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अभिव्यक्ति को सार्थक बनाएं, सार्वजनीन भाषा का इस्तेमाल करें

By   /  December 11, 2012  /  1 Comment

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– डॉ. दीपक आचार्य||
वैचारिक सम्प्रेषण के लिए अभिव्यक्ति ही सशक्त माध्यम है और अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सशक्त माध्यम है वाणी। यह वाणी ही है जो व्यक्ति के मन और मस्तिष्क की गहराई और भारीपन को दर्शाती है। इसके साथ ही वाणी के ही माध्यम से व्यक्ति के स्वभाव, बौद्धिक क्षमता और जीवन के सामथ्र्य की थाह पायी जा सकती है
वाणी व्यक्ति के चाल-चलन और चरित्र के साथ ही औदार्य और समरसता के स्तरों को भी प्रकटाती है। जो व्यक्ति जितना अधिक उदार और धीर-गंभीर होता है उसकी वाणी का प्रभाव और सम्प्रेषण दोनों ही प्रभावी होते हैं।
अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम वाणी का इस्तेमाल किस प्रकार, कहाँ और किस विलक्षणता और माधुर्य के साथ किया जाए, इसका निर्धारण वे लोग अच्छी तरह कर पाते हैं जिन्हें अभिव्यक्ति के प्रभावों और सम्प्रेषण विधाओं के लक्ष्य संधान गुणों के बारे में पता होता है।
अलग-अलग प्रान्तों और क्षेत्रों के बारे में यह स्पष्ट कि हर बारह कोस पर बोली बदलती है, फिर क्षेत्रों के हिसाब से भाषाओं का परिवर्तन भी हर तरफ देखने को मिलता है। जो जहां के स्थानीय बाशिन्दे हैं वे वहाँ की बोली या भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं।
आंचलिक बोली या भाषा में अभिव्यक्ति उन लोगों के लिए ही सुबोधगम्य, श्रवणीय और सहज होती है जो लोग उन्हीं क्षेत्रों में रहते हैं अथवा उन क्षेत्रों की बोली या भाषा को समझने की सामथ्र्य रखते हैं। ऎसे में अभिव्यक्ति का माध्यम स्थानीय बोली या भाषा तभी होनी चाहिए जब बोलने और सुनने वाले दोनों ही उस बोली या भाषा के जानकार हों।
आम तौर पर बहुत सारे लोगों का स्वभाव होता है कि वे अपनी ही बोली या भाषा में बातचीत करने के आदी हो जाते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सामने वाला उस बोली या भाषा को समझ भी पा रहा है अथवा नहीं।
ऎसे लोग सरकारी से लेकर गैर सरकारी क्षेत्र, अथवा आमजन वर्ग, सभी में हो सकते हैं। ऎसे मामलों में एकतरफा संवाद ही हावी रहता है और अभिव्यक्ति अपना कुछ ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाती है।
बोली या भाषा वही प्रभावी और धारदार होती है जिसे सामने वाला व्यक्ति या लक्ष्य समूह अच्छी तरह समझ सके और जवाब देने की स्थिति में न हो तब भी सोचने और समझने की स्थिति में आ जाए।
आँचलिक बोली या भाषा अपना सीधा और पूर्ण प्रभाव तभी छोड़ते हैं जब दोनों ही पक्ष इसके जानकार हों। आंचलिक बोलियों और भाषाओं का तभी ज्यादा प्रभाव भी सामने आता है।
अभिव्यक्ति को प्रभावी बनाने के लिए और अपनी सम्प्रेषण क्षमता का पूरा-पूूरा लाभ पाने के लिए यह देखना जरूरी है कि हम जहाँ हैं या रहते हैं वहाँ किस बोली या भाषा का प्रभाव है। उसी के हिसाब से अपनी अभिव्यक्ति करें।
क्षेत्र विशेष की भाषा या बोली से अनभिज्ञ होने या अस्पष्ट समझ मात्र ही बन पाने की स्थिति में हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषी क्षेत्रों में आंग्ल भाषा का इस्तेमाल करें ताकि हमारी अभिव्यक्ति का सटीक लाभ प्राप्त हो सके।
अपनी आंचलिक भाषा में अभिव्यक्ति करना अच्छी बात है लेकिन वह तभी तक अच्छी है जब तक अपने लोगों के बीच की जाए। भाषा का सर्वोपरि उद्देश्य अपने विचारों से सामने वाले को अवगत कराना अथवा समझाना ही है और ऎसे में जो कुछ कहा जाए वह सामने वाले की समझ में तभी आ सकता है जब उसकी भाषा या बोली में बात की जाए।
आजकल अक्सर देखने में आता है कि लोग जहाँ कहीं अपने क्षेत्र के लोगों से मिलते हैं वहाँ अपनी आंचलिक बोली या भाषा में चर्चा करते हैं। यह चर्चा तभी तक ठीक रहती है जब तक श्रोता और वक्ता दोनों की भाषा एक ही हो।
कई बार लोग दूसरों से मिलने पर अपने साथियों की भाषा अनभिज्ञता का ख्याल नहीं करते हैं और दूसरों से मिलने पर आंचलिक बोली का प्रयोग करने में रम जाते हैं।
इस समय ये लोग भूल जाते हैं कि उनके आस-पास जो लोग रहते हैं अथवा हैं, उनके लिए यह सबसे खराब स्थिति होती है तथा शब्दों की अभिव्यक्ति के बावजूद मूकाभिनय जैसा माहौल बन जाता है। ऎसा करना न हमारे लिए अच्छा होता है न उनके लिए।
अतः यह तय करना जरूरी है कि हम जिस किसी से बात करें, उससे उसी भाषा या बोली में बात करें जिसके प्रति सामने वाले की समझ हो। इसके साथ ही जहाँ हम समूहों में रहते हैं वहाँ भिन्न-भिन्न भाषा भाषी होने कीर् स्थिति में उस सार्वजनीन भाषा या बोली में ही बात करें जिसे सभी लोग समझ पाएं।
ऎसा नहीं कर एकतरफा भाषा या बोली का इस्तेमाल करना अभद्रता की श्रेणी में आता है, इससे हमारा व्यक्तित्व कमजोर होता है। भाषा या बोली के माध्यम से अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण कौशल भी व्यक्तित्व को निखारने का सशक्त माध्यम है, यह बात हम सभी को अच्छी तरह याद रखनी होगी।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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