/प्रतीक्षा की घड़ी निकट आ रही है…

प्रतीक्षा की घड़ी निकट आ रही है…

विनायक शर्मा||

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों की मतगणना २० दिसंबर को गुजरात के चुनावों की मतगणना के साथ ही करवाने का निर्णय चुनाव आयोग ने लिया है. हिमाचल विधानसभा के चुनावों की भांति इसके परिणाम भी बहुत अभूतपूर्व, अप्रत्याशित और दूरगामी होने की सम्भावना लग रही है. election_SL_3_11_2012अधिकतर निर्वाचन क्षेत्रों में जय-पराजय का निर्णय बहुत कम मतान्तरों से होगा व मतों का विभाजन कुछ इस प्रकार से होगा कि अनेक धुरंधर धराशाही होंगे और दो की लड़ाई में कोई तीसरा बाजी मार ले जाये इस सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता है. एक ओर जहाँ  समय रहते कांग्रेस का कुनबा वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में किसी हद तक एक हो गया या यूँ कहिये की एक दिखाई देने के प्रयत्न में लग गया था, वहीँ चुनावों तक भाजपा की स्थिति बदतर ही हुई. मेरा अपना अनुमान है की विभिन्न कारणों से भाजपा के दो से चार प्रतिशत जनसंघ के ज़माने से चले आ रहे परम्परागत मतदाताओं ने पहली बार “ यह सरकार जानी चाहिए” की आवाज के साथ भाजपा के खिलाफ मतदान किया है. अपनों के मुख से यह नारा क्या सन्देश देता है ? ऐसे में परिणाम कितने घातक रहनेवाले हैं ? कौन है इस परिस्थिति के निर्माण का जन्मदाता ? मठाधीश और अभिजात्य किस्म के लोगों को जनता अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं करती, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को इस विषय पर मंथन करना ही होगा. चार से छः प्रतिशत के अंतर से सरकार बनानेवाले इस छोटे पर्वतीय प्रदेश के चुनावों के नतीजों का पूर्वानुमान लगाना अधिक कठिन नहीं है. चार वर्षों तक बहुत अच्छा कार्य करनेवाली धूमल सरकार ने अपने शासनकाल के अंतिम वर्ष या कहें की चुनावी वर्ष में जहाँ अनेक विवादों में स्वयं को फंसाया वहीँ अनेक स्वदलीय आलोचकों व असंतुष्टों  को भी पैदा किया. सदा दो-तीन विशेष मंत्रियों से घिरे रहनेवाले धूमल स्वदलीय आलोचनाओं से शासन व दल को बचा सकते थे, परन्तु ऐसा संभव नहीं हो सका. चुनावी नतीजों के पूर्वानुमान पर सतही तौर से तो कहा जा सकता है कि या तो पूर्ण बहुमत लेकर भाजपा की सरकार पुनः बनेगी या कांग्रेस भाजपा को पछाड़ते हुये सत्ता पर अपनी वापसी करेगी. तीसरी सम्भावना यह कही जा सकती है की स्पष्ट बहुमत ना मिलने के परिस्थिति में हिलोपा और वाम दलों को मिलकर बनाये गए तथाकथित तीसरे विकल्प और विजयी होनेवाले निर्दलीय विधायकों की सहायता से कांग्रेस या भाजपा सरकार बना सकते हैं. परन्तु यह तीसरा विकल्प और टिकट ना मिलने की दशा में दोनों दलों के बागी उमीदवारों के रूप में विजयी होनेवाले निर्दलीय विधायक किसको अपना समर्थन देंगे इसका उत्तर सरकार बनने तक मिलना कठिन है. हाँ इस सम्भावना पर चर्चा अवश्य ही की जा सकती है.

१२ जिलों और लोकसभा के चार निर्वाचन क्षेत्रों में बंटे ६८ सदस्यीय विधानसभा क्षेत्रों के चुनाव के लिए जहाँ एक ओर भाजपा और कांग्रेस में बहुमत से सत्ता पर विजय पाने के लिए कड़ा संघर्ष हुआ वहीँ लगभग १३ से १७ सीटों पर हिलोपा के नेतृत्व में बना मोर्चा, बागी या निर्दलीय उमीदवारों की दमदार उपस्थिति से सत्ता का संघर्ष तिकोना हो गया. इन सब के मध्य बीएसपी, टीएमसी और समाजवादी पार्टी के उमीदवारों ने भी मतों के बिखराव में अपना सहयोग दिया. यह बात दीगर है कि यह सभी दल एक सीट पर भी विजय पाना तो दूर अपनी जमानत भी नहीं बचा पाएंगे.

