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लाई डिटेक्टर पर पत्रकारिता…

By   /  December 14, 2012  /  4 Comments

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-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

स्वतंत्रता की लड़ाई में जितनी लड़ाई स्वतंत्रता सेनानियों और सैनिकों ने बंदूक और तलवार से लड़ी थी कमोबेश उतनी ही लड़ाई कलम के सिपाही पत्रकारों ने भी लड़ी थी. जिस देश में पत्रकारिता और पत्रकार का हद दर्जे का सम्मान प्राप्त हो, जहां पत्रकार की कलम से लिखे शब्दों और मुंह से निकले वाक्यों को सत्य से भी बढक़र माना जाता हो वहां पत्रकारों के लाई डिटेक्टर टेस्ट की चर्चा होना सोचने को विवश करता है कि  स्वतंत्रता के 65 वर्षों में मिशन मानी जाने वाली पत्रकारिता अर्श से फर्श तक पहुंच गई है, वाकया ही यह बड़ी गंभीर स्थिति है. Jindal-accuses-Zee-Newsजी न्यूज और जिंदल ग्रुप का मामले में पूरे पत्रकारिता पर ही बड़ा सा प्रश्न चिंह लगा दिया है. कारपोरेट दलाल नीरा राडिया मामले में मीडिया अभी सदमें से पूरी तरह उभर भी नहीं पाया  था कि जी न्यूज के मामले ने एक बार फिर पत्रकारिता और पत्रकारों की गर्दन नीचे करने वाला काम किया है. दो व्यवसायिक ग्रुपों के विवाद में पत्रकारिता जिस तरह से पिस और बदनाम हो रही है वो किसी भी दृष्टिïकोण से स्वस्थ लक्षण और संकेत नहीं है. पहले भी मीडिया पर ब्लैकमेलिंग से लेकर पेड न्यूज और खबरें दाबने, न छापने और मुद्दों और मसलों को घुमाने-फिराने के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन जी न्यूज और जिंदल ग्रुप के मामले में जिस तरह तथ्य  सामने आ रहे हैं उससे लोकतंत्र के चौथे खंभा कटघरे पर खड़ा दिखाई दे रहा है और हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि पत्रकारिता लाई डिटेक्टर तक पहुंच चुकी है. वर्तमान व्यवसायिक युग में पत्रकारिता भी मिशन की बजाय व्यवसाय का रूप धारण कर चुकी है. जब पत्रकारिता को कारपोरेट और मैनेजर संभालने लगे हैं तो जी और जिंदल ग्रुप जैसे मामले भविष्य में भी देखने, सुनने को मिलेंगे इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है. लेकिन इस सारी भागमभाग और धंधेबाजी के बीच समाज और देश को दशा और दिशा दिखाने वाली पत्रकारिता के दामन पर जो कीचड़ उछला है उसका खामियाजा पत्रकारिता को भुगतना पड़ेगा.

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अहम् प्रश्न यह है कि वास्तिवक गुनाहगार कौन है. जी ग्रुप के नीति-निर्माता, कोयले की दलाली में काले हाथ लिये जिंदल गु्रप या फिर पत्रकार और पत्रकारिता? इन तमाम प्रश्नों के उत्तर भविष्य के गर्भ में छिपे हैं और ये गहन जांच का विषय भी है. मामला अदालत में है इसलिए टीका-टिप्पणी ठीक नहीं है. दो कारपोरेट दिग्गज या घराने आपस में प्रतिस्पर्धा रखें तो कोई बड़ी या नयी बात नहीं है लेकिन दो धंधेबाजों के बीच में पत्रकारिता की चटनी बनाई जाए ये लोकतंत्र के लिए घातक है. पिछले दो तीन दशकों में धीरे-धीरे कारपोरेट घरानों का आधिपत्य हो चुका है. मीडिया के गिने-चुने परंपरागत घराने भी धंधेबाजी पर उतर आए हैं और धंधे में जमे और बने रहने के लिए तमाम वो हथकंडे अपनाने लगे हैं जो एक व्यापारी और उद्योगपति अमूमन करता है. लेकिन इस सारी धंधेबाजी और व्यापार के बीच इस बात का ध्यान भी धंधेबाजों को नहीं रहता है कि वो खबरें बेचने का काम करते हैं चीनी, शराब या कार नहीं. खबरे किसी के लिए व्यापार और रोजी-रोटी का जरिया तो हो सकती है लेकिन फिर भी वो तमाम दूसरे व्यवसायों और धंधों से बिल्कुल अलग है. इस व्यापार की शुरूआत मिशन के साथ होती है और जो समाज और राष्टï्र के प्रति पूरी तरह जिम्मेदार है. एक छोटी सी खबर देश में क्रांति ला सकती है, युद्घ करवा सकती है और दीवाली का धूम-धड़ाका भी करवाने में पूरी तरह सक्षम है. बदलते दौर में पत्रकारिता व्यवसाय तो बन गयी है लेकिन इसकी जिम्मेदारियां, कर्तव्य और उत्तरदायित्व कम होने की बजाय बढ़े हैं. खबरों को कारपोरेट करने वाले बड़े मैनेजर इसी सूक्ष्म अंतर को भूल जाते हैं और विरोधी को पटखनी देने और आगे बने रहने की चाहत और दौड़ में खालिस धंधेबाजी पर उतर आते हैं. जिसमें सुधीर चौधरी और समीर आहुलवालिया जैसे खबरों के महत्वकांक्षी सौदागर संपादक मददगार साबित होते हैं और पूरी पत्रकारिता के मुंह पर कालिख पोतने का काम करते हैं.

