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फेस्टिवल में खाइये ना..

-आलोक पुराणिक||

किसी काम को फेस्टिवल की शक्ल दे दो, तो उसे करना आसान हो जाता है। किसी गली की दुकान पर 25 रुपये में सिर्फ एक जलेबी बेचने को बेईमानी कहा जाएगा। पर हाल में दिल्ली में आयोजित स्ट्रीट फूड फेस्टिवल में एक जलेबी के 25 रुपये लिए जा रहे थे, एक स्टॉल पर।Awadhi_jalebi

मैंने कहा कि ज्यादा हैं ये। मैंने लगातार पांच बार ऐसा कहा, तो स्टॉलकर्मी बोला, सब लोग इतना-इतना खा जाता है, कोई नहीं बोलता। हम तो सिर्फ 25 रुपये ले रहे हैं। और बदले में एक जलेबी भी दे रहे हैं।

टेलिकॉम घोटाले ने 1.76 लाख करोड़ रुपये खाने का मानक इतना ऊपर सेट कर दिया है कि….। सुनने को और मिलता है कि बड़े खाउओं से कोई कुछ नहीं कहता, हमारे 25-50 पर सब बोल जाते हैं।

मैंने निवेदन किया, भाई हम भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष को नहीं आए हैं, जलेबी खाने आए हैं। स्टॉलकर्मी ने कहा- चुप्पैचाप जलेबी खाइए, फेस्टिवल में पइसा-वइसा पर काहे झगड़ा कर रहे हैं।

फेस्टिवल में प्रेमपूर्ण बर्ताव होना चाहिए। वे 25 कहें, तो आप कहें कि नहीं, प्लीज 50 तो लें, फेस्टिवल की कसम। यहां कीमतों के बारे में पूछने वाला बेवकूफ, उन पर आपत्ति करने वाला अड़ियल और उन पर झगड़ा करने वाला तो निहायत असामाजिक माना जाता है। अपनी पत्नी तक फेस्टिवल में उससे दूरी बना लेती है, जैसे वह उसका कुछ है ही नहीं, फेस्टिवल में रहने तक।

फेस्टिवलों का भविष्य बहुतै चकाचक लग रहा है। दिल्ली में ड्राइविंग लाइसेंस लेने के लिए रिश्वत देनी होती है, धक्के अलग खाने होते हैं। फिर रिश्वत देने के बाद किसी को बताओ कि इस काम के लिए इतनी रिश्वत देकर आए, तो वह बताता है कि ज्यादा दे आए। रिश्वत से ज्यादा यह बयान अखर जाता है। रिश्वत तो नॉर्मल ही है, ठग लिए गए, परेशानी यह है।

रिश्वत फेस्टिवल लगे, उसमें बिजली विभाग, पानी विभाग, एमसीडी, ट्रांसपोर्ट लाइसेंस विभाग अपने-अपने स्टॉल लगा लें। तय रेट से दोगुनी रिश्वत फेस्टिवल में सबसे वसूलें। कम से कम यह तसल्ली तो रहेगी कि हम ठगे नहीं गए।
वेलकम रिश्वत फेस्टिवल, वेलकम।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.