गंभीर अपराध के लिए ऐसी सजा दी जाती जो आने वाले वक्त के लिए सबक होती और जिसके खौफ  से कोई निरीह लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने से डरता. आखिर ऐसा क्यों नहीं हुआ?  पीडि़तो के लिए इंसाफ की गुहार कर रहे संगठन आज अपनी लड़ाई को महज मुआवजे तक सीमित कर रहे हैं जबकि लडाई इंसाफ  पाने की चल रही है. हम एक विशेष प्रकार की मुआवजावादी मानसिकता के शिकार होते जा रहे हैं. हम इस विषय पर तनिक भी चिंतन नहीं करना चाहते कि मुआवजा इंसाफ नहीं है. मुआवजा इंसाफ नहीं होता है.

(लेखक पत्रकार हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.