मुद्दा विहीन चुनाव, खामोश मतदाता, वर्चस्व के लिए मची अंतर्कलह, बागी उमीदवारों की उपस्थिति से बनते- बिगड़ते समीकरण और स्थानीय मुद्दों के मध्य संपन्न हुये चुनावों ने पराजय का भय और विजय के संशय के चलते दलों और उसके उम्मीदवारों की घुग्गी तो वैसे ही बंधी हुई है. इस बीच किसी भी प्रकार का पूर्वानुमान लिख बिन बुलाए आफत मोल लेने जैसा कार्य होगा. फिर भी सक्षेप में मेरा पूर्वानुमान है कि ३८ सीटों पर कांग्रेस, २३ पर भाजपा व ७ सीटें अन्य के खाते जाती दिखाई देती हैं. परन्तु १३ से १७ सीटें, जहाँ तिकोना और कड़ा मुकाबला हुआ है, उनके नतीजे पासा पलट भी सकते हैं. किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत ना मिलने व ७ से १३ विधायकों का तीसरे विकल्प, बागी और निर्दलीय विधायकों के रूप में निर्वाचित होने की पारिस्थित में इनका भाजपा को समर्थन देने की बहुत क्षीण सम्भावना लगती है. कारण स्पष्ट है कि भाजपा को छोड़ अपना अलग दल बनानेवाले पूर्व सांसद और प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष महेश्वर सिंह किसी भी सूरत में भाजपा की सरकार बनाने के लिए धूमल का साथ नहीं देनेवाले. हाँ धूमल को हटा यदि भाजपा शांता कुमार या किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाने को तैयार होगी तो उत्पन्न होने वाली ऐसी परिस्थिति में महेश्वर सिंह भाजपा का साथ दे सकते है. दूसरी ओर महेश्वरसिंह के मोर्चे में शामिल वामदलों द्वारा एक या दो सीटों पर विजयी होने की सम्भावना पर क्या वाम दल भाजपा का साथ देंगे ? इस प्रश्न का उत्तर भी नकारात्मक ही मिलता है. हाँ, वाम दल आवश्यकता पड़ने पर कांग्रेस का साथ अवश्य ही दे सकते है. वहीँ दूसरी ओर यदि दोनों दलों के कुछ बागी उम्मीदवार विजयी होते हैं तो उनकी भी कांग्रेस को ही समर्थन देने की सम्भावना अधिक लगती है, क्यूँ की टिकटों के आबंटन के समय दोनों दलों की परिस्थियां और कारण अलग-अलग है. वैसे भी आवश्यकता पड़ने पर बाहर से समर्थन लेने के खेल में भाजपा को अभी कांग्रेस से बहुत कुछ सीखना है. दूर जाने की आवश्यकता नहीं एफडीआई ( खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश) के मुद्दे पर लोकसभा व राज्यसभा में मनमोहन सरकार जिस प्रकार समर्थन जुटाने में सफल रही है उसे सारे देश ने देखा है.

प्रदेश विधानसभा के चुनावों के मतदान तक कहा जा रहा था की यह मुद्दा विहीन चुनाव हैं और किसी हद तक यह कथन सत्य भी था क्यूंकि आरोप-प्रत्यारोपों में उलझे कांग्रेस व भाजपा ने जनसरोकारों की अनदेखी कर इसे मुद्दा विहीन चुनाव बना दिया था. अंतिम समय में इंडक्शन या सिलेंडर को अवश्य ही मुद्दा बनने का प्रयत्न किया गया जो विफल रहा. दलों के कार्यकर्ताओं व समर्थकों के लिए रिपीट या डिफीट अवश्य ही एक मुद्दा रहा होगा परन्तु निर्णायक भूमिका निभानेवाले निष्पक्ष मतदाताओं के लिए यह सभी नारे निरर्थक थे. प्रदेश की विधानसभा के निर्वाचन के लिए मतदान करनेवाले सामान्य मतदातों को केवल मात्र प्रदेश के हित या अहित के मुद्दों से ही सरोकार है. विपक्षी नेताओं के आरोपों से अधिक स्वदलीय आलोचनाएं उन्हें प्रभावित कर रही थीं. प्रदेश भाजपा के जनकों में से एक महेश्वरसिंह दल छोड़ने को मजबूर क्यूँ हुये ? शांता और राजन सुशांत द्वारा अपनी ही सरकार की आलोचना का क्या कारण है ? रूप सिंह और दिलेराम का टिकट कटा या उनका पत्ता साफ किया गया ? किन वरीयताओं और पात्रता के मापदंडों के चलते अनुराग ठाकुर को टिकट मिला था और सुधा सुशांत को टिकट की मनाही हुई ? ऐसे अनेक छोटे व स्थानीय लगनेवाले मुद्दों ने भाजपा की पुनः सत्ता की वापसी की अभिलाषा पर कुठाराघात किया है. शीर्ष नेतृत्व से प्राप्त हुये आदेश की पालना करनेवाले कांग्रेसजनों ने समय रहते अपने कुनबे को संभाल लिया और वीरभद्र जैसे मासलीडर को कमान मिलते ही मुख्यमंत्री पद के अन्य सभी दावेदार भीतरघात के डर से अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में इस प्रकार व्यस्त हो गए मानो नजर बंदी के आदेश हो गए हों.

जो भी हो लोकतंत्रीय प्रणाली में जनप्रतिनिधि के निर्वाचन में चुनाव एक स्वस्थ प्रक्रिया है और निर्वाचित हो कर आनेवाले सभी सदस्य जनभावनाओं का आदर करते हुये हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे पर्वतीय प्रदेश के चहुंमुखी विकास के लिए दलगत भावना से ऊपर उठ मिल कर कार्य करेंगे……प्रदेश का जन सामान्य उनसे यही आशा करता है.

 

विनायक शर्मा – संपादक, राष्ट्रीय विप्र-वार्ता

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.