14881074_Subhash-Chandraजी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा और जिंदल गु्रप के नवीन जिंदल दोनों हरियाणा निवासी है. पिछले तीन दशकों में सुभाष ने चावल के धंधे से चैनल तक अपनी  पहुंच बनाई है तो वहीं किसी जमाने में स्टील के बर्तन के छोटे कारोबारी स्वर्गीय उोम प्रकाश जिंदल के पुत्र नवीन जिंदल का कुछ वर्षों में स्टील किंग बन जाना खालिस धंधे बाजी के सिवाय और कुछ नहीं है. एक व्यवसायी और उधोगपति की भांति इन दोनों महानुभावों ने अपना साम्राज्य फैलाने के लिए हर वो हथकंडा अपनाया जिससे धंधे में चौखा मुनाफा कमाया जा सके. किसी जमाने में चावल का कारोबारी सुभाष चंद्रा अपनी आदत से बाज नहीं आया और चावल की भांति खबरों की भी खरीद-फरोख्त से बाज नहीं आया और बली का बकरा बने पत्रकार. ऐसा कैसे संभव है कि 100 करोड़ के डील की बात ज़ी न्यूज़ के संपादकों की तरफ से किया जा रहा हो और मालिक अनजान हों. फिर यह भी गौरतलब है कि सुधीर चौधरी और समीर आहुलवालिया अपने लिए नहीं बल्कि ज़ी न्यूज़ के लिए ही खबरफरोशीकर रहे थे. दूसरी बात कि यदि सुभाष चंद्रा को अपने संपादकों द्वारा की जा रही खबरों के सौदेबाजी की जानकारी नहीं थी तो बिना किसी जांच के आनन- फानन में क्लीनचिट क्यों दे दिया गया. और सिर्फ क्लीनचिट ही नहीं, बल्कि बाकायदा ज़ी न्यूज़ पर मीडिया का सौदानाम से स्पेशल प्रोग्राम चलाने की इजाजत दी गयी. अपने दागदार संपादकों को बचाने के लिए ज़ी न्यूज़ ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया. क्या यह संदेहास्पद स्थिति नहीं है?

मीडिया मैनेज होता है, मीडिया खबरों को घुमाता-फिराता है, पैड न्यूज, येलो जर्नलिज्म पत्रकारिता के बदरंग चेहरे हैं.  लेकिन जिंदल ग्रुप को ब्लैक मेलिंग के मामले पर मीडिया का बदसूरत और बेशर्म चेहरा एकबार फिर बेनकाब हुआ है. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कारपोरेट, नीरा राडिया और मीडिया के बड़े पत्रकारों की जुगलबंदी उजागर हुई थी. 2007 में लाइव इण्डिया के पत्रकार प्रकाश सिंह ने राजधानी के एक सरकारी स्कूल की टीचर उमा खुराना का स्टिंग आपरेशन किया था कि तथाकथित टीचर स्कूल की छात्राओं को वेश्यावृत्ति के लिए सौदेबाजी करती है. तब इस मामले को लेकर खूब हल्ला मचा था. पुलिस जांच में सारा मामला जाली और झूठा पाया गया था. उस समय जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी चैनल के सर्वेसर्वा थे. अभी हाल ही में असम में एक लडक़ी के साथ हुई छेड़छाड़ की घटना में पत्रकारों को भी अभियुक्त बनाया गया है. ये वो चंद गंदी मछलियां हैं जिन्होंने पत्रकारिता के पूरे तालाब को गंदा कर रखा है. ऐसे में पत्रकारिता और पत्रकार को अपने लिए स्वंय लक्षमण रेखा खींचनी होगी. क्योंकि इस सारे गंदे खेल और काले धंधे में पत्रकारिता और पत्रकार की हैसियत एक मामूली पयादे से अधिक नहीं है. लेकिन यकीन मानिए कि जब तक सुभाष चंद्रा जैसे सफेदपोश खलनायक रहेंगे तब तक खबरफरोशी का ये धंधा ऐसे ही बदस्तूर जारी रहेगा और खबरों की सौदेबाजी करने वाले सुधीर चौधरी जैसे संपादक पैदा होते रहेंगे और खबरों की खरीद-बिक्री और ब्लैक मेलिंग का ये धंधा अनवरत चलता रहेगा और पत्रकारिता लाई डिटेक्टर टेस्ट से गुजरती रहेगी.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. Ak Jain says:

    I like it because channels are blackmailing govt officers, showing only paid news, no courage to comment on ruling party leaders., Jindal and Subhash Chandra are on the same track of corruption.thanks to media darbar for such truth.

  2. ashok sharma says:

    मीडिया के दलालों को ये सबक सिखाना जरुरी था

  3. suraj sharma says:

    90% patrkaar chor hi and every body knows .

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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